नई दिल्ली, 27 मई 2026: सुप्रीम कोर्ट आफ इंडिया ने मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में वन रक्षकों के सभी रिक्त पदों पर तत्काल भर्ती प्रक्रिया शुरू करने के आदेश दिए हैं। इसके अलावा पुलिस को आदेश दिया है कि, अवैध रेट उत्खनन के मामले में केवल वहां के ड्राइवर के खिलाफ नहीं बल्कि वहां के मालिक और माफिया के खिलाफ भी कठोर कार्रवाई करें। राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (Suo Moto) लेते हुए रेत माफिया के खाते में के लिए अभियान शुरू कर दिया है।
संकट में चंबल की पारिस्थितिकी (The Backstory)
यह मामला (Suo Moto Writ Petition (Civil) No. 2 of 2026) चंबल नदी में हो रहे बेखौफ अवैध रेत खनन और इससे घड़ियाल, डॉल्फिन और कछुओं जैसी लुप्तप्राय प्रजातियों के अस्तित्व पर मंडराते खतरे से संबंधित है। केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (Central Empowered Committee - CEC) की रिपोर्ट में पाया गया कि संगठित खनन नेटवर्क न केवल पर्यावरण को नष्ट कर रहे हैं, बल्कि राष्ट्रीय राजमार्ग-44 (NH-44) के पुल के पिलरों के पास खुदाई करके उसे भी असुरक्षित बना रहे हैं।
न्यायालय की विशेष टिप्पणियाँ
कोर्ट ने राज्यों की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए इसे "प्रशासनिक उदासीनता और संस्थागत पक्षाघात" (Administrative apathy and institutional paralysis) करार दिया।
राजस्थान सरकार की प्रतिक्रिया को "फीका" (Lacklustre) बताया गया।
अदालत ने कहा कि राज्य केवल तब जागते हैं जब वरिष्ठ अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से तलब किया जाता है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल सीसीटीवी कैमरे लगाना जमीन पर तैनात वन रक्षकों (Forest Guards) का विकल्प नहीं हो सकता।
दोनों पक्षों के मुख्य तर्क (Arguments)
राज्य सरकारें (MP, Rajasthan, UP): राज्यों ने हलफनामों के माध्यम से की गई गिरफ्तारियों और जब्त किए गए वाहनों का डेटा प्रस्तुत किया। उन्होंने निगरानी के लिए 'अभय कमांड सेंटर' और सीसीटीवी सिस्टम स्थापित करने के लिए 18 से 36 महीने का समय मांगा।
NHAI का तर्क: भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने तर्क दिया कि खनन रोकना राज्य के विभागों का काम है और उनकी भूमिका केवल सड़क रखरखाव तक सीमित है।
Amicus Curiae और CEC: उन्होंने बताया कि खनन माफिया बिना नंबर प्लेट वाले वाहनों का उपयोग कर रहे हैं, जिससे उन्हें ट्रैक करना असंभव हो जाता है। साथ ही, नदी में कचरा फेंकने से जलीय जीवों का दम घुट रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक दिशा-निर्देश (Operative Directions)
न्यायालय ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए हैं:
राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश को आदेश दिया गया है कि वे वन रक्षकों और फ्रंटलाइन स्टाफ के सभी रिक्त पदों को एक वर्ष के भीतर भरें।
संवेदनशील क्षेत्रों और पुलों पर उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाले नाइट विजन सीसीटीवी कैमरे 6 महीने के भीतर लगाए जाएं।
पुलिस को निर्देश दिया गया है कि वे केवल वाहन चालकों को नहीं, बल्कि खनन नेटवर्क के किंगपिन, फाइनेंसरों और ठेकेदारों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और खनन अधिनियम के तहत मुकदमा चलाएं।
NHAI को निर्देश दिया गया कि वे NH-44 पुल के 1 किमी ऊपर और 500 मीटर नीचे के क्षेत्र की चौबीसों घंटे निगरानी करें और पुल से कचरा फेंकना रोकने के लिए जालीदार सुरक्षा दीवार लगाएं।
वन्यजीव संस्थान (WII) और जल शक्ति मंत्रालय को चंबल नदी के जल स्तर को बनाए रखने के लिए बेसिन-स्तरीय मूल्यांकन करने का आदेश दिया गया है।
कानूनी पहलू (Legal Aspects)
अदालत ने याद दिलाया कि अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के साथ-साथ अनुच्छेद 48A और 51A(g) के तहत पर्यावरण की रक्षा करना राज्य का संवैधानिक कर्तव्य है। मोटर वाहन अधिनियम और खनन कानूनों के उल्लंघन पर कड़े दंड और वाहनों की जब्ती का प्रावधान लागू करने को कहा गया है।
संबंधित स्थान और संस्थान
स्थान: मुरैना-धौलपुर बॉर्डर (NH-44), करौली, कोटा, बूंदी, भिंड और श्योपुर।
संस्थान: Wildlife Institute of India (WII), Central Water Commission, और Conservation Action Trust (NGO)।
अगली सुनवाई: मामले की अगली समीक्षा 22 जुलाई, 2026 को होगी।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने पारिस्थितिक विनाश और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को होने वाले नुकसान पर गहरी चिंता व्यक्त की है।

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