VIDEO NEWS - मध्य प्रदेश की देवगंगा में शौचालय का पानी, भगवान श्री राम ने भी श्रद्धापूर्वक स्नान किया था

Updesh Awasthee
भोपाल समाचार, 14 जुलाई 2026:
मध्य प्रदेश में हर साल करोड़ों लोग धार्मिक पर्यटन पर आते हैं लेकिन मध्य प्रदेश सरकार आज भी पौराणिक और धार्मिक महत्व के विश्व प्रसिद्ध स्थलों का संरक्षण करने में पूरी तरह से असफल दिखाई देती है। देवगंगा जिसे सती माता अनुसूया ने अपनी तपस्या के प्रभाव से पृथ्वी पर प्रकट किया। जिसके आचमन मात्र से पापों से मुक्ति मिल जाती है। जिसमें भगवान श्री राम ने और उनके बाद भरत इत्यादि पूरे राजवंश ने स्नान किया। आज वह मंदाकिनी, एक गंदे नाले से अधिक कुछ भी नहीं है। पूरे मध्य प्रदेश में जल गंगा अभियान चला लेकिन यहां पर कलेक्टर ने कुछ नहीं किया। नदी में बड़े पैमाने पर शौचालय का पानी मिलाया जा रहा है। 

इस नदी को निर्मल बनाने के लिए करोड़ों खर्च होते हैं

मध्य प्रदेश के सतना जिले में (जहां से नदी का उद्गम होता है) मंगलवार (14 जुलाई 2026) को रामघाट एवं उसके आसपास किए गए मौके के निरीक्षण, वीडियो और तस्वीरों में कई स्थानों पर नालों से काला, दुर्गंधयुक्त सीवर का पानी सीधे मंदाकिनी नदी में गिरता दिखाई दे रहा है। नदी के किनारों पर प्लास्टिक, कचरा, जलकुंभी और गंदगी के ढेर साफ नजर आ रहे हैं। यह स्थिति तब है, जब वर्षों से नदी को स्वच्छ बनाने के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं और समय-समय पर न्यायालयों तथा राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) भी सख्त निर्देश जारी कर चुका है। सामाजिक कार्यकर्ता सर्वेश सोनी द्वारा वर्ष 2025 से लगातार इस मुद्दे को उठाया जाता रहा है। 

मंदाकिनी नदी का पौराणिक महत्व 

पौराणिक कथा के अनुसार, ऋषि अत्रि तपस्या में लीन थे और उन्हें जल की आवश्यकता पड़ी। उनकी पत्नी माता सती अनुसुईया ने अपनी तपस्या के प्रभाव से देवगंगा को पृथ्वी पर प्रकट किया, जो मंदाकिनी नदी के रूप में बहने लगी। अनुसुईया आश्रम के पास इसका उद्गम माना जाता है। वर्तमान में यह क्षेत्र मध्य प्रदेश के सतना जिले में आता है। चित्रकूट भगवान श्री राम की कर्मभूमि है। वनवास काल में राम, सीता और लक्ष्मण ने यहां निवास किया। रामघाट पर भगवान राम ने स्नान किया था। श्रद्धालु आज भी यहां स्नान कर पाप मुक्ति और मनोकामना पूर्ति की कामना करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस नदी का वर्णन किया है:- 
“यहाँ भरतु सब सहित सुहाए, मंदाकिनी पुनीत नहाए”।

धार्मिक पर्यटन के लिए कितना पोटेंशियल है 

भगवान श्री राम केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में रहने वाले हिंदुओं के आराध्य हैं, और इसके कारण दुनिया भर के अन्य लोगों के लिए भी अध्ययन का विषय हैं। उनके जन्म स्थान अयोध्या में भव्य मंदिर बन चुका है। हर साल करोड़ों लोग आ रहे हैं। स्वाभाविक है कि लोग जानना चाहते हैं, वनवास के दौरान भगवान श्री राम, माता सीता के साथ कहां रहते थे, जीवन यापन कैसे करते थे। और फिर देवगंगा का अपना महत्व है। केवल देवगंगा की कथा और पवित्रता के कारण हर साल करोड़ों श्रद्धालुओं को यहां आकर्षित किया जा सकता है।

गंदा पानी सीधे नदी में गिर रहा है

वीडियो और तस्वीरों में कई स्थानों पर नालों से लगातार गंदा पानी नदी में गिरता दिखाई देता है। रामघाट के आसपास पानी की सतह पर कचरा, प्लास्टिक, जलकुंभी और सीवर का बहाव स्पष्ट नजर आता है। कुछ स्थानों पर नाले के आउटफॉल से झागयुक्त गंदा पानी सीधे नदी में गिर रहा है, जबकि घाट पर श्रद्धालुओं की आवाजाही भी जारी है। इससे धार्मिक आस्था के साथ-साथ जनस्वास्थ्य पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

करोड़ों खर्च, लेकिन नतीजा शून्य?

