भोपाल, 1 जून 2026: भोपाल का नवाब हमीदुल्लाह खान, जिसको प्रजामंडल आंदोलन के बावजूद दशकों तक एक महान राजा बताया जाता रहा, मूल रूप से एक सनकी और पद का लालची राजा था। 1947 में जब भारत आजाद हो रहा था तब भोपाल का नवाब भोपाल को पाकिस्तान में शामिल करना चाहता था। सफल नहीं हो पाया तो भी उसने अपने प्रयास कम नहीं किया। पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने के लिए जी तोड़ कोशिश की। यहां तक कि एक बार पाकिस्तान पहुंच गया था, लेकिन फिर जान बचाने के लिए रातों-रात भाग निकला।
Bhopal’s Nawab Once Dreamed of Becoming Pakistan’s Prime Minister, Reached Karachi for the Bid
यह घटना पाकिस्तान क्रॉनिकल (अकील अब्बास जाफरी) पुस्तक और खान ऑफ कलात की किताब Inside Balochistan पर आधारित है। BBC और अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों द्वारा इस घटना का विस्तार से वर्णन किया गया है। बीबीसी के लेखक और स्तंभकार फ़ारूक़ आदिल 30 जुलाई 2020 को प्रकाशित हुए लेख में लिखते हैं, 1956 में जुलाई के महीने में पाकिस्तान में प्रधानमंत्री चौधरी मोहम्मद अली को उनके पद से हटाने के लिए जबरदस्त साजिश रची जा रही थी। पाकिस्तान की पॉलिटिक्स में वह अकेले पड़ गए थे। पाकिस्तान के राष्ट्रपति मेजर जनरल (रिटायर्ड) इस्कंदर मिर्ज़ा किसी भी स्थिति में अपनी कुर्सी सुरक्षित करना चाहते थे। यह कहानी आज इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि आज 1 जून, भोपाल का स्वतंत्रता दिवस है। हां, भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया था लेकिन भोपाल 1 जून 1949 को भोपाल की आजादी के आंदोलन "प्रजामंडल आंदोलन" के बाद स्वतंत्र हो पाया और भारत का हिस्सा बन पाया।
किताब 'इनसाइड बलोचिस्तान' में लिखा है कि, इस्कंदर मिर्ज़ा पाकिस्तान का राष्ट्रपति बने रहने के लिए पाकिस्तान में मार्शल लॉ लगाने तक को तैयार थे। उन्होंने इसकी योजना बना ली थी। उन्होंने तय किया था कि पाकिस्तान में मार्शल लॉ लगाने के बाद वह स्वयं राष्ट्रपति बने रहेंगे और पाकिस्तान के नवाब को प्रधानमंत्री बना देंगे। इस्कंदर मिर्ज़ा की योजना में नरसंहार भी था। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि जो भी रास्ते में आएगा उसे मार दिया जाएगा। इस योजना कोमल करने के लिए भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खान कराची पहुंच गए थे। दरअसल, भोपाल के नवाब ने पाकिस्तान में काफी प्रॉपर्टी खरीद ली थी, और अपनी पॉलिटिकल पोजीशन स्ट्रांग करने के लिए उन्होंने कई नेताओं के साथ फैमिली रिलेशन बना लिए थे। इस्कंदर मिर्ज़ा और खान ऑफ कलात, दोनों के साथ उनके बड़े अच्छे संबंध बन गए थे।
किताब में लिखा है कि ख़ान ऑफ़ क़लात और नवाब ऑफ़ भोपाल दोनों, जब कराची में मिले तो समय बर्बाद किए बिना असल मुद्दे पर आ गए। खान ऑफ कलात ने अपनी किताब में लिखा है कि उनके और नवाब ऑफ भोपाल के बीच में क्या बातचीत हुई।
नवाब ऑफ़ भोपाल: "मेरे यहाँ आने का मक़सद वो स्कीम है, जिसमें मेरा नाम शामिल किया गया है। मैंने इस्कंदर मिर्ज़ा की पेशकश स्वीकार कर ली है और अब मैं चाहता हूँ कि इस स्कीम की विस्तार से जानकारी हासिल करूँ।"
ख़ान ऑफ़ क़लात: "स्थिति अलग भी तो हो सकती है, क्योंकि (मेरी राय में) आपका नाम स्कीम में सिर्फ़ इसलिए शामिल किया गया है ताकि वो (इस्कंदर मिर्ज़ा) अपना फ़ायदा हासिल कर सकें।" (नवाब इस पर हैरान रह गए)।
नवाब ऑफ़ भोपाल : "अगर ये बात है तो फिर मेरा इस स्कीम से कोई संबंध नहीं, जो राष्ट्रपति के दिमाग़ में है।"
ख़ान ऑफ़ क़लात ने उन्हें राजनैतिक पार्टियों की गुटबंदी के बारे में विस्तार से बताने के अलावा ये भी बताया कि सत्ता में इस्कंदर मिर्ज़ा के दिन अब गिने चुने हैं। वो बहुत जल्दी राष्ट्रपति के पद से हटाए जाने वाले हैं। वो ख़ुद को इस अंजाम से बचाने के लिए हम दोनों को बलि का बकरा बनाना चाहते हैं। इसका मतलब साफ था कि यदि इस्कंदर मिर्ज़ा का साथ दिया तो जान से मारे जाने की संभावना बहुत ज्यादा है।
इसके बाद भोपाल के नवाब की रणनीति बदल गई। उन्होंने बातचीत के दौरान यह भी बताया कि उन्हें भारत सरकार की तरफ से 20 लाख रुपए भत्ता, सम्मान और विशेष अधिकार भी मिलता है। इसके साथ ब्रिटेन में कारोबार करने की आजादी भी मिलती है। फिर भोपाल के नवाब ने बड़ी चतुराई के साथ इस्कंदर मिर्ज़ा से हुई मुलाकात में उन्हें आश्वासन दिया कि मैं अपने लंदन का कारोबार सबमिट कर वापस आता हूं, और जान बचाकर पाकिस्तान से खिसक गए। इसके बाद फिर कभी पाकिस्तान नहीं गए। जबकि 1947 में वह खुद को पाकिस्तान का सबसे बड़ा हामिद कहा करते थे।
शुरू से अंत तक की कहानी तो बहुत लंबी है लेकिन एक बात निष्कर्ष के रूप में कहीं जा सकती है कि पाकिस्तान का नवाब हमीदुल्लाह खान, एक हाई प्रोफाइल और बेहद महत्वाकांक्षी इंसान था। भोपाल की जनता पर शासन करने के लिए शरिया लागू करता था। जबकि स्वयं इस्लाम के नाम पर हमेशा फायदा उठाने की कोशिश करता था और जब कभी खतरा महसूस हुआ, भाग जाता था।

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