जबलपुर। बिहार के छपरा में मिड डे मील से 23 बच्चों की मौत के बाद मध्य प्रदेश में विशेष सतर्कता बरतते हुए राज्य सरकार ने बच्चों से पहले शिक्षकों को भोजन चखने का जो निर्देश दिया है, उसके खिलाफ विरोध के स्वर उठने लगे हैं। शिक्षकों ने बच्चों से पहले कुत्ते को भोजन खिलाने की मांग कर डाली है।
राज्य में मिड डे मिल में गड़बड़ी की शिकायतें आती रही हैं। कहीं मरा हुआ चूहा निकला तो कहीं छिपकली निकली। बीते वर्ष जबलपुर में तो खराब खाना खाने से एक लड़की की मौत तक हो चुकी है। राज्य मानवाधिकार आयोग भी सरकार को निर्देश जारी कर चुका है, लेकिन अब तक हालात नहीं सुधरे हैं।
शिक्षक परीक्षण की वस्तु नहीं हैं
बिहार की घटना सामने आने के बाद राज्य सरकार ने मिड डे मील को लेकर निर्देश जारी किए हैं। निर्देशों में कहा गया कि बच्चों को भोजन वितरित किए जाने से पहले विद्यालय के शिक्षक भोजन को चखें। सरकार के इस आदेश का विरोध करते हुए राज्य अध्यापक संघ की जबलपुर इकाई के अध्यक्ष नरेंद्र त्रिपाठी ने तमाम विकासखंड व तहसील स्तर के पदाधिकारियों को पत्र लिखा है, जिसमें कहा गया है कि वे भोजन न चखें। बच्चों को बांटे जाने से पहले खाना कुत्तों को जरूर खिलाएं। त्रिपाठी का कहना है कि शिक्षक परीक्षण की वस्तु नहीं हैं, लिहाजा यह व्यवस्था उचित नहीं है।
कुत्तों को भोजन खिलाना संभव नहीं
सरकार को बच्चों को बांटा जाने वाला भोजन पहले कुत्तों को खिलाने पर जोर देना चाहिए, शिक्षकों को परीक्षण की वस्तु बनाना ठीक नहीं है। इस मसले पर जबलपुर के जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी शिवेंद्र सिंह का कहना है कि ग्रामीण इलाकों के विद्यालयों में भोजन स्वयं सहायता समूह बनाते हैं, जो विद्यालय में बनता है। इसलिए शिक्षक को भोजन चखने के बाद बच्चों को देना चाहिए। इसके अतिरिक्त नंदी फाउंडेशन की ओर से वितरित किया जाने वाला भोजन का पैकेट भी आता है, जिसे विद्यालय तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी इसी संस्था की है। छात्रों से पहले कुत्ते को भोजन खिलाना संभव नहीं है।
बच्चों की थाली खाली, कंपनी छापे करोड़ों
बिहार में मिड डे मील खाने से 22 बच्चों की मौत के बाद केंद्र सरकार की इस योजना पर बड़े सवाल खड़े रहे हैं। ऐसा नहीं है कि पहली बार ऐसी कोई घटना हुई, लेकिन राज्य सरकारों तथा केंद्र की लापरवाही, भ्रष्टाचार ने इस योजना का न केवज बंटाधार कर दिया बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य से भी खिलावाड़ हो रहा है। मिड डे मील बांटने में लापरवाही, भ्रष्टाचार सिर्फ बिहार तक ही सीमित नहीं बल्कि एमपी में हालात बदतर हैं। सुशासन का दम भरने वाले शिवराज सिंह चौहान के इस राज्य में सीएनएन आईबीएन ने पड़ताल की तो पता चला कि इस राज्य में मिड के मील के नाम पर 500 करोड़ रुपये बोगस कंपनियों को दे दिये गये। ये हाल तो तब है कि मध्य प्रदेश में लगभग 80 लाख बच्चे कुपोषित हैं। इनमें से 52 फीसदी ग्रामीण इलाकों से हैं।
फर्जी कंपनी का सच
चैनल को जानकारी मिली कि मप्र एग्रो इंडस्ट्री डेवलेपमेंट कॉर्पोरेशन ने तीन संयुक्त वेंचर बनाए। कॉर्पोरेशन ने खाना बनाने और स्पलाई करने की जिम्मेदारी ली। कॉर्पोरेशन ने इन वेंचर में 11 फीसदी की हिस्सेदारी रखी। इसमें से एक वेंचर फर्जी दस्तावेज से बना था। सितंबर 2008 में राज्य कृषि उद्योग विकास निगम ने अखबार में एक टेंडर आंमत्रित किया था। इस टेंडर के मुताबिक निगम ने भोजन बनाने और सप्लाई करने के लिए एक एससी, एसटी पाटर्नर की मांग की थी। इसमें इंदौर की एक कंपनी अनिल उद्योग को चुना गया लेकिन बाद में यह पता पड़ा कि कंपनी का मालिक राहुल जैन है।