हिमाचल की हार के बावजूद क्या मोदी की जीत पर भाजपा के लोग जश्न मनाएं ?

shailendra gupta
प्रसंगवश / देव श्रीमाली/ मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने लगातार जीत की हैट्रिक लगाई । वैसे यह गुजरात में भाजपा की यह लगातार पांचवी जीत है जिसको लेकर भाजपा को निश्चित ही गौरवान्वित होना चाहिए लेकिन चुनाव विश्लेषण दो तरह से होता है । एक तो स्थानीय स्तर पर और दूसरे राष्ट्रीय  स्तर पर । मोदी की जीत पर ग्वालियर के 38 नम्बर रेसकोर्स रोड पर भी जश्न मनाया गया ।

 यहाँ भी मिठाइयां बंटीं । देशभर में भी ऐसा हुआ होगा । लेकिन सवाल  यह है कि क्या कल भाजपा के लिए ऐसा दिन था जिसमें वह देशभर में मिठाइयां बांटे ? कल के दिन दो राज्यों के चुनाव परिणाम बाहर आये और इसमें से एक राज्य में उसकी सरकार और कम हो गयी । किसी भी राजनैतिक   दल के लिए किसी भी राज्य में सत्ता को बहाल रखना निश्चित तौर पर एक बड़ी चुनौती होती है लेकिन दो राज्यों में से एक में सत्ता गँवा देना और फिर भी उस पराजय को दकिनार कर एक राज्य की जीत को राष्ट्रव्यापी जीत के रूप में तब्दील कर देना उसके लिए नुकसानदेह  साबित हो सकता है । 

अगर हम देश में हो रहे चुनावों का ठीक तरह से विश्लेषण करें तो वह भाजपा के लिए कोई ख़ास सुखद नहीं है । यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि इस समय कॉंग्रेस अपने जीवन के सबसे खतरनाक और बुरे दौर से गुजर रही है । उसके सामने इससे पहले सबसे बुरा दौर आपातकाल के बाद का माना जाता रहा है लेकिन उस बुरे दौर को भी उसने मात्र ढाई साल में धो डाला था । इसकी वजह थी इंदिरा गांधी के रूप में एक करिश्माई नेतृत्व की मौजूदगी । परन्तु इस समय परिस्थितयां एकदम उलट है । 

कॉंग्रेस  के पास न तो कोई नेतृत्व है जो देश भर में ठीक से  ठीक से उसकी बात को समझा सके और न ही कार्यकर्ताओं का कोई सुगठित तंत्र शेष रहा है जिसके जरिये नीचे की बात ,आमजन की भावना हाईकमान तक पहुँच सके । ज्यादातर  राज्यों में उसका क्षेत्रीय नेतृत्व बुढा गया है । उसके पास न तो नई  सोच है और न ही पार्टी के लिए कर मिट या मर मिट की भावना रखने वाले कार्यकर्त्ता  । वह तो अपनी शिनाख्त कराने भर कर के लिए इस पार्टी में आना चाहता है और इसके जरिये बाकी दलों के नेताओं से संपर्क गांठकर अपना धंधा रोजगार सुचारू रूप से चलते रहने  का मार्ग सुगम करना चाहते है  । राष्ट्रीय स्तर पर भी जो नेता शेष बचे हैं उनका जमीन से कोसों दूरी बन चुकी है। 

इतना ही नहीं बीते  एक -डेढ़ साल से कॉंग्रेस को नित नई  मुसीबत मिली, चाहे वह भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन हो ,रामदेव का प्रहार हो ,अन्ना  की हुंकार हो या फिर केजरीवाल की कारपोरेटिया स्टाईल का जन आन्दोलन हो ,उसने कॉंग्रेस की चमक को निरन्तर धुंधला किया । उधर कॉंग्रेस नेतृत्व ने भी जो निर्णय लिए ,जिनमें कुकिंग गैस की राशनिंग  सबसे बड़ा है ,ने मध्यमवर्ग के बीच तो इस पार्टी को एकदम खलनायक ही बना दिया । लेकिन इसके बावजूद मुख्य विपक्षी पार्टी के खाते में क्या आया ? हरियाणा चुनावों में कॉंग्रेस की वापिसी हो गयी। पश्चिम बंगाल में कॉंग्रेस - टीएमसी युति की सरकार बन गयी। यूपी में वह बदहाल रही। 

