शिकागो में गूँजी भारत के आत्मगौरव की आवाज़: 11 सितम्बर शिकागो दिग्विजय दिवस पर विशेष

Updesh Awasthee
सुरेन्द्र शर्मा:
आज ही के दिन 11 सितम्बर 1893 को वेदांत के विख्यात और अत्यंत  प्रभावशाली आध्यात्मिक संत विवेकानंद जी ने अमेरिका के शिकागो में अपने ऐतिहासिक उद्बोधन में वैश्विक पटल पर सनातन धर्म का ध्येय गुंजायमान किया था- 

अमेरिका जाने से पहले स्वामी विवेकानंद मद्रास (चेन्नई) में थे, तब उन्होंने अखबारों में शिकागो में हो रही धर्म संसद के बारे में सुना था। कहते हैं विवेकानंद को उनके गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने सपने में आकर धर्म संसद में जाने का संदेश दिया था। 30 जुलाई 1893 को स्वामी विवेकानंद अमेरिका के शिकागो पहुंचे, लेकिन वो ये जानकर परेशान हो गए कि सिर्फ जानी-मानी संस्थाओं के प्रतिनिधियों को ही विश्व धर्म संसद में बोलने का मौका मिलेगा.स्वामी विवेकानंद ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट से संपर्क किया, जिन्होंने उन्हें हार्वर्ड में भाषण देने के लिए बुलाया था । राइट स्वामी विवेकानंद से बहुत प्रभावित थे, जब उन्होंने जाना कि धर्म संसद के लिए स्वामी जी के पास किसी संस्था का परिचय नहीं है, तब उन्होंने कहा कि स्वामी जी, आपसे आपके परिचय के लिए पूछना ऐसा ही है जैसे सूरज से पूछा जाए कि स्वर्ग में वो किस अधिकार से चमक रहा है। इसके बाद प्रोफेसर राइट ने धर्म संसद के चेयरमैन को चिट्ठी लिखी, जिसमें उन्होंने लिखा था कि ये व्यक्ति हमारे सभी प्रोफेसरों के ज्ञान से भी ज्यादा ज्ञानी है। 

स्वामी विवेकानंद धर्मसंसद में किसी संस्था के नहीं बल्कि भारत के प्रतिनिधि के तौर पर शामिल किए गए। शिकागो में धर्मसंसद शुरू हुई, स्वामी विवेकानंद का नाम पुकारा गया। सकुचाते हुए स्वामी विवेकानंद मंच पर पहुंचे। वो घबराए हुए थे। माथे पर आए पसीने को उन्होंने पोंछा। लोगों को लगा कि भारत से आया ये नौजवान संन्यासी कुछ बोल नहीं पाएगा। स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु का ध्यान किया और इसके बाद उनके मुंह से जो बोल निकले, उसे धर्म संसद सुनती रह गई, 

"अमरीकी भाइयों और बहनों, आपने जिस स्नेह के साथ मेरा स्वागत किया है उससे मेरा दिल भर आया है. मैं दुनिया की सबसे पुरानी संत परंपरा और सभी धर्मों की जननी की तरफ़ से धन्यवाद देता हूं. सभी जातियों और संप्रदायों के लाखों-करोड़ों हिंदुओं की तरफ़ से आपका आभार व्यक्त करता हूं"
"मैं इस मंच पर बोलने वाले कुछ वक्ताओं का भी धन्यवाद करना चाहता हूं जिन्होंने यह ज़ाहिर किया कि दुनिया में सहिष्णुता का विचार पूरब के देशों से फैला है"
"मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है. हम सिर्फ़ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं"
"मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी. मुझे गर्व है कि हमने अपने दिल में इसराइल की वो पवित्र यादें संजो रखी हैं जिनमें उनके धर्मस्थलों को रोमन हमलावरों ने तहस-नहस कर दिया था और फिर उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली"
"मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और लगातार अब भी उनकी मदद कर रहा है"
"मैं इस मौके पर वह श्लोक सुनाना चाहता हूं जो मैंने बचपन से याद किया और जिसे रोज़ करोड़ों लोग दोहराते है
रुचीनां वैचित्र्यादृजु कुटिलनानापथजुषाम। 
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।।
''जिस तरह अलग-अलग जगहों से निकली नदियां, अलग-अलग रास्तों से होकर आखिरकार समुद्र में मिल जाती हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा से अलग-अलग रास्ते चुनता है. ये रास्ते देखने में भले ही अलग-अलग लगते हैं, लेकिन ये सब ईश्वर तक ही जाते हैं"

