संविलियन की लड़ाई लड़ेगा मप्र शासकीय अध्यापक संगठन

Updesh Awasthee
भोपाल। समान कार्य-समान वेतन के बाद अध्यापक अगली लड़ाई शिक्षा विभाग में संविलियन के लिए लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ सहित देश के दो राज्य अध्यापकों का शिक्षा विभाग में संविलियन कर चुके हैं, जबकि चार राज्यों ने इन दिशा में कार्यवाही शुरू कर दी है। प्रदेश में भी 27 सितंबर-14 को मंथन के दौरान मुख्यमंत्री ने यह निर्णय लिया था, लेकिन कार्यवाही शुरू नहीं हुई।

राज्य सरकार ने 21 साल पहले शिक्षाकर्मी व गुरुजियों की नियुक्ति की थी। ये कर्मचारी नियुक्ति के बाद एक अरसे तक नियमितीकरण की लड़ाई लड़ते रहे। फिर समान कार्य-समान वेतन की लड़ाई लड़ी गई। फलस्वरूप 4 सितंबर-13 को राज्य सरकार ने यह मांग भी पूरी कर दी। अब अध्यापक शिक्षा विभाग में संविलियन की मांग कर रहे हैं। इसके पीछे उनका लालच शिक्षकों को मिलने वाली सुविधाएं हैं। यदि सरकार इस मांग को स्वीकार कर लेती है, तो अध्यापकों को नियमित शिक्षकों के समान अनुकंपा नियुक्ति, यात्रा भत्ता, डीए, चिकित्सा प्रतिपूर्ति, बीमा, तबादला और जीपीएफ का लाभ मिल जाएगा। उल्लेखनीय है कि प्रदेश में तीनों श्रेणी में वर्तमान में 2.50 लाख अध्यापक हैं।

अध्यापकों का तर्क
मांग को लेकर अध्यापकों का अपना तर्क है। मप्र शासकीय अध्यापक संगठन के प्रमुख महामंत्री आरिफ अंजुम बताते हैं कि सरकार समान कार्य-समान वेतन की मांग पहले ही मान चुकी है। चार किश्तों में यह लाभ देने का निर्णय भी हो चुका है और लाभ मिलने भी लगा है। आखिरी किश्त 2017 में मिलनी है। ऐसे में शिक्षा विभाग में संविलियन करने से सरकार को कोई अतिरिक्त वित्तीय भार नहीं आएगा। वे बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में शिक्षा मित्र और छत्तीसगढ़ में अध्यापकों का संविलियन कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि हरियाणा, कर्नाटक और जम्मू-कश्मीर सरकारों ने इस दिशा में काम शुरू कर दिया है। वे बताते हैं कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के नियम तो समान हैं। यदि छग सरकार यह निर्णय ले सकती है, तो मप्र सरकार को क्या दिक्कत है।

यह लाभ पहुंचेगा
स्कूल शिक्षा विभाग के अधिकारियों का मानना है कि अध्यापकों का शिक्षा विभाग में संविलियन कर दिया जाना चाहिए। वे दावा करते हैं कि इस निर्णय से सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की स्थिति सुधर जाएगी। इन स्कूलों में पढ़ाई की वर्तमान स्थिति को लेकर अधिकारियों का तर्क है कि वर्तमान में अध्यापक नगरीय निकाय के कर्मचारी हैं। नगरीय निकाय को पढ़ाई से कुछ लेना-देना नहीं है और शिक्षा विभाग के अधिकारियों को अध्यापकों पर कार्रवाई का अधिकार नहीं है। इस वजह से अकादमिक निरीक्षण में सामने आने वाली कमियों के लिए जिम्मेदार होते हुए भी अध्यापक कार्रवाई से बच जाते हैं। इतने पर ही, राजस्व अधिकारियों से अच्छे संबंध हों, तो अध्यापक कार्य करने की भी तकलीफ नहीं उठाते हैं।

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विभाग में संविलियन हमारी जायज मांग है। मुख्यमंत्री 7 माह पहले निर्णय भी ले चुके हैं और इस मांग को पूरा करने से सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय भार भी नहीं आ रहा है। इसलिए हम सरकार से फिर से निवेदन करने भोपाल आ रहे हैं।
ब्रजेश शर्मा, अध्यक्ष, मप्र शासकीय अध्यापक संगठन
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