प्रिय श्रद्धालुओ, यह श्री राम भक्त हनुमान के एक दिव्य मंदिर की ऐसी कथा है, जहां हनुमान जी स्वयं प्रतिमा नहीं बल्कि शिला के रूप में उपस्थित हैं। इस मंदिर की स्थापना एक ऐसे संत ने की थी जो, शरीर त्याग कर भी अपने अस्तित्व में रहते थे। यहां भक्तों के केवल कष्ट ही दूर नहीं होते बल्कि जीवन में चमत्कार होते हैं। पिछले 250 वर्षों से यह निरंतर हो रहा है। बाबा द्वारा स्थापित हनुमान प्रतिमाएं और उनका चमत्कारी शंख आज भी मंदिर में स्थापित है।
प्रथम अध्याय:
मंगलाचरण: अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं, दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं, रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
आज से लगभग दो शताब्दी पूर्व, जब भोपाल नाम के नगर में एक क्रूर नवाब शासन का साया था, तब ' हनुमानगंज क्षेत्र' के सघन उद्यान और पीपल के प्राचीन वृक्षों की ओट में एक परम तेजस्वी विभूति का वास था।संत कमलदास जी, जिन्हें लोक-मानस शंख बाबा के नाम से भी पुकारता था। उनका अंतःकरण श्री राम नाम के रस से सराबोर रहता था। जब सारा संसार निद्रा के आगोश में होता, तब ब्रह्ममुहूर्त में बाबा के शंख की वह अलोकिक ध्वनि गूँजती थी जो दसों दिशाओं को राम-मय कर देती थी। वह शंखनाद केवल शब्द नहीं, अपितु प्रभु के चरणों में अर्पित एक भक्तिमयी पुकार थी।
द्वितीय अध्याय:
उस दिव्य शंख की गर्जना बेगम के महलों तक पहुँचती थी, जिसे वह अपने विश्राम में व्याघात मानती थी। राजसी अहंकार के वशीभूत होकर, बेगम ने उस नाद-ब्रह्म को मौन करने का आदेश दे दिया। सैनिकों ने जब बाबा को डराया, तो उस विरक्त संत ने बड़ी मधुर वाणी में कहा, "हे वत्स! यह शंख तो तभी रुकेगा जब मेरे प्राण पखेरू उड़ेंगे"। यह सुनकर राज सिंहासन पर विराजमान बेगम ने ब्रह्म काल में शंखनाथ करने के लिए बाबा को मृत्युदंड का आदेश दे दिया। बेगम के आदेश पर जब सैनिक संत के प्राण हरने पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि बाबा का शरीर तो निष्प्राण पड़ा है। किंतु अहो!
आश्चर्य की पराकाष्ठा तो देखिए, अगली भोर फिर वही तेजस्वी शंखनाद समस्त नगर में गुंजायमान हो उठा। स्वयं बेगम जब उस स्थल पर पहुँचीं, तो उन्हें शंख की ध्वनि तो सुनाई दे रही थी, पर संत का विग्रह कहीं दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था। यह देख बेगम का हृदय भयभीत हो गया और उन्हें एहसास हुआ कि यह कोई साधारण फकीर नहीं, अपितु साक्षात प्रभु का दूत है।
तृतीय अध्याय:
बेगम ने तुरंत बाबा से क्षमा याचना की और अपने राज्य व प्राणों की रक्षा के बदले, बाबा की इष्ट देव हनुमान जी का विशाल मंदिर बनवाने का वचन दिया। दूसरे दिन ब्रह्म मुहूर्त में बाबा ने जब शंखनाथ किया तो जहां तक आवाज सुनाई दी, वहां तक की भूमि बाबा के आश्रम और मंदिर के नाम कर दी गई। यह लगभग 12 एकड़ भूमि थी। भविष्य में कोई प्रश्न ना हो इसलिए यह भूमि ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण करवाकर मंदिर के लिए समर्पित की गई। आज उसी पवित्र धरा पर दक्षिणमुखी हनुमान जी की तीन दिव्य अर्द्ध-शिला प्रतिमाएँ शोभायमान हैं। एक विशाल 9 फीट की, दूसरी 3 फीट की और तीसरी वह नन्हीं 2 फीट की प्रतिमा, जिसकी सेवा स्वयं बाबा अपने कर-कमलों से करते थे।
चतुर्थ अध्याय
एक समय की बात है, बेगम का बहुमूल्य हार लुप्त हो गया। यह राज परिवार के लिए प्रतिष्ठा का विषय था क्योंकि यदि वह बहुमूल्य हार नहीं मिलता तो इतिहास में यह दर्द होता कि राजा की महल से बहुमूल्य हर चोरी हो गया। जो राजा अपने महल की रक्षा नहीं कर सकता, वह प्रजा की रक्षा क्या करेगा। जब सभी प्रयास सफल हो गए तब बेगम, संत कमल दास के पास पहुंची और विनम्रता पूर्वक आग्रह किया। तब अंतर्यामी संत ने सहज ही बता दिया कि, "मैया! चिंता का परित्याग करो, तुम्हारा बहुमूल्य आभूषण, लाल वस्त्र में लिपटा हुआ तुम्हारी शय्या के नीचे सुरक्षित है"। जब हार यथास्थान मिल गया, तो बेगम ने प्रसन्नतापूर्वक कहना चाहा: कमाल ही हो गया बाबा! लेकिन अत्यंत उत्साह के कारण उनके मुख से केवल "कमाली बाबा" निकाला। और तभी से नगर के सभी लोग दिव्या संत कमलदास जी को 'कमाली बाबा' के नाम से पुकारने लगे। बेगम ने श्रद्धापूर्वक उस पावन क्षेत्र का नाम 'हनुमानगंज' घोषित किया। जिसको पहले घोड़ा नक्कास कहा जाता था।
पंचम अध्याय
भव्य मंदिर की स्थापना हो जाने के बाद "कमाली बाबा" जिस पीपल के वृक्ष के नीचे साधना किया करते थे वहीं पर योग समाधि लेकर ब्रह्मलीन हो गए। संत कमलदास जी ने कई बार यह प्रमाणित किया कि उनका अस्तित्व उनके शरीर से अलग है और वह अपने शरीर के बिना भी अस्तित्व में रहते हैं। इसलिए भक्तों की मान्यता है कि, संत कमलदास जी आज भी इसी वृक्ष के नीचे, साधना में बैठे हुए हैं। जैसे भोपाल की बेगम का कष्ट दूर किया, वैसे ही श्री राम भक्त हनुमान की कृपा से सबके कष्ट दूर करते हैं।
।। इति श्रीआचार्योपदेशावस्थीविरचिता श्रीकमालीहनुमद्दिव्यकथा सम्पूर्णा ।।
बोलिये श्री कमाली हनुमान जी महाराज की जय!
॥ श्री सीतारामचन्द्राय नमः ॥ ॥ श्री हनुमते नमः ॥
Legal Disclaimer & Copyright Notice
This work is protected by copyright. No part of this content, including its text, stories, images, or illustrations, may be copied, reproduced, published, distributed, or used in any form without the prior written permission of the copyright owner. Any unauthorized use shall constitute copyright infringement and may result in civil and/or criminal legal action without prior notice. As this notice forms an integral part of the content, any person using or copying any portion of this work shall be deemed to have read and accepted these copyright restrictions.

.webp)

.webp)