"मौजूदा सम्मेलन जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, वह अपने आप में गीता में कहे गए इस उपदेश इसका प्रमाण है: 
ये यथा मा प्रपद्यंते तांस्तथैव भजाम्यहम। 
मम वत्मार्नुर्वतते मनुष्या: पार्थ सर्वश:।।"
"'जो भी मुझ तक आता है, चाहे कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं. लोग अलग-अलग रास्ते चुनते हैं, परेशानियां झेलते हैं, लेकिन आखिर में मुझ तक पहुंचते हैं.''
" सांप्रदायिकता, कट्टरता और इसके भयानक वंशजों के धार्मिक हठ ने लंबे समय से इस खूबसूरत धरती को जकड़ रखा है. उन्होंने इस धरती को हिंसा से भर दिया है और कितनी ही बार यह धरती खून से लाल हो चुकी है. न जाने कितनी सभ्याताएं तबाह हुईं और कितने देश मिटा दिए गए"
"यदि ये ख़ौफ़नाक राक्षस नहीं होते तो मानव समाज कहीं ज़्यादा बेहतर होता, जितना कि अभी है. लेकिन उनका वक़्त अब पूरा हो चुका है. मुझे उम्मीद है कि इस सम्मेलन का बिगुल सभी तरह की कट्टरता, हठधर्मिता और दुखों का विनाश करने वाला होगा. चाहे वह तलवार से हो या फिर कलम से"

इसके बाद जितने दिन भी धर्म संसद चली स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म, और भारत के बारे में दुनिया को वो ज्ञान दिया जिसने हमारे देश की शाश्वत छवि को और प्रखरता प्रदान की।
रोमां रोलां (Romain Rolland) ने स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण और उनके व्यक्तित्व का बहुत प्रभावशाली वर्णन किया है। उनकी पुस्तक The Life of Vivekananda and the Universal Gospel में वे लिखते हैं कि शिकागो में तीस वर्ष के एक लगभग अज्ञात युवा संन्यासी के रूप में आए विवेकानंद ने अपने व्यक्तित्व और गहरी आवाज़ से पूरे सभागार को प्रभावित कर दिया। 

“His words are great music, phrases in the style of Beethoven, stirring rhythms like the march of Handel choruses.”

अर्थात—“उनके शब्द महान संगीत जैसे थे; बीथोवन की शैली के वाक्यों और हैंडल के कोरस की मार्च जैसी स्पंदित लय से भरपूर।” रोलां आगे कहते हैं कि विवेकानंद के शब्दों को पढ़ते हुए भी उनके शरीर में बिजली के झटके जैसी रोमांचकारी अनुभूति होती थी और कल्पना कीजिए कि जब वही शब्द उनके मुख से निकले होंगे तो श्रोताओं पर कितना प्रभाव पड़ा होगा। 

और शिकागो के संदर्भ में रोलां ने यह भी लिखा कि उनकी “commanding presence” के सामने दूसरे वक्ता जैसे भुला दिए गए और उनकी वाणी ने अमेरिकी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने विवेकानंद को “warrior prophet of India” कहा और लिखा कि उनका विचार अमेरिका पर गहरी छाप छोड़ गया। 

एक और महत्वपूर्ण कथन में रोलां ने विवेकानंद को “the personification of the harmony of all Human Energy” कहा—अर्थात “समस्त मानवीय ऊर्जा के सामंजस्य का साक्षात् व्यक्तित्व।”

11 सितंबर 1893 को जब विवेकानंद जी ने “Sisters and Brothers of America” कहकर संबोधन शुरू किया, तो Chicago Herald की रिपोर्ट के अनुसार सभागार में कई मिनट तक तालियों की गड़गड़ाहट हुई। 12 सितंबर को Herald, Daily Inter Ocean, Chicago Tribune और Chicago Record जैसे प्रमुख अखबारों ने उनके भाषण की रिपोर्ट प्रकाशित की। 

Chicago Herald ने उन्हें भारत से आए एक हिंदू संन्यासी के रूप में प्रस्तुत करते हुए उनके भाषण में सहिष्णुता और सभी धर्मों की स्वीकृति को प्रमुखता दी। 

शिकागो में उनकी लोकप्रियता भाषण के बाद लगातार बढ़ी। बाद की अमेरिकी रिपोर्टों में उनके बारे में लिखा गया कि वे अपनी “magnetic presence” और प्रभावशाली वक्तृत्व के कारण विशेष आकर्षण का केंद्र थे। Evanston Index (7 अक्टूबर 1893) ने लिखा कि उनका शिकागो प्रवास “continual ovation” जैसा रहा—अर्थात लगातार स्वागत और प्रशंसा मिलती रही। 

Boston Evening Transcript की 30 सितंबर 1893 की रिपोर्ट ने उन्हें धर्म संसद में मिलने वाली सबसे प्रभावशाली हस्तियों में से एक के रूप में वर्णित किया और उनके व्यक्तित्व तथा प्रभावशाली उपस्थिति पर ध्यान दिया। 
बाद के संकलनों में New York Herald के हवाले से यह प्रसिद्ध टिप्पणी दी गई है कि विवेकानंद “the greatest figure in the Parliament of Religions” थे। उसी संकलन में Boston Evening Transcript के हवाले से कहा गया है कि वे धर्म संसद के “great favourite” थे और मंच पर केवल दिखाई देने पर भी उनका तालियों से स्वागत होता था। 

