नई दिल्ली, 31 जुलाई, 2026: उच्चतम न्यायालय ने हिमांशु चोरड़िया बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य के मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि पति अपनी पत्नी के खिलाफ व्यभिचार (Adultery) के पुख्ता और प्रत्यक्ष सबूत पेश करता है, तो अदालत अंतरिम भरण-पोषण के चरण में ही उसकी पात्रता पर विचार कर सकती है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने माना कि व्यभिचार के आरोपों को केवल अंतिम सुनवाई के लिए नहीं टाला जाना चाहिए, बल्कि यदि सबूत 'प्रथम दृष्टया' (ex-facie) स्पष्ट हों, तो यह अंतरिम राहत पर रोक लगा सकता है।
हिमांशु चोरड़िया बनाम आरुषि जैन: वैवाहिक विवाद और कानूनी लड़ाई
यह मामला हिमांशु चोरड़िया (अपीलकर्ता) और उनकी पत्नी आरुषि जैन (प्रतिवादी संख्या 2) के बीच वैवाहिक कलह से जुड़ा है। दोनों का विवाह 7 जुलाई 2014 को हुआ था। वैवाहिक संबंधों में तनाव के बाद, आरुषि 13 मई 2020 को अपने बच्चे और कीमती सामान के साथ ससुराल छोड़कर चली गईं।
5 नवंबर 2020 को आरुषि जैन ने उदयपुर की एक विशेष अदालत (Special ACJM, PCPNDT Cases) में धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत भरण-पोषण के लिए मुख्य आवेदन (Case No. 570/2021) और अंतरिम भरण-पोषण के लिए आवेदन (No. 1328/2021) दायर किया।
पति के आरोप और निचली अदालतों का रुख
पति हिमांशु चोरड़िया ने अदालत में धारा 125(4) CrPC के तहत एक आवेदन दायर कर तर्क दिया कि उनकी पत्नी दीपक मुंद्रा नामक व्यक्ति के साथ व्यभिचारी संबंधों में रह रही हैं, इसलिए वह कानूनन भरण-पोषण पाने की हकदार नहीं हैं। उन्होंने अपनी बात साबित करने के लिए बड़ी संख्या में फोटो और सीडी (इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य) पेश किए।
हालांकि, 27 जून 2024 को उदयपुर की ट्रायल कोर्ट (विशेष एसीजेएम अंबिका सोलंकी) ने इस आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि व्यभिचार के सबूतों की प्रामाणिकता केवल मुख्य मामले में सबूत पेश करने (Evidence stage) के बाद ही तय की जा सकती है। राजस्थान हाई कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि CrPC में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो अंतरिम भरण-पोषण तय करने से पहले व्यभिचार को एक 'प्रारंभिक मुद्दे' के रूप में तय करने का निर्देश देता हो।
सुप्रीम कोर्ट की कानूनी व्याख्या: धारा 125(4) CrPC का महत्व
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के दृष्टिकोण को गलत माना। न्यायालय ने धारा 125(4) CrPC का हवाला देते हुए कहा कि यदि पत्नी व्यभिचार में रह रही है, बिना पर्याप्त कारण के पति के साथ रहने से इनकार करती है, या आपसी सहमति से अलग रह रही है, तो वह भरण-पोषण (अंतरिम या अंतिम) प्राप्त करने की हकदार नहीं है।
न्यायालय ने प्रक्रिया को दो परिदृश्यों में समझाया:
यदि साक्ष्य निर्विवाद या प्रत्यक्ष हों: यदि पति द्वारा प्रस्तुत सबूत 'प्रथम दृष्टया' व्यभिचार सिद्ध करते हैं या पत्नी इसे स्वीकार कर लेती है, तो अंतरिम भरण-पोषण का आवेदन उसी दिन खारिज किया जा सकता है।
यदि साक्ष्य की जांच जरूरी हो: यदि सबूतों को कानूनी रूप से सिद्ध करने की आवश्यकता है, तो अदालत को उनकी समीक्षा करनी चाहिए। इस बीच, अंतरिम भरण-पोषण जारी रह सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय से पहले इस पर रोक लगाना संभव है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि पति व्यभिचार को 'ex-facie' (स्पष्ट रूप से) स्थापित करने में सक्षम है, तो यह अंतरिम भरण-पोषण पर रोक के लिए पर्याप्त आधार है।
प्राइवेट डिटेक्टिव और गोपनीयता पर चिंता
इस मामले में पेश किए गए 237 फोटो और 92 वीडियो का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने प्राइवेट डिटेक्टिव (निजी जासूसों) की भूमिका पर गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत ने सवाल उठाया कि ये फोटो किसने लिए? क्या उनके पास अधिकार था? क्या ये फोटो तकनीकी छेड़छाड़ (Doctoring/Morphing) का शिकार हैं?
न्यायालय ने टिप्पणी की कि भारत में निजी जासूसी एजेंसियों के लिए विनियमन (Regulation) का अभाव है। अदालत ने 'प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसीज (रेगुलेशन) बिल, 2007' का उल्लेख किया और केंद्र सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय तथा विधि आयोग को निर्देश दिया कि वे इस क्षेत्र में कानून बनाने और जवाबदेही तय करने पर विचार करें।
अदालत का अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट के आदेशों को रद्द कर दिया। मामले को पुनः ट्रायल कोर्ट (उदयपुर) को वापस भेज दिया गया (Remand), ताकि वह पति द्वारा धारा 125(4) के तहत दिए गए व्यभिचार के साक्ष्यों पर गुण-दोष के आधार पर विचार करे और फिर अंतरिम भरण-पोषण पर फैसला ले। यह निर्णय पति-पत्नी के विवादों में भरण-पोषण के दावों और व्यभिचार के आरोपों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

