पंचायत चुनाव में दो बच्चे वाली पॉलिसी पर सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 14 जुलाई 2026
: सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में पंचायत चुनाव लड़ने के लिए लागू two-child norm for contesting panchayat elections को "बेकार" (useless) करार दिया है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ महाराष्ट्र की एक पूर्व सरपंच, मंगला भीमराव इंगले की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिन्हें तीसरा बच्चा होने के कारण पद से अयोग्य (disqualify) घोषित कर दिया गया था। बॉम्बे हाई कोर्ट ने पहले महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम के तहत उनकी अयोग्यता को बरकरार रखा था, लेकिन अब शीर्ष अदालत ने इस कानून की वर्तमान प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। 

India’s declining fertility rate and the need to reconsider population policies

सुनवाई के दौरान जस्टिस नरसिम्हा ने भारत के बदलते जनसांख्यिकीय प्रोफाइल (changing demographic profile) का हवाला देते हुए इस नीति की निरंतरता पर सवाल उठाए। उन्होंने टिप्पणी की कि Javed v. State of Haryana case needs reconsideration क्योंकि देश अब बदल चुका है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि भारत की प्रजनन दर (fertility rate) गिरकर लगभग 1.7 रह गई है। विशेष रूप से, केरल और तमिलनाडु जैसे तटीय राज्यों में यह दर कुछ स्कैंडिनेवियाई देशों (Scandinavian countries) से भी कम दर्ज की गई है, जो जनसंख्या वृद्धि को कम करने वाली पुरानी नीतियों की आवश्यकता को समाप्त करती है।

Why two-child norm for panchayat members is termed unconstitutional in present scenario

अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि वर्तमान जनसांख्यिकीय परिदृश्य में ऐसी नीति को कायम रखना "पूरी तरह से असंवैधानिक" (completely unconstitutional) प्रतीत होता है। जस्टिस नरसिम्हा के अनुसार, जनसंख्या कम करने के उद्देश्य से बनाई गई इस नीति को आज के समय में थोपना तर्कसंगत नहीं है। यह मामला तब शुरू हुआ जब महाराष्ट्र के बुलढाणा में अतिरिक्त कलेक्टर ने अक्टूबर 2024 में इंगले को अयोग्य घोषित कर दिया था, जिसे बाद में हाई कोर्ट ने भी सही ठहराया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस नीति के व्यापक प्रभाव को देखते हुए इसे फिर से परखने का निर्णय लिया है। 

Misuse of two-child disqualification rules as a weapon by rival candidates

कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक पहलू की ओर भी ध्यान आकर्षित किया कि वर्तमान पीढ़ी में तीन बच्चे होना एक दुर्लभ बात (rarity) है। जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि this policy has lost its effect और इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए क्योंकि प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार इसका उपयोग एक "हथियार" (weapon) के रूप में करते हैं ताकि निर्वाचित प्रतिनिधियों को अयोग्य ठहराया जा सके। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जहां कुछ राज्य अभी भी इन कड़े नियमों को लागू कर रहे हैं, वहीं कुछ अन्य राज्य अब जनसंख्या वृद्धि को प्रोत्साहित करने के लिए प्रोत्साहन (incentives) दे रहे हैं।

Supreme Court appoints Amicus Curiae to study two-child laws across Indian states

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता रुक्मिणी बोबडे को Amicus Curiae (न्याय मित्र) नियुक्त किया है, जो इस बड़े मुद्दे पर अदालत की सहायता करेंगी। कोर्ट ने उन्हें यह पता लगाने का निर्देश दिया है कि भारत के कितने राज्यों में अभी भी इस तरह की 'दो बच्चों की नीति' लागू है। हालांकि सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि प्रजनन दर मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों में कम हुई है, लेकिन पीठ ने इस पर और अधिक शोध करने को कहा है। इस मामले की अगली सुनवाई अब 28 जुलाई को निर्धारित की गई है।

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