भोपाल, 30 सितंबर 2026: लोग सुबह-शाम पानी पीपी कर मीडिया को कोसते रहते हैं, लेकिन असलियत यह है कि, भोपाल में दैनिक भास्कर और हरिभूमि जैसे प्रतिष्ठित और शक्तिशाली अखबार भी जनता का दर्द नहीं छाप सकते। यदि छाप छापते हैं तो आप स्वयं देखिए किस प्रकार का व्यवहार किया जाता है:-
यात्री सिर्फ SORRY चाहता था
बात कुछ ऐसी है कि, सुनील नाम का एक रेल यात्री भोपाल से अशोकनगर जाना चाहता था। भोपाल रेलवे स्टेशन पर, जब लंबी कतार का संघर्ष करते हुए वह टिकट विंडो पर पहुंचा दो वहां मौजूद महिला यात्री, कान में ईयरबड लगाए हुए थी और प्रश्नों का ठीक प्रकार से उत्तर नहीं दे रही थी। यात्री ने अपने कमरे से वीडियो बनाना शुरू किया तो FIR का प्रेशर क्रिएट किया गया। यात्री ने अनुरोध किया है कि रेलवे स्टेशन के वह सभी सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग, सुरक्षित रखी जाए जहां से इस घटना को रिकॉर्ड किया गया। यात्री केवल इतना चाहता था कि महिला कर्मचारी को कम से कम एक फटकार तो लगाई जाए। ताकि उनको पता चले कि यात्रियों का लंबी कतार वाला संघर्ष उनको कितना तनाव में ला देता है और ऐसी स्थिति में यदि कर्मचारी, मर्यादित शब्दों का प्रयोग ना करें तो स्थिति को नियंत्रण से बाहर होने में समय नहीं लगता।
जनसंपर्क अधिकारी ने बात का बतंगड़ बना दिया
यह समाचार दिनांक 28 सितंबर 2026 को दैनिक भास्कर और हरिभूमि में प्रकाशित हुआ। कोई बड़ी बात नहीं थी, मामला खत्म हो चुका था। यात्री को SORRY नहीं मिला तो उसने पत्रकारों से शिकायत की और न्यूज़ छप गई। इतने भर से यात्री का गुस्सा शांत हो गया होगा लेकिन पश्चिम मध्य रेलवे के जनसंपर्क अधिकारी ने बात का बतंगड़ बना डाला। उन्होंने दैनिक भास्कर और हरिभूमि के मुख्य संपादक के नाम पत्र लिखा। हम दोनों पत्र संलग्न कर रहे हैं कृपया पढ़िए फिर आगे बात करते हैं।
जनसंपर्क अधिकारी से कुछ सवाल
- आपको इस मामले में जांच अधिकारी किसने नियुक्त किया, और क्या आपको इस प्रकार के किसी भी मामले का जांच अधिकारी नियुक्त किया जा सकता है?
- महिला कर्मचारी ने कहा कि उनकी संतान का फोन आया था और अपने मान लिया, उनके मोबाइल में इनकमिंग तक चेक नहीं की?। आपके लिए यात्री महत्वपूर्ण है या कर्मचारी?
- पॉइंट टू पॉइंट 10 से ज्यादा सवाल बनते हैं लेकिन सबको कंपाइल करें तो एक सवाल बनता है, अपने दोनों समाचार पत्रों के मुख्य संपादक को पत्र लिखा है, तो फिर उसे भोपाल की समस्त मीडिया के साथ शेयर क्यों किया?
- चलिए ठीक है, मान लेते हैं की जांच की गई, लेकिन यह कैसे मान लें कि आपने जो लिखा है वही सही है। अपने मीडिया के साथ जो जांच रिपोर्ट शेयर की है, उसके साथ सीसीटीवी का रिकॉर्ड शेयर क्यों नहीं किया। हम भी तो देखें आपके वीडियो में क्या दिखाई दे रहा है।
जनसंपर्क अधिकारी का काम होता है बात के बतंगड़ को रोकना, किसी भी मुद्दे का नॉर्मलाइजेशन कर देना लेकिन यहां तो नॉर्मलाइज हो चुकी बात का बतंगड़ बना दिया।
यह विषय हम अपने पाठकों के साथ इसलिए शेयर कर रहे हैं ताकि, सबको पता चल सके कि पत्रकारिता अब कितनी मुश्किल हो गई है। यदि कोई पत्रकार जनता की आवाज सुने और उसके आधार पर एक समाचार लिखे तो उसके संपादक से उसकी शिकायत कर दी जाती है। अखबार को बदनाम किया जाता है। लिखा जाता है कि "आपके प्रतिष्ठित समाचार पत्र से सदैव निष्पक्ष, तथ्यपरक और संतुलित पत्रकारता की अपेक्षा रहती है"। मतलब जो समाचार प्रकाशित हुआ वह निष्पक्ष, तथ्यपरक और संतुलित नहीं था?
रेलवे के जनसंपर्क विभाग को एक बात ध्यान रखनी चाहिए, समाचार पत्रों को रेलवे की तरफ से बड़े विज्ञापन मिलते हैं। मुख्य संपादक आपके प्रेशर में आ सकता है लेकिन अखबार में नौकरी करने वाला पत्रकार भी सोशल मीडिया पर स्वतंत्र होता है। यदि इस प्रकार पत्रकारों को रेलवे का दुश्मन बनाया तो, एक दिन ऐसा भी आएगा जब हालत गंभीर हो जाएंगे। देश भर में हजारों पत्रकार रेलवे की किसी एक गलती का इंतजार करेंगे। निष्पक्ष, तथ्यपरक और संतुलित पत्रकारिता करेंगे।





