हिंदू धर्म संस्कृति में श्रावण (सावन) मास को देवों के देव महादेव की भक्ति के लिए वर्ष का सबसे पवित्र और फलदायी समय माना गया है। सावन का पूरा महीना शिवमय होता है, जहाँ चारों ओर हरियाली और वातावरण में भक्ति का अनूठा रस घुला होता है। यूं तो सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाने, रुद्राभिषेक करने और सोमवारी व्रत का विशेष विधान है ही, लेकिन इसी मास में शास्त्रों में वर्णित एक अत्यंत दुर्लभ और फलदायी अनुष्ठान भी किया जाता है, जिसे 'शिव पवित्रारोपण' कहा जाता है। आइए समझते हैं कि सावन में शिव पूजन का क्या महत्व है और पवित्रारोपण का इस साधना में क्या विशेष स्थान है।
सावन मास में शिव आराधना का महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सावन के महीने में भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। ऐसे में सृष्टि के संचालन और संरक्षण का संपूर्ण दायित्व भगवान शिव संभालते हैं। समुद्र मंथन के दौरान जब संसार को भस्म करने वाला 'हलाहल' विष निकला था, तब भगवान शिव ने ही पूरी सृष्टि की रक्षा के लिए उसे अपने कंठ में धारण किया था। विष के ताप को शांत करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन पर शीतल जल अर्पित किया था। यही कारण है कि सावन में शिवजी को जल, बेलपत्र और भांग-धतूरा चढ़ाने से वे तुरंत प्रसन्न होकर भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं। सावन में की गई थोड़ी सी भी शिव भक्ति अक्षय पुण्य प्रदान करती है।
'शिव पवित्रारोपणम्' क्या है?
'पवित्रारोपण' दो शब्दों से मिलकर बना है - पवित्र + आरोपण (अर्थात सूत या रेशम के शोधित व पवित्र धागों की माला निर्मित करके भगवान को अर्पित करना)।
यह वार्षिक शुद्धि और क्षमा-याचना का एक विशेष तांत्रिक व पौराणिक अनुष्ठान है। अग्नि पुराण, शिव पुराण और लिंग पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में इसका विस्तृत उल्लेख मिलता है। सामान्यतः इसे श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी या पूर्णिमा तिथि पर संपन्न किया जाता है।
सावन में शिव पवित्रारोपण का विशेष धार्मिक महत्व
1.वर्ष भर की पूजा की भूल-चूक का निवारण:
मनुष्य पूरे वर्ष भगवान शिव की पूजा, मंत्र जप या अनुष्ठान करता है, लेकिन अनजाने में पूजा विधान में कोई मंत्र-लोप, तिथि-भूल या अशुद्धि रह ही जाती है। शास्त्रों के अनुसार, सावन में भगवान शिव पर 'पवित्रक' (धागे की माला) अर्पित करने से वर्ष भर की पूजा में हुई सभी अनजानी गलतियों और दोषों का नाश हो जाता है।
2.सांवत्सरिक (संपूर्ण वर्ष) पूजा फल की प्राप्ति:
अग्नि पुराण का स्पष्ट कथन है कि जो भक्त श्रद्धापूर्वक सावन में शिव जी का पवित्रारोपण संस्कार करता है, उसे पूरे 365 दिन नियमित रूप से की गई शिव पूजा का अखंड फल एक ही दिन में प्राप्त हो जाता है।
3. आत्म-शुद्धि और अक्षय पुण्य:
कपास या शुद्ध रेशम के धागों को हल्दी, केसर और चंदन से रंगकर, उसमें विशेष गांठें (ग्रंथियां) लगाकर "ॐ नमः शिवाय" या महामृत्युंजय मंत्र के साथ शिवजी को धारण कराया जाता है। यह प्रक्रिया साधक के मन, वचन और कर्म को शुद्ध कर उसे अक्षय पुण्य की ओर ले जाती है।
Shiv Pavitraropan in Shravan: Ancient Ritual with Powerful Spiritual Significance
सावन का महीना केवल बाहरी प्रकृति के निखार का समय नहीं है, बल्कि यह अंतरात्मा को शिव भक्ति में डुबोकर शुद्ध करने का स्वर्णिम अवसर है। इस पावन मास में भगवान शिव का जलाभिषेक करने के साथ-साथ यदि 'शिव पवित्रारोपण' का विधान किया जाए, तो भक्ति पूर्णता को प्राप्त होती है और जीवन में सुख, शांति तथा आरोग्य का विस्तार होता है। प्रस्तुति: श्री गीतांजलि ज्योतिष केंद्र, इंदौर।

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