भोपाल, 19 सितंबर 2026: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) के तहत मध्य प्रदेश के शासकीय विद्यालयों में वर्ष 2014-15 से कौशल शिक्षा दे रहे 6,000 वोकेशनल ट्रेनर्स (VTs) पिछले 10 वर्षों से गंभीर आर्थिक व प्रशासनिक शोषण के शिकार हैं। विद्यालयों में कार्यभार, उपस्थिति और परीक्षा के नियम लोक शिक्षण संचालनालय (समग्र शिक्षा) तय करता है, लेकिन वेतन और श्रम अधिकारों की बात आते ही विभाग आउटसोर्स कंपनियों (VTPs) का नाम लेकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है। हद तो तब हो गई जब बजट की पोल खुली, तो अपर परियोजना संचालक नंदा भलावे कुशरे ने 18 सितंबर 2026 को आदेश (क्र. 2985) जारी कर प्रशिक्षकों के सीधे पत्राचार और शिकायत दर्ज करने पर ही रोक लगा दी।
अपर परियोजना संचालक का फरमान, मुंह खोलने पर प्रतिबंध
समग्र शिक्षा (सेकेंडरी एजुकेशन) की अपर परियोजना संचालक नंदा भलावे कुशरे द्वारा 18 सितंबर 2026 को जारी आधिकारिक आदेश (क्र./SS(SE)/व्याव.शि./2026-27/2985) के बाद से प्रदेश भर के वोकेशनल ट्रेनर्स में गहरा आक्रोश व्याप्त है:
सीधे पत्राचार पर रोक: निजी सेवा प्रदाता कंपनियों (VTPs) को कड़े निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने अधीनस्थ समस्त कार्यरत वोकेशनल ट्रेनर्स को राज्य कार्यालय एवं वरिष्ठ कार्यालयों में सीधे पत्राचार या शिकायत करने से रोकें।
जिम्मेदारी से खुला पलायन: आदेश में अनुबंध की कंडिका X (xviii) का हवाला देकर कहा गया है कि समग्र शिक्षा व्यावसायिक प्रशिक्षकों की नियुक्ति प्राधिकारी (Appointing Authority) नहीं है, इसलिए उनके किसी भी दावे या पत्राचार पर विभाग विचार नहीं करेगा।
अधिकारी के तानाशाही आदेश पर उठ रहे 4 बड़े सवाल
1.संविधान के अनुच्छेद 19 का खुला हनन: संविधान हर नागरिक को अभिव्यक्ति और अपनी शिकायत दर्ज कराने का मौलिक अधिकार देता है। किसी भी अनुबंध (MoU) की कंडिका मौलिक अधिकारों से बड़ी नहीं हो सकती; शिक्षकों को अपनी व्यथा बताने से रोकना पूरी तरह असंवैधानिक है।
2.समग्र शिक्षा ही 'मुख्य नियोक्ता' (Principal Employer), फिर पल्ला क्यों झाड़ना?: योग्यता, पाठ्यक्रम, कार्य समय और मॉनिटरिंग विभाग खुद तय करता है। श्रम कानून और सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, सरकारी परिसर में कार्य कराने वाला विभाग ही मुख्य नियोक्ता है। VTPs केवल मध्यस्थ हैं, इसलिए वेतन में देरी व अवैध कटौती की अंतिम जवाबदेही विभाग की ही है।
3.कंडिका X(xviii) की जानबूझकर भ्रामक व्याख्या: अनुबंध की कंडिका X(xviii) सेवा संबंधी स्थायी दावों (जैसे सीधे नियमितीकरण) के लिए है। इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि वेतन न मिलने या उत्पीड़न की शिकायत भी नहीं सुनी जाएगी। शिकायत निवारण और स्थायी दावा स्वीकार करना दो अलग विषय हैं।
4.शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Cell) का अभाव, शिक्षक कहां जाएं?: निजी कंपनियों के पास शिकायत निवारण का कोई निष्पक्ष तंत्र नहीं है; बात रखने पर नौकरी से निकालने की धमकी मिलती है। ऐसे में यदि राज्य कार्यालय भी दरवाजे बंद कर लेगा, तो सरकारी स्कूलों में कार्यरत ये शिक्षक अपनी गुहार लेकर कहां जाएंगे?
