भोपाल नगर निगम के ऑनलाइन सिस्टम के कारण भ्रष्टाचार, ALL OK वाले अधिकारी के खिलाफ जांच तक नहीं

Updesh Awasthee
भोपाल, 13 जुलाई 2026:
नगर निगम भोपाल में टैक्स घोटाले को लेकर बवाल मचा हुआ है। घोटाले की राशि एक करोड़ तक पहुंच गई है। इसके और अधिक बढ़ने की संभावना है। इस मामले में घोटाला करने वालों के खिलाफ तो कार्रवाई हो रही है लेकिन भ्रष्टाचार के लिए रेडी ऑनलाइन सिस्टम बनवाने वाले अधिकारी और ऑनलाइन सिस्टम को ALL OK रिपोर्ट देने वाले अधिकारी के खिलाफ जांच तक शुरू नहीं हुई है। 

Bhopal Municipal Corporation: Questions Raised Over Online System, 'All OK' Officer Escapes Probe

जरा बताइए यदि आपने अपने घर की चोरों से सुरक्षा के लिए सिक्योरिटी गार्ड तैनात किया है और आपका सिक्योरिटी गार्ड ताले की दूसरी चाबी टेबल पर रखकर कहीं चला जाए और कर उस चाबी का उपयोग करके बड़ी आसानी से चोरी करने में सफल हो जाए तो चोर के खिलाफ तो कार्रवाई होगी लेकिन क्या सिक्योरिटी गार्ड को माफ कर दिया जाएगा? नगर निगम भोपाल में बिल्कुल ऐसा ही हुआ है। ऑनलाइन पेमेंट से संबंधित जितने भी सॉफ्टवेयर बनाए जाते हैं, चाहे वह कितने भी सस्ते क्यों ना हो, एक फीचर सभी सॉफ्टवेयर में होता है। कोई भी व्यक्ति एक UTR Number से दो रसीद जनरेट नहीं कर सकता। सिस्टम में एक बार एक UTR Number दर्ज हो गया तो उसको दोबारा दर्ज नहीं किया जा सकता क्योंकि UTR Number ही तो पेमेंट की गारंटी होता है। भोपाल नगर निगम के सॉफ्टवेयर में जानबूझकर यह फीचर डीएक्टिवेट किया गया होगा। तभी तो क्लर्क और कंप्यूटर ऑपरेटर जैसे कर्मचारियों ने बड़ी आसानी से इतने बड़े पैमाने पर घोटाला कर दिया। 

कंप्यूटर ऑपरेटर को पता चला या बताया गया

सामान्य तौर पर कोई व्यक्ति सॉफ्टवेयर में एक UTR Number दोबारा नहीं डालता, क्योंकि यह सब को पता होता है कि UTR Number प्रत्येक व्यक्ति के लिए यूनिक होता है, अलग से जनरेट होता है। फिर नगर निगम की स्कीम/प्लानिंग ब्रांच में क्लर्क मोहम्मद समीर को इसके बारे में कैसे पता चला। जबकि मोहम्मद समीर का टैक्स कलेक्शन से और सॉफ्टवेयर से कोई रिश्ता ही नहीं था। सवाल तो बनता है कि क्या मोहम्मद समीर या अस्थाई कंप्यूटर ऑपरेटर शिराज उलहक को खुद सॉफ्टवेयर में इस गड़बड़ी के बारे में पता चला या फिर किसी ने उनको बताया और किसी के निर्देशानुसार क्लर्क ने टीम बनाई। 

वार्ड प्रभारी को कंप्यूटर नहीं आता, सॉफ्टवेयर का आईडी पासवर्ड दे दिया?

इस मामले में सिस्टम में एक और गड़बड़ी सामने आती है। वार्ड प्रभारी श्री रघुवीर तिवारी, जिनको खुद कंप्यूटर चलाना नहीं आता, उनके नाम से सॉफ्टवेयर की आईडी और पासवर्ड जनरेट किए गए थे। मतलब यह कैसे अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई थी जो जिम्मेदारी के लायक ही नहीं था। मध्य प्रदेश में ऐसे एक नहीं कई अधिकारी हैं जिनकी आईडी पासवर्ड, कंप्यूटर ऑपरेटर के पास होते हैं और कंप्यूटर ऑपरेटर जो चाहे वह कर सकता है, अधिकारी को पता ही नहीं चलता। सवाल यह है कि यदि अधिकारी को सॉफ्टवेयर ऑपरेट करना नहीं आता तो उसकी ट्रेनिंग दी जानी चाहिए और यदि उसके बाद भी वह ऑनलाइन सॉफ्टवेयर लॉगिन करना तक नहीं सीख पाता है तो उसकी ड्यूटी जनगणना में लगा देनी चाहिए।

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