भोपाल, 16 अगस्त 2026: मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह सरकार के समय हुए शिक्षक भर्ती घोटाले में भी वही सब कुछ हो रहा है, जो व्यापम घोटाले में हुआ। लोकायुक्त ने मामले की जांच की थी लेकिन जांच रिपोर्ट में यह नहीं बताया कि किस नेता ने किसी रिश्तेदार को नौकरी पर लगवा दिया। डॉक्यूमेंट में व्हाइटनर लगाया गया था, लेकिन जांच रिपोर्ट में व्हाइटनर के लिए कोई टेक्निकल एविडेंस ही नहीं था। मजे की बात देखिए, हाई कोर्ट में बहस हुई कि, जब रिश्वत नहीं ली तो भ्रष्टाचार कैसा। जबकि मामला रिश्तेदारों को नौकरी का था। अब कोई पिता, पद का दुरुपयोग करके, अपने बेटे को शिक्षा कर्मी बनाएगा, तो क्या उससे या उसकी मां से रिश्वत लेगा?
MP Teacher Recruitment Scam: All Accused Acquitted After Lapses in Lokayukta Investigation
जो लोग सिस्टम में थे वह जानते हैं कि साल 1998 में विधानसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश में बड़े पैमाने पर शिक्षा कर्मियों की भर्ती हुई। तब मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह की सरकार थी। उनके खिलाफ चुनाव प्रचार में उमा भारती ने खुलेआम आरोप लगाई थी कि, कांग्रेस के नेताओं के रिश्तेदारों को शिक्षाकर्मी भर्ती कर लिया गया है। योग्यता के मामले में पक्षपात किया गया जिसके कारण योग्य उम्मीदवारों को नौकरी नहीं मिल पाई।
सांवेर जनपद पंचायत शिक्षक भर्ती भ्रष्टाचार मामला (1998) - विस्तृत विवरण
वर्ष 1998 में इंदौर जिले की सांवेर जनपद पंचायत द्वारा शिक्षा कर्मी वर्ग 3 के 207 पदों पर नियुक्ति हेतु प्रक्रिया शुरू की गई। आधिकारिक नोटिफिकेशन एवं विज्ञापन के जवाब में कुल 2539 आवेदन प्राप्त हुए। योग्यता के आधार पर उम्मीदवारों की एक मेरिट लिस्ट तैयार की गई और साक्षात्कार के लिए पदों से तीन गुना उम्मीदवारों को बुलाया गया। साक्षात्कार प्रक्रिया 27 जून 1998 से 18 जुलाई 1998 के बीच चयन समिति द्वारा आयोजित की गई, जिसमें कुल 1796 उम्मीदवार शामिल हुए।
चयन समिति में निम्नलिखित मुख्य व्यक्ति शामिल थे:
- अशोक कुमार पांडेय: तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO)।
- विजय रेगे: तत्कालीन ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO)।
- निर्वाचित सदस्य: मुकेश चौहान, रमेश बोरवाल, मनोहर पटेल, सोहनलाल पटेल, केसर सिंह, ओमप्रकाश यादव और प्रहलाद दाबी।
- विषय विशेषज्ञ: श्रीमती संध्या दलवी (PW-15) और सुनील कुमार दुबे (PW-27)।
2. भ्रष्टाचार के आरोप और लोकायुक्त की जांच:
चयन प्रक्रिया के बाद, विशेष पुलिस स्थापना (लोकायुक्त), इंदौर को इस भर्ती में अनियमितताओं की शिकायत मिली। जांच के दौरान निम्नलिखित गंभीर आरोप लगाए गए:
आरोप था कि चयन समिति के सदस्यों (मुकेश चौहान, रमेश बोरवाल और मनोहर पटेल) ने अपने पदों का दुरुपयोग करते हुए अपने रिश्तेदारों को साक्षात्कार में 15 में से 15 अंक (पूर्ण अंक) दिए ताकि उनका चयन सुनिश्चित हो सके।
अभियोजन का आरोप था कि समिति के अन्य सदस्यों (सोहनलाल, केसर सिंह आदि) और सरकारी अधिकारियों (CEO और BEO) ने मिलीभगत की और एक-दूसरे के रिश्तेदारों को उच्च अंक देकर इस अवैध चयन में सहायता की।
यह कृत्य मध्य प्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 की धारा 40(c) का उल्लंघन माना गया, जो पदाधिकारियों को अपने रिश्तेदारों को लाभ पहुँचाने से रोकता है।
निचली अदालत का फैसला (2010):
