धर्म एवं ज्योतिष न्यूज डेस्क, 16 सितंबर 2026: संतान सप्तमी की व्रत और पूजा को लेकर दो प्रकार के मत सामने आ रहे हैं। महिलाओं में काफी कंफ्यूजन है। कुछ विद्वानों का कहना है की संतान सप्तमी की पूजा 17 सितंबर को की जानी चाहिए और कुछ इनफ्लुएंसर, टीवी चैनल और न्यूज़ पोर्टल पंचांग में उदया तिथि के आधार पर 18 सितंबर को संतान सप्तमी बता रहे हैं। हम स्पष्ट करना चाहते हैं संतान सप्तमी की पूजा तो 17 को ही होगी, 18 को तिथि है लेकिन संतान सप्तमी की पूजा का कोई विधान नहीं है। 18 सितंबर को तो ऐसा योग बन रहा है जो पूर्व में अर्जित पुण्यों का क्षय करता है। विषय संतान का है इसलिए हम पूरी संवेदनशीलता के साथ शास्त्रीय आधार पर तर्क सहित बता रहे हैं, कृपया ध्यान पूर्वक पढ़िए:-
संतान सप्तमी की तिथि एवं शुभ अशुभ विचार, निर्णय सिंधु के अनुसार
इंदौर की प्रख्यात ज्योतिर्विद महर्षि गीतांजलि के अनुसार 'निर्णयसिंधु' के प्रथम परिच्छेद में सप्तमी तिथि के निर्धारण, उसके भेद (पूर्व वेध और पर वेध) तथा व्रत की तिथि के संबंध में निम्नलिखित धर्मशास्त्रीय नियम दिए गए हैं:
सप्तमी तिथि का सामान्य निर्णय एवं युग्म नियम
शब्द थोड़े कठिन हो सकते हैं लेकिन आगे हम इसको सरल हिंदी में भी समझा देंगे। फिलहाल निर्णय सिंधु में क्या लिखा हुआ है वह समझ लेते हैं। 'निर्णयसिंधु' में तिथियों के शुभ निर्णय के लिए 'युग्म वाक्य' (तिथियों के जोड़े के नियम) को आधार माना गया है।
शास्त्रों के अनुसार षष्ठी और सप्तमी तिथि का जोड़ा शुभ निर्धारित किया गया है।
अतः सप्तमी तिथि सदैव षष्ठी तिथि से युक्त (पूर्वा-विद्धा) होने पर ही प्रथम ग्राह्य और श्रेष्ठ मानी जाती है ("सप्तमी पूर्वैव युग्मवाक्यात्")।
इसके समर्थन में स्कन्द पुराण के वचन को उद्धृत किया गया है:
"षष्ठ्या युता सप्तमी च कर्तव्या तात सर्वदा"
अर्थात् हे तात! सप्तमी तिथि सदैव षष्ठी (छठ) से संयुक्त ही करनी चाहिए।
पूर्व वेध (पूर्वा-विद्धा) और पर वेध (पर-विद्धा) का भेद
तिथि वेध के आधार पर सप्तमी के दो मुख्य भेद समझे जाते हैं:
पूर्व वेध (पूर्वा-विद्धा / षष्ठी-युक्ता):
जब सप्तमी तिथि अपनी पूर्व तिथि यानी षष्ठी तिथि से मिली हुई होती है, तो इसे 'पूर्व वेध' या 'पूर्वा-विद्धा' कहा जाता है। 'निर्णयसिंधु' के अनुसार, सप्तमी के व्रतों और देव-कार्यों के लिए यही पूर्वा-विद्धा (षष्ठी-युक्ता) सप्तमी पूर्णतः शास्त्रसम्मत और महाफलदायी होती है।
पर वेध (पर-विद्धा / अष्टमी-युक्ता):
जब सप्तमी तिथि अपनी उत्तर (अगली) तिथि यानी अष्टमी से संयुक्त होती है, तो इसे 'पर वेध' या 'पर-विद्धा' कहते हैं। युग्म शास्त्र के अनुसार, अष्टमी से मिली हुई सप्तमी (विपरीत युग्म) को दोषपूर्ण माना गया है, जो पूर्व में अर्जित पुण्यों का क्षय करती है।
वेध (नाड़ी) का विशेष नियम
'निर्णयसिंधु' में स्कन्द पुराण के हवाले से तिथियों के विशिष्ट 'नाड़ी वेध' का वर्णन है। सप्तमी तिथि के संदर्भ में 12 नाड़ियों (घड़ियों) द्वारा वेध का विचार किया जाता है, जहाँ पूर्व तिथि का प्रभाव अगली तिथि को वींधकर प्रभावित करता है।
'पद्मक्र योग' की महिमा
'निर्णयामृते' के उद्धरण के अनुसार, यदि षष्ठी से युक्त सप्तमी तिथि रविवार के दिन पड़े, तो इस विशेष संयोग को 'पद्मक योग' कहा जाता है:
"षष्ठी च सप्तमी चैव वारश्चैवांशुमालिनः। योगोयं पद्मको नाम सूर्यकोटिग्रहैः समः॥"
अर्थात् षष्ठी-युक्ता सप्तमी और रविवार का यह योग सौ करोड़ (100 करोड़) सूर्य ग्रहणों के समान महान पुण्य फल प्रदान करने वाला होता है।
निष्कर्ष: सप्तमी का व्रत किस दिन रखा जाए?
