ग्लोबल, लोकल और E20 का असर, गणेश प्रतिमाओं की लागत 75% बढ़ गई

Updesh Awasthee
भोपाल, 30 अगस्त 2026:
मानसून की आहट के साथ ही विघ्नहर्ता भगवान गणेश के आगमन की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। मूर्तिकार दिन-रात मिट्टी को जीवंत रूप देने में जुटे गए हैं लेकिन इस बार विघ्नहर्ता का उत्सव खुद भारी विघ्नों (महंगाई) के साये में है। इस बार महंगाई केवल बढ़ी नहीं है, बल्कि मानसून की तरह बरसी है। ग्लोबल और लोकल परिस्थितियों के कारण कई चीजों के दाम दोगुना हो गए हैं। यदि किसी प्रोडक्ट पर इन दोनों का असर नहीं हुआ तो E20 के नाम पर चीजों के दाम 40% तक बढ़ गए हैं। वह कहते हैं कि एक तरफ पेट्रोल 20% कम मिल रहा है और दूसरी तरफ एवरेज भी 20% कम हो गया है, इसलिए 40% दम तो बढ़ाने पड़ेंगे।

कच्चे माल का '75% टॉर्चर' और दर्द का गणित

बप्पा की प्रतिमा बनाने में लगने वाली हर छोटी-बड़ी सामग्री अब मूर्तिकारों की जेब पर भारी पड़ रही है। मूर्तिकारों के कारखानों में इस समय लागत और रेट का संतुलन तय करने में जितना पसीना बह रहा है, उतना शायद मूर्ति गढ़ने में भी नहीं बहा।
महंगाई के कुछ तीखे आंकड़े इस प्रकार हैं:
पिछले साल जो कानपुर का बांस 200 रुपये प्रति नग मिलता था, वह अब सीधे 350 रुपये (करीब 75 फीसदी की बढ़ोतरी) का हो चुका है।
खेतों से आने वाली काली मिट्टी का एक ट्रैक्टर जो पिछले साल 5,000 रुपये में मिल जाता था, उसके दाम अब 9,000 रुपये तक पहुंच गए हैं। 
जो घास पहले 20 रुपये प्रति किलो थी, वह अब दोगुनी होकर 40 रुपये प्रति किलो हो गई है। ऊपर से रंग भी 40 प्रतिशत तक महंगे हो चुके हैं।

मूर्तिकारों का धर्मसंकट: ग्राहक रूठे या घर टूटे?

मूर्तिकार अमर लाल माहौर, राजू माहौर, राहुल माहौर, सोनू माहौर, लक्ष्मण माहौर, विवेक माहौर और अभिषेक माहौर के सामने इस बार सबसे बड़ी चुनौती प्रतिमा बनाना नहीं, बल्कि उसकी कीमत तय करना है।
पिछले साल जिस 3 फीट की गणेश प्रतिमा के लिए भक्तों को करीब 5,000 रुपये खर्च करने पड़ते थे, इस बार उसी आकार की प्रतिमा की कीमत 8,000 रुपये तक पहुंच गई है। अब कलाकारों के सामने दोतरफा दबाव है:
अगर पूरी बढ़ी हुई लागत ग्राहकों पर डाल दी जाए, तो डर है कि कहीं खरीदार पीछे न हट जाएं और अगर दाम कम रखे जाएं, तो बांस, मिट्टी, घास, रंग, सुतली और परिवहन का खर्च भी नहीं निकलेगा और कारीगर घाटे में चला जाएगा। यह एक ऐसा 'आर्थिक चक्रव्यूह' है जहां मूर्तिकार खुद को लाचार पा रहे हैं।

भोपाल के 500 परिवारों और 'बंगाली कारीगरों' का कठिन इम्तिहान

शिवपुरी ही नहीं, बल्कि सूबे की राजधानी भोपाल में भी विघ्नहर्ता के स्वागत की तैयारियां जोरों पर हैं, लेकिन यहाँ की कहानी में 'मल्टी-स्टेट' फ्लेवर और बड़ा मार्केट साइज जुड़ा हुआ है। भोपाल में गणेश प्रतिमाओं का निर्माण मुख्य रूप से पारंपरिक कुम्हार-प्रजापति परिवारों के साथ-साथ बंगाल के कृष्णानगर और वर्धमान जैसे क्षेत्रों से आए मौसमी कारीगरों द्वारा किया जाता है। ये कारीगर त्योहारों के आसपास 4-6 महीने के लिए यहाँ आते हैं और स्थानीय परिवारों के साथ मिलकर मूर्तियों को अंतिम रूप देते हैं। 

भोपाल शहर के प्रमुख मूर्ति हब: 
करोंद, आनंद नगर (रत्नागिरी चौराहा), इतवारा, टीटी नगर, शांति नगर, शक्ति नगर, कोलार गेस्ट हाउस, MANIT स्क्वायर, माता मंदिर चौक और कस्तूरबा नगर के कालीबाड़ी जैसे इलाकों में दिन-रात मिट्टी की कलाकृतियाँ गढ़ी जा रही हैं। 

मिट्टी की 'ग्लोबल' वैरायटी: 
बप्पा को सजाने के लिए केवल स्थानीय मिट्टी का उपयोग नहीं हो रहा है; बल्कि कोलकाता, कानपुर, हरियाणा और रायसेन से विशेष रूप से मिट्टी मंगवाई गई है।

भोपाल में गणेश प्रतिमाओं की मांग 
भोपाल में सालाना 75,000 से 80,000 गणेश प्रतिमाओं की मांग रहती है। बिक्री कितनी हुई इसका तो कोई रिकॉर्ड नहीं होता लेकिन, हमारा कैलकुलेशन इस प्रकार से है कि, वर्ष 2025 में करीब 4,000 स्थानों पर प्रतिमाएं स्थापित की गईं, जिनमें 250 बड़ी झांकियां शामिल थीं। विसर्जन के समय 80,000 से अधिक छोटी-बड़ी मूर्तियों का विसर्जन किया गया। मतलब जिन प्रतिमाओं का अपने घर पर विसर्जन किया गया, उनकी संख्या इसमें शामिल नहीं है।

बाजार का गणित और महंगाई की मार: 
भोपाल के इस मौसमी उद्योग में लगभग 500 स्थानीय मूर्ति निर्माता परिवार (2023 की रिपोर्ट के अनुसार) और सैकड़ों प्रवासी कारीगर अपनी आजीविका तलाश रहे हैं। यहाँ छोटी मूर्तियां 100 रुपये से लेकर 5,000 रुपये तक में मिल रही हैं, जबकि विशाल प्रतिमाओं की कीमत 1.5 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। कच्चे माल (मिट्टी, बांस, रंग) की बढ़ी हुई कीमतों ने यहाँ भी कारीगरों के मुनाफे को पूरी तरह सोख लिया है।

खास बात यह है कि भोपाल केवल अपने लिए प्रतिमाएं नहीं बनाता, बल्कि यहाँ से निर्मित मूर्तियां आसपास के जिलों जैसे सीहोर, होशंगाबाद, रायसेन, उज्जैन, विदिशा, सागर, देवास, शिवपुरी, गुना, गंजबासोदा और यहाँ तक कि पुणे तक भेजी जाती हैं। जैसे ही गणेशोत्सव नजदीक आता है, न्यू मार्केट, 10 नंबर मार्केट, करोंद और कोलार रोड जैसे प्रमुख बाजार इन कारीगरों की कला से सज उठते हैं।
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