घट रहा है दिल्ली का दबदबा

shailendra gupta
राजदीप सरदेसाई
आईबीएन नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ
राजदीप सरदेसाई/ कांग्रेस शैली  के शासन का उत्तराखंड मॉडल कमजोर नेतृत्व को जन्म देता है, लेकिन तानाशाही प्रवृत्ति भी रोकता है। भाजपा शैली का गुजरात मॉडल निर्णय प्रक्रिया में तो तेजी लाता है, लेकिन इसमें एकाधिकारवादी शासन का जोखिम है।

एक  वाकया है, पता नहीं इसमें सच्चाई कितनी है लेकिन यह सत्ता में भागीदार बनाने की 'कांग्रेस संस्कृति' का सबसे अच्छा उदाहरण  है। महाराष्ट्र् में जब 1982 में सीमेंट घोटाले के कारण एआर अंतुले को इस्तीफा देना पड़ा था तो बाबासाहेब भोसले को मुख्यमंत्री बनाया जा रहा था। भोसले की नियुक्ति से कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता को इतना धक्का लगा कि उन्होंने इंदिरा गांधी से यह पूछने की हिमाकत कर ली कि क्यों उन्होंने इतने ऊंचे पद के लिए बिना जनाधार वाले नेता को चुना। इंदिरा गांधी ने फौरन जवाब दिया, 'जनता को आकर्षित करने की काबिलियत न होना और राजनीतिक रूप से नौसिखिए होने के कारण ही वे इस पद के लिए एकदम सही पसंद हैं।'

उत्तराखंड में बादल फटने की आपदा से निपटने को लेकर मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की हो रही आलोचना के संदर्भ में भोसले का उदाहरण एकदम सही बैठता है। भोसले की तरह ही बहुगुणा भी कांग्रेस हाईकमान की कृपा से  छलांग लगाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए। अपना जीवन एक वकील व जज के रूप में बिताने के कारण उनका प्रशासनिक अनुभव बहुत सीमित है। वे पहली बार एक उपचुनाव के जरिये 2007 में सांसद चुने गए, लेकिन उत्तराखंड में वैसे उनका कोई आधार नहीं है। एक प्रसिद्ध राजनीतिक नाम, शांत व हमेशा मुस्कुराने वाला व्यक्तित्व जरूर उनके पास था और हां, केंद्रीय नेतृत्व का आशीर्वाद तो था ही।

मुख्यमंत्री पद की लड़ाई में मात खाने वाले थे उत्तराखंड में कांग्रेस के कद्दावर राजनीतिक नेता हरीश रावत। पांच बार के सांसद, प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष हैं। एक ऐसे व्यक्ति जो ग्रामीण राजनीति से शुरुआत करके अपने काम के आधार पर ऊपर तक पहुंचे। जमीनी नेता होने के कारण रावत ही स्वाभाविक पसंद होते। पर कांग्रेस पार्टी में ऐसा नहीं होता। बरसों पहले भोसले की तरह कांग्रेस ने अपना वजूद रखने वाले नेता की जगह राजनीतिक रूप से हल्के-फुल्के नेता को चुना।

एक तरह से उत्तराखंड में कांग्रेस की परंपरा का ही अनुसरण हुआ है। एक ऐसी परंपरा जिसमें मुख्यमंत्री की नियुक्ति जमीनी विश्वसनीयता या करिश्मे की बजाय दिल्ली के सत्ता केंद्र से उसके 'संबंधोंÓ को ध्यान में रखकर की जाती है। वाईएस राजशेखर रेड्डी आखिरी स्वतंत्र मुख्यमंत्री थे जिन्होंने आंध्रप्रदेश को मजबूत शासन दिया। शायद रेड्डी की मौत के बाद वहां हुई उथल-पुथल से घबराकर कांग्रेस नेतृत्व अब अपने मुख्यमंत्रियों पर नियंत्रण रखने के प्रति और भी जागरूक हो गया है। अब पार्टी में क्षेत्रीय क्षत्रप कहे जा सकने के करीब सिर्फ एक ही नेता हैं; असम में तीन बार मुख्यमंत्री रहे तरुणकुमार गोगोई, जिनका रुझान गुवाहाटी को दिल्ली से एक हाथ दूर ही रखने का रहा है। भूपिंदरसिंह हुड्डा भी हरियाणा में खुद को 'बॉसÓ के रूप में देखना चाहेंगे, लेकिन वे भी जानते हैं कि उनका भविष्य इस बात पर निर्भर है कि वे दिल्ली में राजनीतिक आकाओं को कितना खुश रख पाते हैं।यहां हमें शीला दीक्षित को अलग रखना होगा, क्योंकि दिल्ली का मुख्यमंत्री असल में तो सीमित अधिकारों की बेड़ी में बंधा गौरवान्वित मेयर ही है।

