भोपाल। भाजपा के गलियारों में दबी जुबान में यह चर्चा चल रही है कि नरेन्द्र तोमर का जो निर्वाचन हुआ वह संवैधानिक रूप से अवैध है, भाजपाई संविधान के ज्ञाता इस मामले में मौन हैं एवं एक बात दोहरा रहे हैं कि जो कुछ हुआ सर्वसम्मति से था परंतु तकनीकी तौर पर वो फिलहाल कुछ नहीं बोल रहे।
हम बिना कोई मिर्च मसाला लगाए, इस विषय को जैसा हवाओं में है, वैसा ही प्रस्तुत कर रहे हैं। कृपया पढ़िए वो बिन्दु जो आज चर्चा का विषय बने:—
- भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव रविशंकर प्रसाद केन्द्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर भोपाल आए थे। भाजपा आफिस से जारी प्रेसरिलीज एवं तमाम अखबारों में प्रकाशित खबरें में उन्हें पर्यवेक्षक ही बताया गया है।
- निर्वाचन की प्रक्रिया का प्रमुख अधिकारी हमेशा ही निर्वाचन अधिकारी होता है। प्रत्याशी अपना बी फार्म हमेशा निर्वाचन अधिकारी को सौंपता है और विजेता की घोषणा भी निर्वाचन अधिकारी ही करता है।
- प्रदेशाध्यक्ष पद के एकमात्र प्रत्याशी नरेन्द्र सिंह तोमर ने अपना फार्म निर्वाचन अधिकारी को नहीं बल्कि पर्यवेक्षक को सौंपा और घोषणा भी पर्यवेक्षक ने की।
- राज्य के निर्वाचन अधिकारी नंद कुमार सिंह चौहान ने न तो बी फार्म प्राप्त किया, न स्कूटनी की और न ही विजेता की घोषणा, फिर कैसे एक प्रत्याशी को विजेता माना जा सकता है।
- बिना चुनाव लड़े पराजित हो गए प्रभात झा का कहना है कि नंद कुमार सिंह चौहान जिलों के निर्वाचन अधिकारी थे, प्रदेश के नहीं। सवाल यह है कि फिर उन्हें राज्य निर्वाचन अधिकारी पदनाम से संबोधित क्यों किया गया।
- यदि नंद कुमार सिंह निर्वाचन अधिकारी नहीं थे तो बिना निर्वाचन अधिकारी के कोई चुनाव हो कैसे गया। भले ही यह चुनाव एक औपचारिकता मात्र थी, परंतु औपचारिकता भी पूरी क्यों नहीं की गई।
- कहीं ऐसा तो नहीं कि संगठन के संचालक इस निर्णय से सहमत नहीं थे, परंतु वे विरोध करने की स्थिति में भी नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपने हस्ताक्षर बचाते हुए जो हो रहा है हो जाने दिया।
विषय यह नहीं है कि चुनाव अवैध है और उसे रद्द किया जाना चाहिए, परंतु विषय यह है कि प्रक्रिया क्या होना चाहिए यह हर खासोआम को मालूम होना चाहिए और इस पर कम से कम बहस तो होनी ही चाहिए।
नीचे दिया गया कमेंट बॉक्स इसी बहस को बढ़ाने के लिए उपस्थित है। पक्ष विपक्ष दोनों विचार आमंत्रित हैं। देखते हैं कितने हिम्मतवाले भाजपाई इस बॉक्स का उपयोग कर पाते हैं।
