श्री बगलामुखी नलखेड़ा अमृत-कथा - काव्य : Shri Baglamukhi Nalkheda Amrit Katha: A Divine Poetic Journey

Updesh Awasthee
दोहा:
सुमिरि चरण बगलामयि, गणपति शारद मात। नलखेड़ा महिमा कहूँ, सुनहु सकल सयांत॥ 
लखुंदर तट पावन पुली, आगर मालवा देश। शत्रु नशिनी माँ बसैं, हरैं सकल कलेश॥

चौपाई: जयति-जयति पीताम्बर धारी। जग जननी जय जयति अपारी॥ 
मध्य प्रदेश की भूमि सुहाई। आगर जनपद महिमा छाई॥
नलखेड़ा इक नगर अनूपा। जहाँ विराजत शक्ति स्वरूपा॥ 
लखुंदर सरिता तीर सुहावन। सिद्ध पीठ अति निर्मल पावन॥

कथा प्रारम्भ (महाभारत काल) 
सुनहु कथा जो कथा पुरानी। जो सब शास्त्रन वेद बखानी॥ 
द्वापर युग जब युद्ध मचावा। पांडव दल अति संकट पावा॥
तब केशव बोले मृदु बानी। पूजहु शक्ति आदि भवानी॥ 
कौरव सैन्य दलन के काजा। तप कीन्हा युधिष्ठिर राजा॥
कीन्हा पांडव तप मन लाई। प्रकटीं तब बगलाम्बर माई॥ 
स्वयंभू मूर्ति तेज प्रकाशा। देखि शत्रु मन भयहु निवासा॥
धर्मराज तब मंदिर कीन्हा। जग हित दिव्य दान माँ दीन्हा॥
दोहा: त्रिशक्ति रूपा राजती, तीन मुखन की धार। दतिया और काँगड़ा संग, नलखेड़ा सुख सार॥
चौपाई: माँ का मुख बगुलहि सम सोहे। अमित तेज भक्तन मन मोहे॥ 
पीत वस्त्र तन परम सुहासा। पीताम्बरा कहत सब दासा॥

पीत फूल अरु पीत प्रसादा। हल्दी माला हरत विपादा॥
शत्रु स्तंभन शक्ति तुम्हारी। मुकदमों में जय देन हारी॥
नृप नेता और जन नर-नारी। आवत द्वारे आज्ञाकारी॥
चुनाव जीत की इच्छा लावैं। माँ के द्वारे मंगल पावैं॥
शैव शाक्त अरु सिद्ध सुजाना। तांत्रिक करत यहाँ अनुष्ठाना॥

मंदिर महिमा हनुमत भैरव और शिव साथा। कृष्ण सरस्वती नावहिं माथा॥ 
चामुंडा माँ लक्ष्मी विराजीं। देखि स्वरूप सकल दुख भाजीं॥
दश महाविद्या में माँ एका। जाके महिमा अमित अनेका॥
जो जन प्रेम सहित यहाँ आवै। शत्रु नाशि निज काज बनावै॥

दोहा: संवत अठारह सौ सोलह (1816), कीन्हा जीर्णोद्धार। नलखेड़ा की ईश्वरी, करतीं बेड़ा पार॥
जो यह कथा प्रेम से गावै। सो निश्चय माँ की भक्ति पावै॥ 
इति श्रीमदाचार्योपदेशावस्थिविरचिता श्रीबगलामुखीनलखेड़ामहिमाकथा सम्पूर्णा। 
श्रीमातृचरणारविन्दार्पणमस्तु॥ 

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