भोपाल, 4 सितंबर 2026: राजनीति के फार्मूले कभी एक्सपायर नहीं होते। कभी समय, कभी स्थान और कभी नेता बदल जाते हैं लेकिन फॉर्मूले वहीं रहते हैं। 2019 में अतिथि शिक्षकों के साथ जो कुछ भी हुआ, 2026 में आंदोलन कर रहे शिक्षक भर्ती की अभ्यर्थियों ने उसे घटनाक्रम से कुछ नहीं सीखा। इस बार भी नेता और जनता दोनों बदल गई है लेकिन फॉर्मूला वही है। अब देखना यह है कि, क्या शिक्षक भर्ती अभ्यर्थियों के साथ भी वही होगा, जो 2019 अतिथि शिक्षकों के साथ हुआ था।
फार्मूला क्या है
पॉलिटिक्स का सिंपल सा फार्मूला है। जब नागरिकों का कोई समूह सरकार की किसी नीति या निर्णय से नाराज हो जाता है तो आंदोलन करता है। इस प्रकार के नागरिक, एक मुद्दे को लेकर समूह में एकत्रित हो जाते हैं लेकिन नेतृत्व की कमी के कारण ज्यादा देर तक संगठित नहीं रह पाते। सामान्य नागरिक होते हैं इसलिए खुद को कमजोर समझते हैं। इस कमी को पूरा करता है एक पॉलिटिकल लीडर। वह नागरिकों के समूह के बीच जाता है, और उनको यकीन दिलाता है कि मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा, मैं तुम्हारी मांग पूरी करवाऊंगा। इस प्रकार बिना परिश्रम के उसके साथ एक बहुत बड़ी भीड़ एकत्रित हो जाती है। मांग पूरी हो गई तो जय जयकार, नहीं हुई तो सद्भावना मिलती है। लोग कहते हैं कम से कम कोशिश तो की, हमारी लड़ाई में हमारे साथ खड़े रहे। लोगों को यह नहीं पता कि, इस भीड़ के माध्यम से नेता अपनी पार्टी में कितना बड़ा हो जाता है और उसको कितना फायदा होता है।
2019 में क्या हुआ था
2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी (राहुल गांधी और कमलनाथ) द्वारा कहा गया था कि मध्य प्रदेश में कोई भी अस्थाई कर्मचारी नहीं होगा। अतिथि विद्वान और अतिथि शिक्षकों को नियमित करने के लिए पॉलिसी बनाई जाएगी और कार्यक्रम लागू किया जाएगा। सरकार का 1 साल पूरा हो जाने तक इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ तो अतिथि विद्वान और अतिथि शिक्षकों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया। श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया उन दिनों कांग्रेस में थे, और कमलनाथ से नाराज चल रहे थे, लेकिन कांग्रेस का हाई कमान कमलनाथ को मध्य प्रदेश का बड़ा नेता मानता था। श्री सिंधिया ने खुद को कमलनाथ से बड़ा और लोकप्रिय नेता साबित करने के लिए अतिथि शिक्षकों को "तलवार, ढाल और सिंधिया परिवार की परंपरा, वचनबद्धता" जैसा बयान दे दिया। अतिथि शिक्षकों ने सिंधिया के समर्थन में सोशल मीडिया रंग डाला। सोनिया गांधी ने तो इसके बाद भी सिंधिया को मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा नेता नहीं माना लेकिन भाजपा की हाई कमान ने मान लिया। इसके बाद क्या हुआ आपको पता ही है।
अब क्या होने वाला है
इस बार शिक्षक भर्ती परीक्षा के आंदोलनकारी ने श्री दिग्विजय सिंह को अपना नेता बनाया है। 5 सितंबर को वह 24 घंटे के उपवास पर बैठने वाले हैं। सब जानते हैं कि मध्य प्रदेश में लोक श्री दिग्विजय सिंह के नाम पर वोट नहीं देते तो श्री उदय प्रताप सिंह जैसा मंत्री पद वृद्धि क्यों करेगा। उनको करना होता तो खुद मंच पर आकर क्रेडिट नहीं ले जाते, श्री दिग्विजय सिंह को नेता बनने का मौका ही क्यों देते। मतलब इस बात की संभावना बहुत कम है कि, श्री दिग्विजय सिंह के कारण अभ्यर्थियों को कुछ मिलने वाला है, लेकिन एक बात पक्का होगी। 5 सितंबर के कार्यक्रम में दिग्विजय सिंह के समर्थक आएंगे। बड़ी भीड़ खड़ी हो जाएगी। अब व्यक्तियों का क्या होगा यह तो पता नहीं लेकिन इस कार्यक्रम के फोटो और वीडियो, कांग्रेस हाई कमान के सामने एक बात को प्रमाणित कर देंगे। श्री दिग्विजय सिंह 80 साल की उम्र में भी मध्य प्रदेश के लोकप्रिय नेता हैं। राहुल गांधी जिनके लिए तरस रहे हैं, दिग्विजय सिंह इस Gen Z पीढ़ी के लीडर हैं। प्रदेश अध्यक्ष श्री जीतू पटवारी, नेता प्रतिपक्ष श्री उमंग सिंघार, इत्यादि तमाम कांग्रेस के नेताओं की तुलना में, 80 वर्ष के युवा श्री दिग्विजय सिंह, मध्य प्रदेश के युवाओं के नेता हैं।
आपको याद होगा पिछले दिनों श्री दिग्विजय सिंह सक्रिय राजनीति से रिटायर हो गए थे। आज की तारीख में उनके पास ना तो कांग्रेस पार्टी का कोई पद है और ना ही वह जनप्रतिनिधि हैं। राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त हो चुका है। अब वह हर मामले में "पूर्व" हैं, लेकिन 5 सितंबर के आंदोलन के बाद, अभ्यर्थियों का जो भी हो, श्री दिग्विजय सिंह कांग्रेस की मुख्य धारा के सबसे बड़े नेता होंगे।

