आखिर क्यों शिवराज सिंह अपने ही क्षेत्र के किसानों की बड़ी समस्या को नजरअंदाज कर रहे हैं?

Updesh Awasthee
भोपाल, 28 जुलाई 2026:
श्री शिवराज सिंह चौहान जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो बुलंद आवाज में कहते थे कि किसानों का एक-एक दाना खरीदा जाएगा और आज जब उनके हाथ में पावर है, केंद्रीय कृषि मंत्री बन गए हैं तो समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा क्या हुआ, सारे हालात बदल गए, शिवराज सिंह के जज्बात बदल गए। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर क्यों केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, जो स्वयं इसी माटी के लाल हैं और किसानों की नब्ज पहचानते हैं, अपने ही क्षेत्र के किसानों की इस बड़ी समस्या को नजरअंदाज कर रहे हैं? 

कथनी और करनी में अंतर? 

यह विडंबना ही है कि किसानों की समस्याओं से भली-भांति वाकिफ होने के बावजूद, शिवराज सिंह चौहान द्वारा राज्य सरकार की मदद में हाथ खींचने के संकेत मिल रहे हैं। प्रदेश के कृषि मंत्री ऐदल सिंह कंषाना द्वारा लिखे गए एक ताजा पत्र ने इस खींचतान को जगजाहिर कर दिया है। पत्र के अनुसार, राज्य सरकार ने 8.06 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीदने का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन केंद्र ने केवल 4.54 लाख मीट्रिक टन का ही लक्ष्य दिया है, जो ऊंट के मुँह में जीरा समान है। सब जानते हैं कि राज्य सरकार अपनी मर्जी से खरीदारी नहीं कर सकती। केंद्र की मंजूरी जरूरी है। शिवराज सिंह चौहान की मंजूरी जरूरी है।

आंकड़ों में उपेक्षा की कहानी:

  • इस साल राज्य में 20.16 लाख मीट्रिक टन मूंग का बम्पर उत्पादन होने का अनुमान है, लेकिन शिवराज सिंह केवल एक-चौथाई हिस्सा खरीदने पर अड़े हुए हैं।
  • उपार्जन के लिए 3.47 लाख किसानों ने उम्मीद के साथ रजिस्ट्रेशन कराया है, मगर केंद्रीय कृषि मंत्रालय की गड़बड़ी के कारण अब तक मात्र 82 हजार किसान ही अपनी फसल बेच पाए हैं।
  • पिछले साल मध्य प्रदेश ने 7.72 लाख मीट्रिक टन की रिकॉर्ड खरीदी की थी, फिर भी इस बार लक्ष्य आधा कर दिया गया है।

क्या आंदोलन बढ़ने का हो रहा इंतज़ार? 

राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह को किसानों के बढ़ते आक्रोश की पूरी जानकारी थी, फिर भी लक्ष्य बढ़ाने में हो रही देरी ने 'आंदोलन की आग' को हवा देने का काम किया है। राज्य सरकार बार-बार अनुरोध कर रही है कि 'प्राईस सपोर्ट स्कीम' के तहत अन्य राज्यों के बचे हुए कोटे को मध्यप्रदेश को स्थानांतरित किया जाए, ताकि किसानों को MSP का लाभ मिल सके। 

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते 8.06 लाख मीट्रिक टन (कुल उत्पादन का 40%) का लक्ष्य नहीं बढ़ाया गया, तो लाखों किसानों का गुस्सा सीधे तौर पर डबल इंजन की सरकार को प्रभावित करेगा। फिलहाल, गेंद शिवराज सिंह के पाले में है और किसान अपनी ही 'माटी के बेटे' से न्याय की उम्मीद लगाए बैठा है।

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