जब निष्कपट भक्ति और अमर जिज्ञासा का मिलन होता है, तो परम ज्ञान का प्राकट्य होता है। पद्म पुराण के पाताल खण्ड में वर्णित देवर्षि नारद और महादेव भगवान शिव का पावन संवाद इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। यह कथा न केवल श्रीकृष्ण की गुप्त भक्ति का मार्ग दिखाती है, बल्कि 'मन्त्र-चिन्तामणि' की अपार महिमा और इसके मानसिक जप की अलौकिक शक्ति को भी उजागर करती है।
कैलाश पर नारद जी की व्याकुलता और शिव जी का उपदेश
देवर्षि नारद के मन में एक बार भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति और उनकी दिव्य लीला-भूमि वृंदावन को साक्षात देखने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हुई। वे जानते थे कि गोलोक और वृंदावन का रहस्य अत्यंत गूढ़ है, जिसे केवल पूर्ण आत्म-समर्पण से ही प्राप्त किया जा सकता है। अपनी इसी व्याकुलता को शांत करने वे कैलाश पर्वत पहुँचे और महादेव से प्रार्थना की कि वे उन्हें श्रीकृष्ण की उस गोपनीय भक्ति का मार्ग बताएं, जिससे जीव संसार के बंधनों से मुक्त हो सके। नारद जी की निष्कपट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें एक गुप्त महामंत्र की दीक्षा दी, जिसे 'मन्त्र-चिन्तामणि' कहा जाता है:
"गोपीजनवल्लभचरणान् शरणं प्रपद्ये।"
शिवजी ने स्पष्ट किया कि जैसे चिन्तामणि रत्न मनचाहा फल प्रदान करता है, वैसे ही यह मंत्र जीव को सीधे श्रीराधा-कृष्ण के चरणों की निकुंज सेवा प्रदान कर देता है। मानसिक जप का महत्व और पापी व्याध के उद्धार की कथा महादेव ने इस मंत्र की महिमा सिद्ध करने के लिए माता पार्वती को एक प्राचीन व्याध (शिकारी) की कथा सुनाई। जीवन भर केवल हिंसा और पाप करने वाले उस शिकारी को एक वैष्णव संत का संग मिला। अनजाने में ही उसके मुख से इस मंत्र का भाव प्रकट हुआ और स्पर्श मात्र से उसका आंतरिक अंधकार नष्ट हो गया।
शिकारी ने अपने हथियार त्याग दिए और अपनी शेष आयु इस मंत्र के निरंतर मानसिक जप में लगा दी। मानसिक जप का प्रभाव इतना प्रबल था कि अंत समय में यमदूतों के स्थान पर गोलोक से दिव्य विमान आया और वह सीधे श्रीकृष्ण धाम पहुँचा।
मन्त्र-चिन्तामणि की मुख्य विशेषताएँ
• शरणगति का भाव: जब साधक कहता है कि "मैं गोपीजनवल्लभ के चरणों की शरण लेता हूँ", तो भगवान उसके पिछले पापों का विचार किए बिना उसे स्वीकार कर लेते हैं।
• नियमों से पूर्ण स्वतंत्रता: इस महामंत्र के जप के लिए किसी विशेष काल, कठिन विधि-विधान, पुरश्चरण या न्यास की आवश्यकता नहीं होती।
• सर्व-अधिकार: स्त्री, पुरुष या किसी भी वर्ग का व्यक्ति, जिसमें सच्ची भक्ति है, इसे जप सकता है।
• तनाव और चिंता का त्वरित निवारण: यह अनुभवजन्य सत्य कि कठिन समय में इस मंत्र के निरंतर मानसिक जाप से चिंता का समाधान शीघ्र ही हो जाता है।
इस कथा का आध्यात्मिक निष्कर्ष
यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान श्रीकृष्ण का मन्त्र-चिन्तामणि या उनका नाम कितना कृपालु है। साधारण रत्न (चिन्तामणि) केवल सांसारिक वस्तुएं दे सकता है, लेकिन यह मंत्र साक्षात भगवान के हृदय में स्थान देता है। जब कोई जीव असहाय होकर भगवान की शरण में जाता है, तो ठाकुर जी उसके करोड़ों जन्मों के पापों को एक क्षण में भस्म कर देते हैं।
मानसिक जप का मूल महत्व यही है कि यह साधक को बाह्य आडंबरों से मुक्त कर सीधे प्रभु के चरणों से जोड़ देता है। अज्ञानता में भी किया गया इसका एक बार का स्मरण सारे ताप हर लेता है।
प्रस्तुति: श्री गीतांजलि ज्योतिष केंद्र, इंदौर।

