नई दिल्ली, 12 सितंबर 2026: क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो मेडिकल रिपोर्ट के हिसाब से बिल्कुल फिट है, कैलेंडर में दिनों की गिनती करना भूल सकता है। मुंबई बम धमाका के मामले में अपराधी गैंगस्टर अबू सालेम अब्दुल कय्यूम अंसारी समय की गणना करना भूल गया। उसमें समय से पहले ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी कि मेरी सजा पूरी हो गई है, मुझे जेल से रिहा कर दिया जाए।
रिहाई के दावे का आधार
अबू सालेम ने बंबई उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दावा किया था कि वह पुर्तगाल से प्रत्यर्पण के बाद 25 वर्ष की अधिकतम सजा पूरी कर चुका है। भारत सरकार ने पुर्तगाल सरकार को आश्वासन दिया था कि उसको 25 वर्ष से अधिक जेल की सजा नहीं होगी। सालेम के अनुसार, 30 जून 2026 तक उसकी विचाराधीन हिरासत (11 वर्ष, 9 महीने, 26 दिन), सजा सुनाए जाने के बाद की हिरासत (11 वर्ष, 4 महीने, 4 दिन) और जेल में अर्जित छूट/रेमिशन (3 वर्ष, 6 महीने, 2 दिन) को मिलाकर कुल हिरासत 26 वर्ष, 9 महीने और 22 दिन हो चुकी है। इस प्रकार प्रत्यर्पण की शर्त के अनुसार वह 25 वर्ष जेल में व्यतीत कर चुका है। अब उसको मुक्त कर दिया जाना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय का फैसला और तर्क
शीर्ष अदालत ने सालेम द्वारा दी गई गणना को अमान्य ठहराया। अदालत ने पाया कि 25 फरवरी 2015 (पहले टाडा मामले में सजा) से 7 सितंबर 2017 (दूसरे मामले में सजा) के बीच की अवधि को सालेम की ओर से एक मामले में सजा के बाद की हिरासत और दूसरे मामले में विचाराधीन हिरासत के रूप में दोहरा (double count) गिना गया था। चूंकि दोनों मामलों की सजाएं समवर्ती (concurrently) चलाने का निर्देश था, इसलिए एक ही अवधि को दो बार नहीं जोड़ा जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय के 11 जुलाई 2022 के फैसले के अनुसार, सालेम की 25 साल की सजा की गणना 12 अक्टूबर 2005 से शुरू होगी।
संप्रभु आश्वासन का अर्थ: भारत सरकार ने 17 दिसंबर 2002 को तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के माध्यम से पुर्तगाल सरकार को संप्रभु आश्वासन (Sovereign Assurance) दिया था कि सालेम को मृत्युदंड या 25 वर्ष से अधिक की सजा नहीं दी जाएगी। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह आश्वासन केवल अधिकतम हिरासत की सीमा तय करता है, यह सालेम की उम्रकैद की सजा को 25 साल की निश्चित सजा (fixed-term sentence) में नहीं बदलता।
अदालत ने निर्णय दिया कि उम्रकैद की सजा कायम रहने के कारण जेल में अर्जित छूट (jail-earned remission) को जोड़कर 25 वर्ष की वास्तविक अवधि को समय से पहले पूरा नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने माना कि सालेम की 25 वर्ष की वास्तविक हिरासत अभी पूरी नहीं हुई है और उसकी रिहाई की याचिका समयपूर्व (premature) है। इसलिए खारिज की जाती है।

