साइबर पुलिस मनमाने तरीके से बैंक खाता फ्रीज नहीं कर सकती: हाई कोर्ट

Updesh Awasthee
इंदौर, 15 सितंबर 2026:
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने साइबर अपराध शाखाओं के निर्देश पर बैंकों द्वारा खाते फ्रीज किए जाने के मामले में एक अहम निर्णय सुनाया है। माननीय न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट (Hon'ble Shri Justice Sandeep N. Bhatt) ने 15 सितंबर 2026 को रिट याचिका संख्या 38134 / 2026 (Writ Petition No. 38134 of 2026) का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता के बैंक खाते को तुरंत अनफ्रीज (Unfreeze) करने का आदेश जारी किया है। 

मामले की पृष्ठभूमि और विवाद की विस्तृत कहानी

यह याचिका सोनू ट्रेडर्स (स्वामित्व: सोनू राठौर) द्वारा आईडीएफसी फर्स्ट बैंक (शाखा प्रबंधक, उज्जैन शाखा) के खिलाफ दायर की गई थी। याचिकाकर्ता का खाता संख्या 10124658705 आईडीएफसी फर्स्ट बैंक, उज्जैन शाखा में संचालित था। साइबर क्राइम पुलिस एजेंसियों की ओर से मिली एक सूचना के आधार पर बैंक ने याचिकाकर्ता के इस खाते पर होल्ड/फ्रीज/लियन (hold/freeze/lien) लगा दिया था। इसके विरोध में याचिकाकर्ता ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 (Article 226 of the Constitution of India) के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि:
  • बैंक खाते पर लगे फ्रीज/होल्ड/लियन को तत्काल हटाया जाए।
  • जिस शिकायत या निर्देश के आधार पर खाता फ्रीज किया गया है, उसकी पूरी जानकारी याचिकाकर्ता को एक तय समय-सीमा के भीतर दी जाए।
  • याचिका का खर्च एवं अन्य न्यायोचित राहत प्रदान की जाए।
इस मामले में साइबर क्राइम एजेंसियों द्वारा विवादित बताई गई राशि मात्र ₹4,000/- थी।

वकीलों के तर्क एवं संदर्भ (Arguments of Counsels)

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता का पक्ष: याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्री विशाल चौहान (Shri Vishal Chouhan) ने कोर्ट के समक्ष पक्ष रखते हुए कहा कि यह मामला हाईकोर्ट द्वारा पूर्व में पारित 'मैल्कम मुरईस व अन्य बनाम स्टेट बैंक ऑफ इंडिया व अन्य' (Malcolm Murayis & Ors. Vs. State Bank of India and Others - W.P. No. 1100/2024, आदेश दिनांक 26.04.2024) के फैसले से पूरी तरह से आच्छादित (squarely covered) है।

मैल्कम मुरईस मामले में उठाए गए मुख्य कानूनी तर्क:

उस मामले में याचिकाकर्ता क्रिप्टोकरेंसी एवं वर्चुअल करेंसी के व्यापार में कानूनी रूप से संलग्न थे। साइबर फ्रॉड में शामिल किसी व्यक्ति ने उनके खाते में लेनदेन कर दिया था, जिसके बाद बिना किसी पूर्व नोटिस के साइबर सेल के निर्देशों पर उनके एसबीआई (SBI) और आईसीआईसीआई बैंक (ICICI Bank) के खाते फ्रीज कर दिए गए। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि जांच एजेंसियों ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 102 (Section 102 of Cr.P.C.) के प्रावधानों का अनुपालन नहीं किया तथा संबंधित मजिस्ट्रेट को इस फ्रीज/जब्ती की सूचना नहीं दी। उन्होंने प्रस्ताव रखा था कि संदिग्ध राशि को फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में रख दिया जाए और बाकी खाता चलाने की अनुमति दी जाए। बैंकों (जैसे SBI) की ओर से उपस्थित अधिवक्ताओं (जैसे श्री अर्पित गुरु) ने स्पष्ट किया था कि बैंकों ने अपने स्तर पर खाते फ्रीज नहीं किए हैं, बल्कि वे विभिन्न राज्यों के पुलिस थानों की साइबर क्राइम सेल के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य थे। 

संदर्भित लैंडमार्क जजमेंट (Malcolm Murayis Case)

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में मैल्कम मुरईस बनाम एसबीआई (W.P. No. 1100/2024 एवं W.P. No. 1185/2024) के फैसले को विस्तार से उद्धृत किया। उस मामले में अदालत ने 14 मार्च 2024 को एक अंतरिम आदेश जारी कर याचिकाकर्ताओं को ₹50,000 प्रति माह निकालने की छूट दी थी और विभिन्न राज्यों की साइबर पुलिस को नोटिस जारी किए थे। 

साइबर सेल के रवैये पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

मैल्कम मुरईस मामले का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट ने विभिन्न राज्यों की साइबर क्राइम सेल की कार्यशैली पर कड़ा ऐतराज़ और तीखी टिप्पणी दर्ज की:
"बैंकों द्वारा ईमेल भेजे जाने के बावजूद केवल बेंगलुरु (कर्नाटक) साइबर क्राइम सेल को छोड़कर किसी भी अन्य राज्य के पुलिस स्टेशन ने जवाब देने की ज़हमत नहीं उठाई। यह विभिन्न राज्यों की साइबर क्राइम सेल के खराब कामकाज (poor functioning) और गैर-जिम्मेदाराना रवैये (irresponsible approach) को दर्शाता है, जहाँ एक तरफ तो वे बैंक खातों को फ्रीज करने के लिए ईमेल भेजते हैं, लेकिन दूसरी तरफ बैंकों द्वारा भेजे गए ईमेल का जवाब देने के लिए तैयार नहीं होते।"

न्यायालय का अंतिम निर्णय एवं निर्देश (Court's Final Decision)

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने माना कि मैल्कम मुरईस केस का फैसला इस याचिका में भी 'यथाआवश्यक परिवर्तन सहित' (mutatis mutandis) लागू होता है। अदालत ने निम्नलिखित दिशा-निर्देशों के साथ याचिका का निस्तारण कर दिया:
याचिकाकर्ता सोनू ट्रेडर्स के बैंक खाते पर लगा फ्रीज/होल्ड तुरंत प्रभाव से हटाया जाएगा।
अपराध एजेंसियों द्वारा सूचित विवादित राशि ₹4,000/- को बैंक द्वारा फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में रखा जाएगा।
पुलिस एजेंसी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS - Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita) के प्रासंगिक प्रावधानों या धारा 102 Cr.P.C. के तहत 3 महीने के भीतर सक्षम न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate) से उचित आदेश प्राप्त करे।
यदि पुलिस एजेंसी 3 महीने के भीतर सक्षम मजिस्ट्रेट से आदेश प्राप्त करने में विफल रहती है, तो एफडी में रखी गई राशि भी पुलिस एजेंसी को सूचित करते हुए याचिकाकर्ता को वापस निकालने की अनुमति होगी।
इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने रिट याचिका संख्या 38134/2026 को अंतिम रूप से निपटा दिया।

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