जब पंजाब और उत्तराखंड के चुनाव हुए तो उत्तराखंड उसके हाथ से चली गयी और अब गुजरात और हिमाचल के चुनाव हुए तो हिमाचल प्रदेश उसके हाथ से चला गया । वैसे हर चुनाव में  जश्न मनाने का मौक़ा तो इतनी विषम परिस्थितियों के बावजूद कॉंग्रेस को मिला । अगर गोवा  को छोड़ दिया जाए तो भाजपा एक भी राज्य में अपनी नई   सरकार नहीं बना सकी बल्कि हर चुनाव में एक -एक कर उसकी सरकारों की संख्या कम ही होती गयी । भाजपा इस समय सिर्फ विधान सभाओं के लिए नहीं देश में कॉंग्रेस के विकल्प के रूप में लड़ाई लड़ रही है । इसके लिए उसके सामने उत्तम विकल्प भी नज़र आ रहा था लेकिन जो चुनावी परिणाम आ रहे हैं वे उसके लिए कोई ख़ास सुखद नहीं है । 

राष्ट्रीय नेतृत्व को अहंकार ढंग से दरकिनार करने के बावजूद मोदी के  गुजरात में कॉंग्रेस की सीटें भी बढीं और वोट प्रतिशत भी । हिमाचल से सरकार चली गयी । उत्तर भारत में भाजपा नए वोट बैंक को आकर्षित नहीं कर पा रही ,उलटे उत्तराखंड और हिमाचल में उसकी ताकत घट  गयी बावजूद इसके कि अन्ना ,केजरीवाल,रामदेव,सुब्रमण्यम स्वामी की बैसाखियाँ  भी उनके साथ रहीं  । मिशन 2014 को फतह करने के लिए भाजपा को न केवल अपने राज्य बचाने की चुनौती है बल्कि उसे अपना जनाधार भी बढ़ाना होगा । अगर वह हर राज्य गंवाने के बाद इसी तरह एक राज्य को बहाल रखने के संतोष में ही देशभर में मिठाई खाती रहेगी तो उसके लिए निश्चित ही दिल्ली दूर रहेगी  । 

उसे यह सोचना पड़ेगा कि पिछले लोकसभा चुनाव के समय उसकी देश में सत्ता में भागीदारी कितनी थी और अब जब 2014 में चुनाव होंगे तब कितनी बची है । वह बढ़ने की जगह घटी ही है । कुछ राज्य हाथ से गए तो कर्नाटक  जैसे राज्य में उसकी ताकत छिन्न -भिन्न दिख रही है । उडीसा में उसकी सहयोगी रही सरकार किनारा कर चुकी है और बिहार में नीतीश कुमार से उनसके रिश्ते नरम -गरम हैं । 

निश्चित ही यह गुजरात के कार्यकर्ताओं के लिए यह जश्न का अवसर है ,उन्होंने पांचवी बार राज्य में भाजपा की सरकार बनायी है , लेकिन ग्वालियर के 38 नंबर मप्र जब मिठाई बँटती  है तो वहां एक सहज सवाल पूछा जाता ही है  कि क्या यह हिमाचल में सरकार चले जाने की मिठाई है ? जब घर में छोटा सा भी शोक हो तो बड़ी खुशी के जश्न भी टाल दिए जाते है परन्तु भाजपा के लोग अति आत्म  विश्वास में जो कर रहे हैं कहीं वह वह उनके लिए मिशन 2014 के लिए घातक न बन जाए ?

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