राकेश दुबे/ प्रतिदिन/ मै शर्म के बारे, मेरे प्यारे वतन, इस गणतंत्र दिवस पर तुझे सलाम तक नहीं कह पा रहा हूँ | तिरंगे को उठाने में मेरे हाथ अपराध बोध से कांप रहे हैं |क्यूंकि इन्हीं हाथों से मैंने केंद्र और राज्य में वोट देकर जो सरकारें चुनी वे जनाकांक्षाओं पर खरी नहीं उतरीं है |
बदहाली, भ्रष्टाचार बढे है, संसद से सडक तक अशोभनीय दृश्य दिखाई दे रहे हैं | भ्रष्टाचारी सर उठाये घूम रहे है, सीमा पर शहीदों का अंग भंग, सडकों पर माँ बेटियों का शील भंग यह प्रमाणित कर रहा हैं कि सरकार जैसी संस्था निष्क्रिय है और मुझ जैसे नागरिक सिर्फ अपने अधिकारों की बात कर रहे कर्तव्य को भूलते जा रहे हैं | ऐसे मे मैं कैसे ऐ वतन तुझ से आँख मिलाऊ|
में किसी बड़ी पार्टी का भूतपूर्व अध्यक्ष भी नहीं हूँ जो यह दावा कर सकूं कि अगली बार सरकार बनते ही देख लूँगा |मै वह गृह मंत्री भी नहीं जो बिना आधार के कुछ भी कह दूँ |मै किसी दल का महामंत्री भी नही जो आतंक वादियों को सम्मानसूचक शब्दों से संबोधित करूं |मैं तो एक साधारण नागरिक हूँ जिसे पिछले चुनाव की तरह २०१४ में विकल्प हीनता के अभाव में नागनाथ या सांप नाथ में से किसी एक को चुनना होगा |क्योंकि देश का संविधान मुझसे मतदान की अपेक्षा करता है |
मुझे शर्म आ रही है की मेरे देश में नारी की अस्मिता सुरक्षित नहीं, संयुक्त राष्ट्र संघ मुझ पर मेरे संस्कारों पर सवालिया निशान लगा रहा है | मेरी संसद में वह सब होता है जिससे सदन की गरिमा नष्ट होती है | महिला मुख्य मंत्री केंद्र पर अनदेखी के आरोप लगा रही है | केंद्र और राज्य के आपसी सम्बन्धों में तनाव आ रहा है|कल्याणकारी राज्य उपहास कुपोषित बालकों की संख्या और बलात्कार के आंकडें उड़ा रहे है |
मैं किसी किले या किसी मैदान में जाकर तिरंगे को छुने का साहस नहीं कर सकता | अपने कर्तव्य को ठीक से न निभाकर देश को या तिरंगे को सलाम करना किसी अवमानना से कम नहीं है|ऐसा मेरा मानना है, क्या मैं गलत हूँ ?