1857 में रानी लक्ष्मीबाई ने भोपाल पर हमले का ऐलान कर दिया था, बेगम ने रानी को मारने सैनिक भेजे थे

Updesh Awasthee
भोपाल, 7 अगस्त 2026:
अगस्त का महीना पूरे भारत के लिए उत्साह और उमंग भरा होता है लेकिन भोपाल के लिए दर्द भरा होता है। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन भोपाल आजाद नहीं हुआ। यहां वंदे मातरम बोलने वालों को गोली मार दी गई। हर साल वह घाव हरे हो जाते हैं। सन 57 की बात ही ले लीजिए। भोपाल की जनता अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रही थी, लेकिन भोपाल की बेगम, अंग्रेजों की गुलामी छोड़ने को तैयार ही नहीं थी। महारानी लक्ष्मीबाई ने कई पत्र लिखे, लेकिन वह नहीं मानी। अंत में महारानी लक्ष्मीबाई भोपाल पर हमला करने की योजना बनाने लगी। यदि वह जीवित होती तो ग्वालियर के बाद भोपाल पर रानी लक्ष्मीबाई का राज होता है। 

भोपाल की सेना बेगम के खिलाफ हो गई थी

1857 में जब पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ सैनिक विद्रोह चल रहा था, भोपाल में सिकंदर जहाँ बेगम, नवाब की कुर्सी पर बैठी हुई थी। भोपाल रियासत ने 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ संधि की थी। इसको Treaty of Bhopal कहा जाता है। डॉ. सुरेन्द्र नाथ सेन की भारत सरकार (प्रकाशन विभाग) द्वारा प्रकाशित आधिकारिक पुस्तक 1857 तथा रुद्रांग्शु मुखर्जी की पुस्तक A Begum and A Rani: Hazrat Mahal and Lakshmibai in 1857 के अनुसार, सिकंदर बेगम ने अपनी रियासत को विद्रोह की आग से बचाने और अंग्रेजों के प्रति वफादारी निभाने का फैसला किया था लेकिन भोपाल की सेना (विशेषकर सीहोर छावनी और भोपाल स्टेट की 'वेलविलेट रेजीमेंट') में विद्रोह फैल गया। 

रानी लक्ष्मीबाई की प्रेरणा से भोपाल में सैनिक विद्रोह हुआ

रानी लक्ष्मीबाई, तात्या तोपे और बांदा के नवाब का समर्थन एवं संरक्षण मिलने के बाद सीहोर छावनी और भोपाल स्टेट की 'वेलविलेट रेजीमेंट' ने सैनिक विद्रोह कर दिया, एवं सीहोर पर कब्जा कर लिया। ग्रेजों का यूनियन जैक उतार फेंका गया और उसकी जगह एक ही डंडे पर दो झंडे फहराए गए- हरा ‘निशाने-मोहम्मदी’ और भगवा ‘महावीरी झंडा’। अब सीहोर, भोपाल की बेगम और अंग्रेज, दोनों से स्वतंत्र था। यहां एक सरकार का गठन किया गया जिसे "सिपाही बहादुर सरकार" कहा गया। 

मध्य प्रदेश राज्य अभिलेखागार (MP State Archives) और बी.टी. मैककली की पुस्तक The Central India State Gazetteer (Bhopal State) के अभिलेखीय दस्तावेजों के अनुसार, भोपाल के विद्रोही सैनिक रानी लक्ष्मीबाई को भारत में स्वाधीनता का नेतृत्वकर्ता मानते थे और गुप्त संदेशों (चपातियों और गुप्त पत्रों) के जरिए संवाद बनाए हुए थे। 

भोपाल के जागीरदार भी रानी लक्ष्मीबाई के साथ थे

भोपाल रियासत की जागीर अम्बापानी (जो भोपाल क्षेत्र के अंतर्गत आती थी) के दो भाई, नवाब फाजिल मोहम्मद खान और नवाब आदिल मोहम्मद खान ने सिकंदर बेगम के आदेशों की अवहेलना करते हुए अंग्रेजों और बेगम के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। इन दोनों भाइयों ने राहतगढ़ और गढ़ी अमरापानी में किला बंदी की और बुंदेलखंड में रानी लक्ष्मीबाई के सहयोगियों (बानपुर के राजा मर्दन सिंह और शाहगढ़ के बखतवली) के साथ गठबंधन किया। 

यदि भोपाल की सेना पहुंच जाती तो झांसी लक्ष्मी बाई की होती

ब्रिटिश मिलिट्री डिस्पैच (Sir Hugh Rose's Central India Campaign Records) और 'भोपाल स्टेट गजेटियर' के अनुसार, सर ह्यू रोज की 'सेंट्रल इंडिया फील्ड फोर्स' ने झांसी पर आक्रमण करने से ठीक पहले भोपाल के पास स्थित राहतगढ़ किले पर हमला कर नवाब फाजिल मोहम्मद खान को फांसी दी थी। इस कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य रानी लक्ष्मीबाई की मदद के लिए भोपाल-मालवा क्षेत्र से आने वाली रसद और सैन्य मदद को रोकना था। 

