भोपाल, 3 सितंबर 2026: जब एक बड़ी और रसूखदार कॉर्पोरेट कंपनी अपने पेचीदा नियमों और शर्तों (Terms & Conditions) का हवाला देकर एक आम उपभोक्ता के हक का पैसा दबाने की कोशिश कर रही हो, तो वहां केवल कानून की गहरी समझ और तीक्ष्ण बुद्धि-कौशल ही न्याय का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। भोपाल जिला उपभोक्ता आयोग (क्रमांक-1) में होम इंटीरियर कंपनी लिवस्पेस (Livspace) के खिलाफ आए हालिया फैसले में ऐसा ही देखने को मिला, जहां पीड़ित प्रतीक सारस्वत को न्याय दिलाने में उनकी अधिवक्ता डॉ. प्राप्ति सक्सेना ने असाधारण कानूनी सूझबूझ का प्रदर्शन किया।
मामला: प्रतीक सारस्वत बनाम लिवस्पेस कंपनी
मामला तब शुरू हुआ जब सलैया, भोपाल; निवासी प्रतीक सारस्वत ने अपने घर के रिनोवेशन के लिए मॉड्युलर फर्नीचर (Modular Furniture) की तलाश में 25 जुलाई 2025 को नर्मदापुरम रोड, भोपाल स्थित लिवस्पेस के शोरूम से संपर्क किया था। शोरूम के प्रतिनिधियों ने उन्हें आश्वासन दिया कि यदि वे ₹25,000 की एडवांस राशि जमा कर बुकिंग करते हैं और किसी भी कारण से 48 घंटे के भीतर इसे रद्द करते हैं, तो पूरी राशि सीधे उनके बैंक खाते में वापस (Cash Refund) कर दी जाएगी। इस भरोसे पर प्रतीक ने उसी दिन ₹25,000 का ऑनलाइन भुगतान कर दिया। हालांकि, बाद में प्रोडक्ट्स की रेंज और उनके दाम पसंद न आने के कारण उन्होंने मात्र 12 घंटे के भीतर (26 जुलाई 2025 को) ही बुकिंग रद्द करने और रिफंड की मांग कर दी।
कॉर्पोरेट कंपनी की 'गिफ्ट कार्ड' वाली चाल
कंपनी ने कैश रिफंड (नकद वापसी) करने के बजाय उपभोक्ता को एक साल की वैलिडिटी वाला 'गिफ्ट कार्ड' थमा दिया। राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन से भी मदद न मिलने पर हताश ग्राहक ने एडवोकेट डॉ. प्राप्ति सक्सेना से संपर्क (9893191239) किया। डॉ. प्राप्ति सक्सेना ने सबसे पहले 14 सितंबर 2025 को कंपनी को एक बेहद सटीक और कड़ा कानूनी नोटिस (Legal Notice) भेजा। इसके बाद उन्होंने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 35 के तहत फोरम में शिकायत दर्ज कराई।
अदालत में ध्वस्त किए कंपनी के दावे और पॉलिसी
आपने अक्सर देखा होगा बड़ी प्राइवेट कंपनी अक्सर ग्राहकों के साथ अपनी पॉलिसी की बात करती हैं। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ। सुनवाई के दौरान कंपनी के वकीलों ने नामी कानूनी मिसालों (जैसे SGS India Ltd. vs Dolphin International Ltd.) और ईमेल के जरिए भेजी गई अपनी सख्त 'कैंसिलेशन पॉलिसी' का हवाला देकर खुद को बचाने की पुरजोर कोशिश की। कंपनी ने तर्क दिया कि उन्होंने बुकिंग के बाद ग्राहक को एक 'स्वागत ईमेल' (Welcome Mail) भेजा था, जिसमें उनकी कड़े नियमों वाली कैंसिलेशन पॉलिसी स्पष्ट रूप से दी गई थी। कंपनी का कहना था कि उनकी नीतियों के तहत नकद रिफंड संभव नहीं था और गिफ्ट कार्ड जारी कर उन्होंने कोई सेवा में कमी नहीं की। लेकिन डॉ. प्राप्ति सक्सेना ने अपने बुद्धि कौशल (Sharp Intellectual Acumen) का परिचय देते हुए कंपनी की पूरी डिफेंस लाइन को ही ध्वस्त कर दिया:
मामले में न्याय स्थापित करने वाला अकाट्य तर्क
एडवोकेट डॉ. प्राप्ति सक्सेना ने आयोग के समक्ष मजबूती से यह अकाट्य तर्क रखा कि बुकिंग के समय उपभोक्ता और कंपनी के बीच ऐसा कोई लिखित अनुबंध या करार नहीं हुआ था, जिसमें नकद रिफंड न देने या जबरन गिफ्ट कार्ड स्वीकार करने की कोई शर्त हो। यह अकाट्य तर्क उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम से नहीं बल्कि भारतीय संविदा अधिनियम 1872 से आता है। इसके बारे में शायद कंपनी मैनेजमेंट ने विचार तक नहीं किया था।
उन्होंने साबित किया कि बुकिंग के बाद ग्राहकों पर मनमाने नियम थोपना पूरी तरह से अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice) और सेवा में कमी (Deficiency in Service) है। उन्होंने आयोग के सामने शिकायतकर्ता के ईमेल पत्राचार, भुगतान की रसीदें और रिफंड रिक्वेस्ट की टाइमलाइन को इतने व्यवस्थित ढंग से पेश किया कि कंपनी के पास अपनी बेगुनाही का कोई तर्क ही नहीं बचा।
₹25000 9% ब्याज के साथ, प्लस ₹10000 मुआवजा
एडवोकेट डॉ. प्राप्ति सक्सेना के अकाट्य तर्कों और बेहतरीन केस मैनेजमेंट से आयोग सहमत हुआ। पीठ ने लिवस्पेस को आदेश दिया कि वह ग्राहक को ₹25,000 की राशि 9% वार्षिक ब्याज के साथ लौटाए, मानसिक प्रताड़ना के लिए ₹10,000 का मुआवजा दे और ₹5,000 मुकदमा खर्च भी चुकाए। यह जीत न केवल पीड़ित प्रतीक सारस्वत की है, बल्कि यह एडवोकेट डॉ. प्राप्ति सक्सेना के उस उत्कृष्ट पेशेवर कौशल (Professional Skill) और कानूनी प्रतिभा का भी प्रमाण है, जिसने एक कॉर्पोरेट दिग्गज को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया और उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा की। रिपोर्ट: सत्येंद्र सरल (91652 24289)।
About Advocate Dr. Prapti Saxena, Bhopal
डॉ प्राप्ति सक्सेना, भोपाल के सिविल कोर्ट में वकालत करने वाली एक अधिवक्ता (Advocate) हैं। वह दीवानी (Civil) मामलों की कानूनी सलाहकार के रूप में कार्य करती हैं। उपभोक्ता, सिविल, रेरा एवं पारिवारिक विवाद मामलों की विशेषज्ञ मानी जाती हैं। मुख्य रूप से भोपाल के सिविल कोर्ट (Civil Court, Bhopal) में अपनी सेवाएं देती हैं।