 लोकप्रियता सिर्फ भाषण तक सीमित नहीं रही
विवेकानंद जी के बाद के अमेरिकी व्याख्यानों में भी बड़ी संख्या में लोग आने लगे। उदाहरण के लिए, Minneapolis Journal ने दिसंबर 1893 में उनके व्याख्यान में “large audience” का उल्लेख किया और उनके हास्य तथा तत्काल जवाब देने की क्षमता पर लिखा। Minneapolis Tribune ने अगले दिन उनके कार्यक्रम में “packed house” की बात कही और उन्हें तेज बुद्धि तथा प्रभावशाली वक्ता बताया। 
सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि अमेरिका में विवेकानंद जी ने भारत को केवल एक औपनिवेशिक देश के रूप में नहीं, बल्कि एक प्राचीन दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपरा वाले राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया। उनके भाषणों का केंद्रीय संदेश धार्मिक सहिष्णुता, सार्वभौमिक स्वीकृति और मानवता की एकता था। 
 “शिकागो में विवेकानंद जी ने केवल भाषण नहीं दिया—उन्होंने अमेरिकी मंच पर भारत की आध्यात्मिक आवाज़ को ऐसी पहचान दिलाई कि उनका अगला कई महीनों का अमेरिकी प्रवास लगातार व्याख्यानों, स्वागत और जनरुचि का केंद्र बन गया।”

शिकागो में 11 सितंबर 1893 के भाषण के बाद भारत में प्रतिक्रिया केवल धार्मिक उत्साह तक सीमित नहीं रही; धीरे-धीरे यह राष्ट्रीय गौरव और आत्मविश्वास का विषय बन गई।
भारतीय समाचारपत्रों ने शिकागो में विवेकानंद के भाषणों और उनके विचारों को प्रमुखता से प्रकाशित किया। The Indian Mirror ने दिसंबर 1893 में शिकागो की रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें विवेकानंद के हिंदू धर्म, प्रेम और सहिष्णुता संबंधी विचारों को जगह मिली। 

स्वामी जी को  भारत के धर्म और संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में देखा गया 1897 में जब वे पश्चिम से भारत लौटे, तो कलकत्ता के स्वागत-संदेश में उनके कार्य को भारत, बंगाल और हिंदू धर्म के लिए गौरव का विषय बताया गया। उस संदेश में कहा गया कि शिकागो में उनकी प्रस्तुति ने अनेक शिक्षित अमेरिकियों के धार्मिक विचारों पर गहरा प्रभाव डाला।  उनके भारत लौटने पर अभूतपूर्व जनउत्साह दिखा
 1897 में उनके अमेरिका से लौटने पर   कोलंबो से मद्रास तक उनका भव्य स्वागत हुआ। स्वयं विवेकानंद ने कहा कि जिस उत्साह और प्रेम से उनका स्वागत हुआ, वह उनकी अपेक्षाओं से भी कहीं अधिक था। उन्होंने यह भी बताया कि श्रीलंका में सामान्य लोगों तक यह बात पहुँच चुकी थी कि भारत से एक संन्यासी शिकागो गया था और उसने सफलता प्राप्त की थी। 
 मद्रास में भीड़ इतनी उत्साहित थी कि उनका भाषण सुनना मुश्किल हो गया मद्रास में उनके स्वागत के दौरान भीड़ इतनी विशाल और उत्साहित थी कि विवेकानंद की आवाज़ लोगों तक ठीक से नहीं पहुँच पा रही थी। उन्होंने लोगों से कहा कि यह उत्साह केवल क्षणिक न रहे, बल्कि इसे स्थायी ऊर्जा में बदलकर भारत के लिए बड़े कार्य किए जाएँ। 
कलकत्ता पहुँचने पर उनकी यात्रा के मार्ग में भारी भीड़ उमड़ी। बाद में एक औपचारिक स्वागत समारोह में उन्हें सम्मानित किया गया और उनके शिकागो के कार्य को भारत तथा हिंदू धर्म के लिए गौरव बताया गया। 
विवेकानंद स्वयं इस लोकप्रियता को व्यक्तिगत विजय नहीं, भारत की आध्यात्मिक शक्ति की अभिव्यक्ति मानते थे। 1897 में उन्होंने अपने स्वागत के अवसर पर कहा कि भारत की विशिष्ट शक्ति धर्म और आध्यात्मिकता रही है और इसी आधार पर भारत को आगे बढ़ना है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने स्वामी विवेकानंद के भाषण को “एक watershed moment” यानी एक निर्णायक ऐतिहासिक क्षण कहा है उन्होंने कहा कि इस भाषण ने सामंजस्य और सार्वभौमिक भाईचारे पर जोर देते हुए भारतीय संस्कृति के आदर्शों को विश्व मंच पर प्रस्तुत किया और यह भारत के इतिहास के सबसे प्रेरणादायक क्षणों में से एक है। 

“शिकागो में एक संन्यासी की वाणी गूँजी थी,
लेकिन उसकी प्रतिध्वनि भारत के करोड़ों हृदयों में सुनाई दी।
भारत ने पहली बार दुनिया के मंच पर अपनी सनातन संस्कृति को
इतने आत्मविश्वास और गौरव के साथ सुना।”
लेखक: सुरेन्द्र शर्मा, भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं।
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