भोपाल की बेगम ने लक्ष्मीबाई को मारने सैनिक भेजे थे

जब मार्च-अप्रैल 1858 में ब्रिटिश जनरल सर ह्यू रोज ने झांसी के किले को घेरा, तब भोपाल रियासत की सिकंदर बेगम ने अंग्रेजों की सहायता के लिए भोपाल स्टेट ट्रूप्स (Bhopal Contingent Forces) को भेजा था। झांसी की घेराबंदी और बाद में कालपी व ग्वालियर के युद्धों में भोपाल के इन सैनिकों ने ब्रिटिश सेना की ओर से रानी लक्ष्मीबाई के खिलाफ युद्ध में भाग लिया। सर ह्यू रोज के आधिकारिक डिस्पैच (London Gazette - 1858) और जॉन विलियम केय की ऐतिहासिक पुस्तक History of the Sepoy War in India में उल्लेख है कि भोपाल राज्य के तोपखाने और घुड़सवार टुकड़ियों ने अंग्रेजों को रसद और सैन्य बल प्रदान किया था, जिसने रानी लक्ष्मीबाई की सैन्य रणनीति को प्रभावित किया।  

रानी लक्ष्मीबाई ने भोपाल की बेगम को कई बार समझाया

रानी लक्ष्मीबाई को लगता था कि भोपाल की बेगम भी एक महिला है और स्वतंत्रता पसंद करती हैं। शायद वह ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ तलवार उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रही है। इसलिए रानी लक्ष्मीबाई ने भोपाल की बेगम को मोटिवेट करने के लिए कई मैसेज भेजे। दो बार तो पत्र भी लिखा, लेकिन भोपाल की बेगम नहीं मानी। 

रानी लक्ष्मीबाई ने भोपाल पर हमले का ऐलान कर दिया था

अंत में रानी लक्ष्मीबाई ने भोपाल पर हमले का ऐलान कर दिया था। उन्होंने भोपाल की सिकंदर जहाँ बेगम को पत्र लिखकर कहा कि " मैं अपनी मौजूदा मुहिम से निपटकर भोपाल आऊंगी और अपनी तलवार की नोक पर आपको अंग्रेजों की मदद करने से रोकने के लिए मजबूर कर दूंगी।’ (इस समय तक रानी लक्ष्मीबाई का भोपाल की बेगम के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर था। उनको हमेशा लगता था कि भोपाल की बेगम, ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रेशर में है और यदि उन्हें विश्वास दिलाया जाए तो वह स्वयं भी स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बनेंगी)।

भोपाल की सिकंदर जहाँ बेगम अंग्रेजों की वफादारी पर फ़क्र करती थी

भोपाल की बेगम ने रानी लक्ष्मीबाई को जो जवाब लिखा उसमें लिखा कि, रियासत भोपाल को फख्र है कि वह हमेशा से "बरतानवी हुकूमत" (ब्रिटिश हुकूमत) की वफादार रही है। अगर आप मोर्चा जमाना चाहती हैं तो आइए, मेरा आतिशी तोपखाना आपका मुकाबला करने के लिए हर वक्त तैयार है।’ 
Sikandar Jahan Begum of Bhopal

1857 Revolt: Rani Lakshmibai Announced Attack on Bhopal, Begum Sent Troops to Stop Her

दरअसल भोपाल की बेगम को अपनी सेना, अपनी जनता और अपनी जागीरदारों से ज्यादा ब्रिटिश जनरल सर ह्यू रोज पर भरोसा था। उन्होंने 1857 की क्रांति में रानी लक्ष्मीबाई को मरवाने और ब्रिटिश जनरल सर ह्यू रोज की जीत सुनिश्चित करने के लिए, वह सब कुछ किया, जो उनकी अधिकतम क्षमता में था। इसके लिए उन्होंने किसी की परवाह नहीं की। अनुसंधान: उपदेश अवस्थी (विधि सलाहकार एवं पत्रकार)

प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत (Primary & Official Secondary Sources): 

  • Sen, S. N. (1957): 1857, Publications Division, Ministry of Information and Broadcasting, Government of India. 
  • Mukherjee, Rudrangshu (2021): A Begum and A Rani: Hazrat Mahal and Lakshmibai in 1857, Penguin Allen Lane.  
  • Luard, C.E. (1908): The Bhopal State Gazetteer, Superintendent Government Printing, Calcutta. 
  • Kaye, John William (1880): A History of the Sepoy War in India, 1857-1858, W.H. Allen & Co., London. 
  • National Archives of India & MP State Archives (Bhopal): Bhopal Agency Records (1857–1858) and Foreign Political Consultations (EIC). 
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