इन शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर सप्तमी का व्रत उसी दिन रखा जाना चाहिए जिस दिन सप्तमी तिथि षष्ठी तिथि से संयुक्त (पूर्वा-विद्धा) हो। यदि सप्तमी तिथि अष्टमी से युक्त (पर-विद्धा) हो रही हो, तो उसे त्यागकर षष्ठी-मिश्रित सप्तमी वाले दिन ही व्रत का अनुष्ठान करना शास्त्रसम्मत है।
संतान सप्तमी की तिथि निर्धारण का फार्मूला
वर्ष 2026 में संतान सप्तमी का व्रत 17 सितंबर 2026, गुरुवार को अनुष्ठित करना ही सर्वाधिक शास्त्रसम्मत निर्णय है। निर्णय सिंधु के अलावा अन्य शास्त्रों में भी इसके प्रमाण मिलते हैं।
वीरमित्रोदय (समयप्रकाश) में कहा गया है “सा च सर्वत्र दैवे पूर्वविद्धैव ग्राह्या।”।
इसके समर्थन में भविष्यपुराण तथा स्कन्दपुराण के वचन उद्धृत हैं “षष्ठीसमेता कर्तव्या सप्तमी नाष्टमीयुता” एवं “षष्ठ्या युक्ता सप्तमी च कर्तव्या तात! सर्वदा।”।
नारदपुराण के अनुसार “षष्ठी चैकादशी... पूर्वविद्धा... कर्तव्या सप्तमी सदा”।
काशी के प्रसिद्ध हृषीकेश पंचांग तथा जबलपुर के लोकविजय पंचांग ने भी निर्णयसिंधु के “सप्तमी पूर्वयुता ग्राह्या” सिद्धान्त का अनुसरण करते हुए 17 सितंबर के निर्णय का समर्थन किया है।
काल-गणना एवं तिथि-विभेद
17 सितंबर को काल की स्थिति इस प्रकार निर्मित हो रही है:
17 सितंबर 2026 (भोपाल पंचांग समय): सूर्योदय (लगभग प्रातः 6:07 बजे) के समय षष्ठी तिथि विद्यमान रहेगी, जो प्रातः 10:48 बजे तक रहेगी। तत्पश्चात् 10:48 बजे सप्तमी तिथि का प्रवेश होता है।
पूर्वविद्धा एवं मध्याह्न योग: 17 सितंबर को सूर्योदयकालीन षष्ठी का सम्बन्ध दोपहर की सप्तमी तिथि से बन रहा है तथा मध्याह्न काल में सप्तमी तिथि पूर्णतः विद्यमान रहती है। संतान सप्तमी में मध्याह्न कालीन पूजन की विशेष परम्परा है, अतः यह स्थिति शास्त्रानुकूल है।
18 सितंबर का विचार: 18 सितंबर को सूर्योदय के समय केवल उदयातिथि/शुद्ध सप्तमी है, किन्तु वह षष्ठी से पूर्वविद्धा नहीं है। यद्यपि कुछ आधुनिक पंचांग व समाचार स्रोत (जैसे Live Hindustan, Times Now) उदयातिथि को प्राथमिकता देकर 18 सितंबर बताते हैं, परंतु निर्णयसिंधु के विशेष पूर्वविद्धा नियम के अनुसार 17 सितंबर का दिन ही तर्कसंगत एवं शास्त्रसम्मत है।
शुभ पूजन मुहूर्त एवं समय
17 सितंबर 2026 (गुरुवार) को भोपाल पंचांगानुसार पूजन हेतु काल-सारणी:
सूर्योदय: लगभग प्रातः 6:07 बजे
षष्ठी तिथि समाप्ति एवं सप्तमी तिथि आरम्भ: प्रातः 10:48 बजे
मुख्य पूजन हेतु श्रेष्ठ अभिजित् मुहूर्त: प्रातः 11:50 बजे से दोपहर 12:39 बजे तक
राहुकाल (वर्ज्य काल): दोपहर 1:46 बजे से 3:18 बजे तक
सूर्यास्त: सायंकाल लगभग 6:22 बजे
पूजन-विधान एवं क्रम
पूजन को पूर्ण विधि-विधान से सम्पन्न करने हेतु निम्नलिखित क्रम का पालन करें:
प्रातः 11:50 बजे: व्रत का संकल्प लें तथा मुख्य पूजन आरम्भ करें।
दोपहर 12:00 बजे से 12:25 बजे के मध्य:
भगवान शिव एवं माता पार्वती का पूजन करें।
संतान सप्तमी की व्रत कथा का भक्तिपूर्वक श्रवण या वाचन करें।
7 पूए अथवा पूड़ी का नैवेद्य (भोग) अर्पित करें।
7 गांठ वाले पवित्र डोरे (रक्षासूत्र) का पूजन करें।
दोपहर 12:39 बजे से पूर्व: मुख्य पूजन की प्रक्रिया पूर्ण कर लें।
यह समय षष्ठी-युक्त पूर्वविद्धा सप्तमी के दिन, सप्तमी तिथि के भीतर तथा अभिजित्/मध्याह्न मुहूर्त के अत्यंत निकट आता है, जिससे पूजन का पूर्ण फल प्राप्त होता है। प्रस्तुति: श्यामला ज्योतिष पीठ, भोपाल।

