राकेश दुबे/प्रतिदिन/ जिस किसी शायर ने यह शेर कहा है, क्या खूब कहा है| वो कत्ल भी कर दें तो कोई कुछ नहीं कहता। हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम।। मेरा मानना है कि वह शायर कम ज्योतिषी ज्यादा था| उसे अंदाज़ था कि 2013 में भारत में वो स्थिति आ जाएगी, बोलना गुनाह हो जायेगा|
अगर आप नेता है तो कुछ भी बोलिए, अगडम-बगडम संत तो भी चलेगा, राष्ट्रपति के बेटे तो भी चलेगा, मुम्बई में लुंगी की पुंगी करेंगे तो भी चलेगा, हैदराबाद में कुछ घंटे सेना और पुलिस हटाने की बात करेंगे, तो भी चलेगा और तिलक तराजू और तलवार के साथ बदतमीजी करेंगे तो भी चलेगा, लेकिन गलती से लेखक ,पत्रकार, चित्रकार और विचारक है तो नही चलेगा।
क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथाकथित नेताओं, स्वम्भू बाबाओं, गुंडों और कुछ नव धनाढ्यों के पास गिरवी है और इसका इस्तेमाल वे अपने फायदे या देश/समाज को बांटे रखने के लिए करते हैं। फिर जब चाहें ओ माय गाड बना देते हैं तो जब चाहे विश्वरूपम पर आपत्ति खड़ी कर देते हैं और नंदी को माफ़ी मांगने के बाद भी नाथ देते हैं।
पूरी श्रध्दा और मर्यादा के साथ सवाल है इस आचरण से यह ध्वनि नहीं आ रही है, भारतीय संविधान में वर्णित मौलिक अधिकार कहीं गिरवी है ? क्या आज़ादी के पहले इस हथियार की यही शक्ल थी ? आपकी विचारश्रंखला को मजबूती देने के लिए बता देता हूँ की आज़ादी के पहले इसकी शक्ल भाले की तरह थी लक्ष्य आज़ादी था। अब तो अभिव्यक्ति की आज़ादी लायसेंस पाने और धंधे बचाने के लिए रैन कोट है।
यहाँ फिर सवाल संस्कार का आ गया है। सैनिकों के कटे सर पर हम कुछ नहीं करते किसी फिल्म के आने की आशंका पर, किसी ड्रेस पर ,किसी वेलेंटाईन डे पर कालिख पोतने और...और ,और..... न जाने क्या क्या करने पर उतारू हो जाते हैं | शायर का मुक्कमल शेर है कि” हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम , वो कत्ल भी करते हैं मगर चर्चे नहीं होते |
