भोपाल, 5 अगस्त 2026: हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण मामले में वह समाप्त हो गई है और हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित कर लिया है। हम यहां पर बता रहे हैं की अंतिम दिन, मतलब 15वें दिन दोनों पक्षों के वकीलों ने क्या तर्क दिए।
27% ओबीसी आरक्षण के विरोध में अधिवक्ताओं के तर्क
1. श्री एल. (वरिष्ठ अधिवक्ता) ने तर्क दिया कि 50% की सीमा एक संवैधानिक मर्यादा है जिसे केवल संविधान संशोधन के माध्यम से ही बदला जा सकता है, सामान्य कानून (ordinary legislation) से नहीं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आरक्षण बढ़ाने से पहले पिछड़ा वर्ग आयोग के साथ कोई परामर्श नहीं किया गया, जो कि मराठा आरक्षण मामले की तरह ही इस कानून को रद्द करने के लिए पर्याप्त आधार है।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के पास कोई समकालीन (contemporaneous) डेटा नहीं था और उन्होंने 1931 की जनगणना और 1983 की पुरानी महाजन रिपोर्ट पर भरोसा किया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 16(4) "पर्याप्त प्रतिनिधित्व" (adequate representation) की बात करता है, न कि जनसंख्या के अनुपात में "आनुपातिक प्रतिनिधित्व" की।
उन्होंने इंद्रा साहनी, नागराज, और जनहित अभियान जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि 50% की सीमा एक अनिवार्य नियम है।
2. श्री सानी (याचिकाकर्ताओं के वकील):
उन्होंने आरोप लगाया कि 8 मार्च 2019 को लाया गया अध्यादेश केवल "वोट बैंक की राजनीति" थी क्योंकि उस समय सरकार के पास कोई मात्रात्मक डेटा मौजूद नहीं था।
उन्होंने बिहार के 65% आरक्षण को रद्द करने वाले पटना हाई कोर्ट के 2024 के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि यदि बिहार जैसे पिछड़े राज्य में 50% की सीमा नहीं लांघी जा सकती, तो मध्य प्रदेश में इसकी अनुमति क्यों दी जानी चाहिए।
उन्होंने प्रसिद्ध न्यायविद नानी पालकीवाला की पुस्तक का हवाला देते हुए कहा कि जाति-आधारित आरक्षण से देश पीछे की ओर जा रहा है और इससे अंतहीन मुकदमेबाजी होती है।
27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के समर्थन में अधिवक्ताओं के तारक
1. श्री नटराज (अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल - ASG, राज्य की ओर से): तर्क दिया कि प्रतिनिधित्व की पर्याप्तता (adequacy) निर्धारित करने के लिए जनसंख्या एक महत्वपूर्ण कारक है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने दावा किया कि "बोस रिपोर्ट" (Boss report) और महाजन रिपोर्ट के माध्यम से राज्य के पास पर्याप्त डेटा है जो दिखाता है कि ओबीसी का प्रतिनिधित्व अभी भी कम है।
उन्होंने कहा कि ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण के आने के बाद 50% की सीमा का सिद्धांत बदल गया है क्योंकि अब लगभग सभी वर्गों को आरक्षण मिल रहा है।
उन्होंने तर्क दिया कि मध्य प्रदेश की स्थिति "सुलभ" (sui generis) और असाधारण है क्योंकि यहाँ एससी, एसटी और ओबीसी की जनसंख्या बहुत अधिक है।
डी फैक्टो सिद्धांत (De Facto Doctrine): उन्होंने सुझाव दिया कि यदि कानून को रद्द भी किया जाता है, तो इसके तहत पहले ही की जा चुकी नियुक्तियों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
2. श्री रत्नु
50% की सीमा अब अनिवार्य नहीं: उन्होंने तर्क दिया कि आज के भारत में 50% की सीमा का पुराना सिद्धांत प्रासंगिक नहीं रह गया है क्योंकि आरक्षण का विस्तार व्यापक हो गया है।
क्रीमी लेयर का तर्क: उन्होंने कहा कि क्रीमी लेयर के प्रावधान के कारण आरक्षण का लाभ केवल पात्र लोगों को ही मिल रहा है।
अदालत की टिप्पणियाँ और प्रक्रिया
अदालत ने दोनों पक्षों को धैर्यपूर्वक सुना और उन्हें अपने तर्कों का एक संक्षिप्त सारांश (synopsis) जमा करने के लिए कहा। बेंच ने यह भी स्वीकार किया कि यह सुनवाई एक सीखने वाला अनुभव (enlightening experience) रही है।
याचिकाकर्ताओं ने याद दिलाया कि इस मामले में शुरुआत से ही अंतरिम रोक लगी हुई है, जिसके कारण बढ़ा हुआ आरक्षण प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाया है।
अंत में, याचिकाकर्ताओं के वकील ने दोहराया कि बिना संविधान संशोधन के 50% की सीमा को पार करना अवैध है और राज्य सरकार द्वारा आयोग से परामर्श न करना इस कानून के लिए घातक है।

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