राजस्थान के जैसे मध्यप्रदेश में खुलनी चाहिए सस्ती दवाओं की दुकानें

shailendra gupta
मनोज मराठे। राजस्थान सरकार द्वारा पूरे राज्य में 500 से अधिक जेनरीक दवाई दुकाने आसानी से संचालित कर सस्ती दवाईयां जनता को मुहैया करवाई जा रही है। साथ ही वहां के मुख्यमंत्री ने हाल ही में बाजार में ब्लड केंसर की दवाई जो 125000 रू में मिलती है उसकी जेंनरीक कीमत मात्र 8000 रू है। मरीजो को निशुल्क उपलब्ध करवाई जा रही है।

उक्त दवाई म.प्र. सरकार द्वारा भी राजस्थान सरकार की तर्ज पर प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह द्वारा राजस्थान सरकार से संपर्क कर प्रदेश की जनता को उपलब्ध करवाना चाहिए। केंद्रीय मंत्री मण्डल द्वारा 550 दवा कम्पनीयों में से 348 दवाईयों पर मूल्य नियंत्रण लागू किया जो पहले मात्र 74 कम्पनीयों पर था, जबकि देष में लगभग 1800 दवाईयां बनती है और इनमें से मात्र 348 दवाओं पर यह नियम लागू किया गया जिसमें कि दवाईयों पर बाजार मूल्य नीति अपनाकर देष की जनता के साथ फिर आर्थिक धोका हुआ है जबकि जनहित में दवाईयों पर पर लागत मूल्य का पैमाना लगाया जाना था जिससे कि इनकी किमतों में 75 प्रतिशत की कमी आ सके अर्थात मूल्य नियंत्रण के बाद भी दवाईयों की किमत 75 प्रतिशत से अधिक है तो फिर काहें का फायदा।

इस तरह से नई दवा मूल्य नीति में भी केंद्र सरकार देष की जनता को गुमराह कर रही है इसके स्थान पर राष्ट्रीय दवा नीति ही लागू होना चाहिए।

वर्तमान में 348 दवाईयों पर मूल्य नियंत्रण के बाद भी 65 प्रतिशत दवाईयां मूल्य नियंत्रण से बाहर है एैसे में जनहित में मात्र जेनेरिक दवा नीति ही कारगर सिदध होती है क्योंकि जहां ब्राण्डेड दवा के नाम पर केंसर की एक माह की दवा एक लाख बीस हजार में बेची जा रही है तो दूसरी तरफ जेनेरिक में वही दवा 6 से 9 हजार में प्राप्त होती है।

भारत एक गरीब देश है यहां का किसान मजदुर मध्यम वर्ग इतनी मंहगी स्वास्थ व्यवस्था के कारण ईलाज से मोहताज है पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री जयराम नरेष ने कहा था कि भारत में स्वास्थ व्यवस्था अन्य देशों की तुलना काफी मंहगी है इसलिये ग्रामीण व गरिब जनता को धन असी पर खर्च काना पडता है।

देश में निर्मित जेनेरिक दवाईयां अपनी अच्छी गुणवत्ता के कारण विश्व के अनेक देशों के बाजारों में अपना स्थान बना चुकी है तो दूसरी ओर विश्व स्वास्थ संगठन द्वारा भी जेनेरिक दवाईयां खरिदी जाती है फिर देश में इनके स्थान पर ब्राण्डेड दवाईयों के नाम पर जनता के साथ लुट क्यों?

यदि देश में ब्राण्डेड दवाईयों के स्थान पर जेनेरिक दवा नीति लागू कर दी जावें तो मरिज को 1.00 लाख के स्थान पर इलाज के लिए 5 से 6 हजार ही खर्च करना होंगे जिससें गरिब से गरिब आदमी भी अपने स्वयं के खर्च पर इलाज करवा सकेगा क्यों कि जेनेरिक दवा के मूल्य की तुलना ब्राण्डेड दवाई के मूल्य में जमीन आसमान का अन्तर है। 

उदाहरण के लिए षुगर के लिये उपयोग में आने वाली 10 गोलीयों की किमत ब्राण्डेड के नाम पर बाजार में 117 रू में मिलती है तो वही 10 गोलियां जेनेरिक दवा के नाम पर 1.95 पैसे में मिलती है और विष्व के अनेक देषों में अपने देष से 45 हजार करोड़ की जेनेरिक दवाईया प्रतिवर्ष बाहर भेजी जाती है तो भारत जैसे गरिब देष में क्यों नही उपयोेग की जाती है? श्री मराठे ने इस संबंध में केंद्र सरकार को पत्र लिख कर मांग की है कि  देष में दवाईयों को लेकर निम्नलिखित सुधार ही किये जाने चाहिए-

सभी ब्राण्डेड दवाईयों के लायसेंस निरस्त कर सभी को जेनेरिक दवाईयां निर्माण का लायसेंस दिया जावें। सरकार द्वारा हाल ही में नई किसी भी कम्पनी को जेनेरिक दवा निर्माण करने का लायसेंस दिया जाने का प्रावधान है जिसका हम स्वागत करते है। पुरानी ब्राण्डेड कम्पनीयों के लायसेंस निरस्त कर उन्हे भी जेनेरिक उत्पादन का ही लायसेंस क्यों नही दिया जाता, तब तक ये सब बेमानी है।

देष और जनहित में सभी इवाईयों की वास्तविक मूल्य सूची को सार्वजनिक रूप से प्रकाषित कर सभी दवाई दुकानों पर चस्पा करवाई जावें।
साथ ही कौन-कौन सी दवाई किस बिमारी के लिये है और किस आयु के लिए है, कितनी मात्रा में लेनी चाहिए ? भी लिखा जावें क्योंकि इस अज्ञानता का फायदा उठाकर देष की जनता को लुटा जा रहा है।

अधिकांष ब्राण्डेड कम्पनीयां विदेषी है अर्थात लाभ विदेषों को हो रहा है और खामियाजा हमारे देष के लोगों को भुगतना पड़ता है, सरकार इस मामले में विदेषी कम्पनीयों का पक्ष क्यों लेती है? इस संबंध श्री मराठे ने प्रधानमंत्री स्वास्थमंत्री एवं केंद्रीय प्रमुख सचिव स्वास्थ मंत्रालय को पत्र लिखकर षीघ्र निर्णय लिया जाने की मांग की अन्यथा देष में ब्राण्डेड दवाईयों के स्थान पर जेनेरिक दवाई नीति लागू करने को लेकर जनहीत में उच्च न्यायालय इन्दौर में याचिका दायर की जाने कि पूरी तैयारी वरिष्ठ अभिभाषक श्री टी.एन.सिह व सुश्री हेमलता गुप्ता के माध्यम से की गई है। श्री मराठे ने म.प्र. व महाराष्ट सरकार को राजस्थान सरकार की तरह निःषुल्क दवा वितरण केंद्र खोलने की मांग की थी जो दोनो राज्यों ने प्रारम्भ कर दी जिसका स्वागत किया और कहा कि ब्राण्डेड दवाईयों के चलते नाकाफी है हमारा संघर्ष राष्ट्रीय जेनेरिक दवा नीति घोषित होने तक जारी रहेगा ।

लेखक मनोज मराठे, मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले में आने वाले सेंधवा शहर के सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
संपर्क: 098266-99484

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