सुबोध आचार्य/ एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष-दोनों ही दो राष्ट्रीय प्रमुख पार्टियों से ताल्लुक रखते हैं, एक की जीत पर आंसू बहे तो दूसरे की जीत पा ढोलताशे, जी हां हम बात कर रहे हैं, राहुल गांधी और राजनाथसिंह की। दोनों ही बड़े नाटकीय घटनाक्रम से क्रमश: उपाध्यक्ष और अध्यक्ष चुने गए।
जयपुर के चिंतन शिविर का नतीजा तथ पार्टी के गिरते ग्राफ की चिंता ने पिछले आठ वर्षों से राजनीति में कदम रखने वाले युवा नेता राहुल गांधी के कंधे पर पार्टी का बोझ डाल दिया गया, जो बीड़ा राहुल गांधी ने उठाया उस समय कोई बड़ा नेता सामने नहीं आया और सबने इस अवसर का भरपूर फायदा उठाया कि यदि कोई करिश्मा हो गया तो कह सकते हैं कि हमने साथ दिया और नहीं हुआ तो कह देंगे अनुभव नहीं था। राजनीति के इतने पहलू हैं कि इसे दघाडऋकर नहीं देखा जा सकता।
राहुल गांधी ने अपने उदबोधन भाषण में ही ऐसा कुछ कह दिया कि कांग्रेसियों की घिग्गी बंध गई। हर वो नेता जो टिकट खिड़की पर जमा है अब कांग्रेस हाईकमान की तरफ ऐसे देख रहा है मानो 'हाउसफुल' का बोर्ड टंग गया हो। अब राजनाथसिंह अध्यक्ष बन गए थे या बना दिए गए थे, यह तो भाजपा के वरिष्ठ नेता ही जाने, लेकिन चुनाव के पूर्व अध्यक्ष के यहां पड़े छापों ने भाजपा पर छाप छोड़ दी जो दुबारा चुने जाने वाले थे तथा निर्विरोध चुना जाना तय माना जा रहा था। आयकर के अवरोध के आगे धराशायी हो गए।
राजनाथसिंह को अध्यक्ष बनाना भाजपा की मजबूरी मानी जा सकती है क्योंकि और कोई वरिष्ठ नेता निर्विवाद नहीं दिख रहा था। सुषमा स्वराज, अरूण जेटली, नरेंद्र मोदी, यहां तक कि खुद लालकृष्ण आडवाणी तक प्रधानमंत्री पद की दौड़ में थे या हैं? वर्तमान में पूरे परिदृश्य में भाजपा भाजपा की स्थिति थोड़ी अच्छी दिखाई दे रही है, इसीलिए राजनाथसिंह ने कमान संभालने में देर नहीं लगाई। चूंकि इतिहास अध्यक्ष के निर्विरोध का रहा है, उसे कायम भी रखना था। यशवंत सिन्हा का चुनाव से हटना यही दर्शाता है। चुनौतियां दोनों पार्टियों में भरपूर है और जनता का विश्वास कैसे जीता जाए, इसकी रस्साकशी अब आरंभ हो चुकी है। देखना है कि सत्ता को कांटों का ताज कहने वाले अध्यक्ष राजनाथसिंह को असली ताज कब मिलता है और सत्ता को जहर की राजनीति कहने वाली सोनिया गांधी को कांग्रेस की सरकार कब मिलती है?