पूर्व में विभिन्न समाचार माध्यमों में प्रकाशित रिपोर्टों और सरकारी दावों में मंदाकिनी नदी के संरक्षण, सीवरेज प्रबंधन, घाट सौंदर्यीकरण और प्रदूषण नियंत्रण पर करोड़ों रुपये खर्च होने की जानकारी दी गई थी। इसके बावजूद यदि आज भी बिना उपचार का सीवर सीधे नदी में मिल रहा है, तो यह परियोजनाओं की प्रभावशीलता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।

NGT पहले भी जता चुका है सख्त नाराजगी

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) देशभर की नदियों में बिना उपचार वाले सीवेज के प्रवाह को रोकने, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) स्थापित करने, नालों को इंटरसेप्ट करने तथा प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और स्थानीय निकायों की जवाबदेही तय करने के संबंध में कई बार निर्देश दे चुका है। विभिन्न मामलों में NGT ने यह भी स्पष्ट किया है कि बिना उपचार का सीवर किसी भी नदी में गिरना पर्यावरणीय नियमों का गंभीर उल्लंघन है और संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।

यदि चित्रकूट में आज भी यही स्थिति बनी हुई है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि NGT के निर्देशों का पालन किस स्तर पर हुआ और किस स्तर पर लापरवाही बरती गई।

सरकारी और राजनीतिक स्तर पर जिम्मेदार कौन?

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि नगरीय निकाय, सीवरेज परियोजनाओं से जुड़ी एजेंसियां, जल संसाधन एवं नगरीय प्रशासन विभाग तथा प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े अधिकारी वर्षों से इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं कर सके। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि बार-बार शिकायतें, समाचार और वीडियो सामने आने के बावजूद स्थिति जस की तस है, तो अब तक किसी अधिकारी की व्यक्तिगत जवाबदेही क्यों तय नहीं की गई?

क्या होना चाहिए

  • मंदाकिनी नदी में गिर रहे सभी सीवर आउटफॉल की तत्काल पहचान कर उन्हें बंद किया जाए।
  • सभी नालों को STP से जोड़ा जाए और बिना उपचार का पानी नदी में जाने पर पूर्ण रोक लगे।
  • NGT के आदेशों के पालन की उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच कराई जाए।
  • परियोजनाओं पर हुए खर्च का सामाजिक एवं तकनीकी ऑडिट कराया जाए।
  • लापरवाही के दोषी अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों के विरुद्ध विभागीय एवं दंडात्मक कार्रवाई कर व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाए।

सबसे बड़ी जिम्मेदारी किसकी? 

सबसे बड़ी जिम्मेदारी मध्य प्रदेश के चित्रकूट में रहने वाली जनता की है। यदि वह चाहते हैं कि चित्रकूट एक विश्व प्रसिद्ध धार्मिक पर्यटक स्थल बने तो उनको एकजुट होना पड़ेगा। जब राम के लिए आंदोलन कर सकते हैं तो, चित्रकूट के लिए आंदोलन से निषेध किसने कर दिया है। यकीन मानिए यदि चित्रकूट की जनता चित्रकूट को विश्व प्रसिद्ध धार्मिक पर्यटक स्थल बनाना चाहती है तो सरकार को उज्जैन जैसा प्रोजेक्ट बनाने के लिए मजबूर हो जाना पड़ेगा। इसका फायदा भी चित्रकूट की जनता को ही मिलेगा, लेकिन यदि जनता घर बैठी रही और इस समाचार को सोशल मीडिया पर शेयर करके कल्याण की कल्पना कर रही है तो जो हाल ग्वालियर की स्वर्ण रेखा नदी का हुआ है, यकीन मानिए वही मंदाकिनी का होगा। 

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