अब कांग्रेस में मुख्यमंत्री के घटते रुतबे को भाजपा शासित राज्यों में ताकतवर क्षत्रपों के उदय की पृष्ठभूमि में देखिए। नरेंद्र मोदी तो भाजपा द्वारा अपनी राज्य इकाइयां ताकतवर व्यक्तियों को आउटसोर्स करने के मॉडल का बेहतरीन उदाहरण हैं। मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में रमण सिंह की छवि निर्णायक नेता होने की है, क्योंकि उन्हें निर्णय प्रक्रिया में स्वतंत्रता दी गई है। वहीं कांग्रेस में मंत्रिमंडल में मामूली फेरबदल करने के लिए भी मुख्यमंत्रियों को दिल्ली की दौड़ लगानी पड़ती है। सत्ता केंद्र में इस बदलाव का प्रादेशिक व राष्ट्रीय राजनीति पर असर पड़ा है। इससे उत्तराखंड जैसे राज्य में आपदा के दौरान अक्षमता उजागर होती है। वहां मुख्यमंत्री खुद पहल करके निर्णय लेने की बजाय निर्देशों के लिए दिल्ली की ओर देखता है।

राष्ट्रीय स्तर पर असर यह है कि कांग्रेस अब भी चुनाव जीतने के लिए पूरी तरह गांधी परिवार के करिश्मे पर निर्भर है। यह ऐसी निर्भरता है जो पार्टी के भीतर चापलूसी को बढ़ावा देती है। राजनीतिक विखंडन के दौर में सत्ता विकेंद्रीकरण को बढ़ावा देने की बजाय कांग्रेस अपनी राजनीति को दिल्ली दरबारियों के जरिये चलाने की नीति पर ही चल रही है। इससे राज्यों की राजधानियों में अधिक मुखर होती सामाजिक व राजनीतिक ताकतों का मुकाबला करने की कांग्रेस नेताओं की ताकत कम होती जा रही है। जैसे क्यों कांग्रेस उत्तरप्रदेश में मुलायम या माया को या बिहार में नीतीश या बंगाल में ममता  को सार्थक चुनौैती नहीं दे पा रही है?  इसलिए कि कांग्रेस ने अपने प्रदेश नेताओं को केंद्र का 'एजेंटÓ बनाकर शक्तिहीन बना दिया है।

भाजपा की समस्या बिल्कुल उलटी है। भाजपा शासित राज्यों में व्यक्तित्व केंद्रित राजनीति के उदय ने उन राज्यों में पार्टी का परंपरागत  पदानुक्रम लगभग खत्म कर दिया है। जब क्षेत्रीय नेता पार्टी के स्थापित तंत्र को दरकिनार कर मतदाताओं से सीधे मुखातिब हो सकता है तो उसे लगता है कि अब वह पार्टी में किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है। कमजोर नेतृत्व ऐसे मुख्यमंत्री पर लगाम लगाने में खुद को शक्तिहीन महसूस करता है, जो खुद को सबसे बड़ा नेता न भी माने, समान कद के नेताओं में अपने को प्रथम तो मानता ही है।

तो चुनाव साफ है : एक तरफ कांग्रेस शैली के कमजोर नेतृत्व को जन्म देने वाला उत्तराखंड मॉडल है, पर जो तानाशाही के उदय को रोकता है। भाजपा शैली का गुजरात मॉडल निर्णय प्रक्रिया में तो तेजी लाता है, लेकिन इसमें एकाधिकारवादी शासन का जोखिम है। दोनों मॉडल का मिलन अच्छे शासन पर हो सकता है जिसे देश में मतदाता तरजीह दे रहे हैं। संभव है कांग्रेस उत्तराखंड में यह सबक सीखे कि मतदाता का कोप भी प्रकृति जितना ही भारी पड़ सकता है।

पुनश्च: हिमाचल में वीरभद्र सिंह और कर्नाटक में सिद्धारमैया की नियुक्ति यह संकेत देती है कि अब कांग्रेस भी क्षेत्रीय नेताओं को सम्मान देना सीख रही है। अब आप लुटियन्स दिल्ली से भारत पर शासन नहीं कर सकते।

राजदीप सरदेसाई
आईबीएन नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ

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