दस्तावेजों में कैद वित्तीय बजट की जानबूझकर अनदेखी: भारी बजट, फिर भी खुला शोषण
नवीन व्यावसायिक शिक्षा-प्रशिक्षक महासंघ (NVETA) द्वारा जुटाए गए 'प्रबन्ध' पोर्टल के आधिकारिक आंकड़ों ने विभाग की कथनी और करनी की पोल खोल दी है:
1. 12 माह का पूर्ण मानदेय स्वीकृत (PAB पेज 57, वर्ष 2026-27): भारत सरकार ने राज्य के 2,627 स्कूलों में कार्यरत समस्त 5,254 वोकेशनल ट्रेनर्स के लिए मद C2712 के तहत ₹157.62 करोड़ का बजट केवल सैलरी हेड में स्वीकृत करते हुए स्पष्ट निर्देश दिया है:"Recommended for 12 month salary @ Rs 25,000/- per month for existing trainers."अतः केंद्र द्वारा जारी इस मूल मानदेय से प्रशासनिक कटौती करना या कंपनियों (VTPs) को कमीशन देना केंद्र के आदेशों व बजटीय भावना का सीधा उल्लंघन है।
2.मैनेजमेंट हेतु ₹247.88 करोड़ अलग, फिर कमीशन क्यों?: ट्रैकिंग, मॉनिटरिंग और ऐप प्रबंधन के लिए केंद्र ने MMER मद (C3242) में ₹247.88 करोड़ का विशाल स्वतंत्र बजट दिया है। जब प्रबंधन का पूरा खर्च अलग से मिल रहा है, तो ट्रेनर्स के मूल वेतन से 10% कमीशन काटना घोर वित्तीय अनियमितता है।
3.खजाने में ₹156.55 करोड़ का 'अनस्पेंट सरप्लस' और नए सत्र में ₹301.13 करोड़ का भारी बजट, फिर भी कटौती: 'प्रबन्ध' पोर्टल के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025-26 में कौशल शिक्षा के स्वीकृत ₹424.84 करोड़ में से मात्र ₹268.29 करोड़ ही खर्च हुए और ₹156.55 करोड़ की भारी राशि विभाग के पास अप्रयुक्त (सरप्लस) पड़ी रही; वहीं चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए भी केंद्र से कुल ₹301.13 करोड़ का आवर्ती बजट उपलब्ध है | ऐसे में पर्याप्त वित्तीय अधिशेष होने के बावजूद फंड की कमी का बहाना बनाकर मानदेय काटना या सर्विस ब्रेक थोपना पूरी तरह मनगढ़ंत और आधारहीन है।
4.सक्षम सरकारी तंत्र (DVC) उपलब्ध, फिर बिचौलियों को कमीशन क्यों?: डीपीआई के आदेश (क्र. 2804) के तहत जिलों में नियमित व्याख्याताओं को डिस्ट्रिक्ट वोकेशनल कोऑर्डिनेटर (DVC) बनाकर प्रतिमाह ₹20,000 (₹2.40 लाख वार्षिक रेकरिंग बजट) का पृथक मॉनिटरिंग फंड पहले से दिया जा रहा है; जब जिलों में सक्षम शासकीय प्रशासनिक तंत्र मौजूद है, तो वोकेशनल ट्रेनर्स का मानदेय कंपनियों के बजाय सीधे ट्रेजरी या सिंगल नोडल अकाउंट (SNA) से उनके बैंक खातों में ट्रांसफर किया जाना चाहिए, जिससे 4-5 माह के विलंब, अवैध कटौती और कमीशनखोरी का तुरंत स्थायी समाधान हो सके।
प्रदेश अध्यक्ष जगदीश परमार के मुख्य बिंदु एवं आंदोलन की चेतावनी:
1.समान काम, फिर भी भारी अंतर: दिल्ली और हरियाणा में वोकेशनल ट्रेनर्स को ₹38,600 मानदेय और 5% से 8% वार्षिक वेतनवृद्धि मिल रही है, जबकि म.प्र. में 10 साल बाद भी मात्र ₹20,000 दिए जा रहे हैं।
2.राज्य के पास टॉप-अप की छूट: समग्र शिक्षा मैन्युअल (2024) के तहत राज्य सरकार 40% राज्यांश (₹10,000) जोड़ सकती है; ऐसा होने पर बिना अतिरिक्त भार के मानदेय सीधे ₹35,000 पार हो जाएगा।
3.अवकाश छीने: मातृत्व और मेडिकल अवकाश तो दूर, 10 वर्षों से मिल रहा महीने का 1 आकस्मिक अवकाश (CL) भी विभाग ने दिसंबर 2025 से बंद कर दिया।
4.जिम्मेदारी से भागते अफसर: साक्ष्य सामने आते ही अधिकारी समस्याओं का समाधान करने के बजाय 'थर्ड-पार्टी' का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लेते हैं।
उग्र आंदोलन का अल्टीमेटम: प्रदेश अध्यक्ष जगदीश परमार ने चेतावनी दी है कि यदि 18 सितंबर 2026 के तानाशाही आदेश (क्र. 2985) को तुरंत निरस्त कर न्यायोचित मांगें पूरी नहीं की गईं, तो प्रदेश के 6,000 वोकेशनल ट्रेनर्स सड़कों पर उतरकर व्यापक आंदोलन करेंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और समग्र शिक्षा विभाग की होगी।