विशेष पुलिस स्थापना ने जांच पूरी कर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(d) सहपठित धारा 13(2) और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 109 के तहत आरोप पत्र दायर किया। इंदौर के प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (विशेष न्यायाधीश) ने 12 अगस्त 2010 को (विशेष प्रकरण संख्या 22/2004 में) सभी आरोपियों को दोषी पाया और उन्हें दो साल के कठोर कारावास तथा 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।
4. उच्च न्यायालय की सुनवाई और अंतिम निर्णय (13 अगस्त 2026):
दोषी व्यक्तियों ने इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में आठ अलग-अलग अपीलें (CRA 960/2010 आदि) दायर कीं। न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई ने इन सभी अपीलों को स्वीकार करते हुए सजा को रद्द कर दिया और सभी को दोषमुक्त (Acquitted) कर दिया।
यह घटना सन 1998 की है और हाई कोर्ट का फैसला 2026 में आया। इस प्रकार यह मामला सरकारी एजेंसी लोकायुक्त की जांच और न्यायालय की कार्रवाई इत्यादि में 28 साल तक चलता रहा। लोकायुक्त ने जल्दबाजी में चार्जशीट पेश नहीं की थी। इसके बावजूद इन्वेस्टिगेशन में तकनीकी गड़बड़ी की गई।
हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के दोषी घोषित नेताओं और अधिकारियों को सजा मुक्त क्यों किया
लगभग सभी महत्वपूर्ण शिकायतकर्ता और उम्मीदवार (PW-3 से PW-9, PW-14 आदि) अदालत में होस्टाइल (Hostile) हो गए और उन्होंने लोकायुक्त पुलिस को किसी भी शिकायत से इनकार किया।
अदालत ने पाया कि सजा का मुख्य आधार 'फाइल नंबर 9' और 'चार्ट (Ex. P/62)' थे, जिनमें अंकों पर व्हाइटनर (Whitener) लगाकर सुधार किया गया था। अभियोजन ने इन बदलावों की पुष्टि के लिए कोई हस्तलेख विशेषज्ञ (Handwriting Expert) की राय पेश नहीं की।
(इसका मतलब हुआ कि लोकायुक्त ने जब मामला दर्ज किया तो जप्त किए गए डॉक्यूमेंट में जो व्हाइटनर लगाकर सुधार किया गया था, लगाई तूने किसी भी तकनीकी विशेषज्ञ के माध्यम से यह प्रमाणित नहीं किया कि, व्हाइटनर कब लगाया गया है और व्हाइटनर लगाकर क्या किया गया है। जांच रिपोर्ट में यह छोटी सी बात छोड़ दी गई, जिसके कारण मुकदमा 28 साल तक चलता रहा, जनता का पैसा खर्च होता रहा और न्यायालय उचित फैसला भी नहीं ले पाया।)
जाँच अधिकारी एम.सी. शर्मा (PW-36) ने स्वीकार किया कि आरोपियों के खिलाफ रिश्वत लेने या किसी आर्थिक लाभ का कोई सबूत या शिकायत नहीं मिली थी।
(मजे की बात देखिए कि, कोर्ट में उस पॉइंट पर बहस की गई। जो बनता ही नहीं था। रिश्वत के लिए शिकायत ही नहीं की गई थी। कोई पिता पद का दुरुपयोग करके यदि अपने बेटे को सरकारी नौकरी दिलवाएगा तो क्या उससे रिश्वत लेगा?)
सरकारी अधिकारियों (CEO और BEO) के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के लिए दी गई मंजूरी (Sanction) को अदालत ने "यांत्रिक" और बिना दिमाग लगाए दिया गया माना।
स्वतंत्र विषय विशेषज्ञों (PW-15 और PW-27) ने गवाही दी कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी थी और उन पर अंक देने के लिए कोई दबाव नहीं था।
निष्कर्ष: अदालत ने माना कि प्रशासनिक चूक (रिश्तेदारों का खुलासा न करना) को बिना ठोस सबूत के भ्रष्टाचार का आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता। चूंकि अभियोजन "संदेह से परे" दोष साबित करने में विफल रहा, इसलिए सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि चयनित उम्मीदवारों को कभी सेवा से नहीं हटाया गया और उनमें से कई अब सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं।

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