नई दिल्ली, 9 मई 2026: बेनामी संपत्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट ने Prohibition of Benami Property Transactions Act, 1988 के तहत ऐतिहासिक फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद कोई भी ड्राइवर, माली या इस प्रकार का चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, अपने करोड़पति मलिक को किसी भी प्रकार की संपत्ति वसीयत अथवा दान के माध्यम से नहीं दे सकेगा। यदि वह ऐसा करता है तो वह सारी संपत्ति सरकारी हो जाएगी।
Employee Cannot Transfer Property to Employer Through Will or Gift
कहानी की शुरुआत तब हुई जब डी.ए. श्रीनिवास (प्रतिवादी) बेंगलुरु ग्रामीण जिले में कृषि भूमि खरीदना चाहता था। हालांकि, 'कर्नाटक भूमि सुधार अधिनियम' (Sections 79A और 79B) के तहत वह स्वयं कृषि भूमि खरीदने के लिए पात्र नहीं था। इस कानूनी बाधा को पार करने के लिए, उसने अपने पिता की कंपनी के एक वफादार कर्मचारी, के. रघुनाथ को "नाम-उधारकर्ता" (Name-lender) के रूप में इस्तेमाल किया। संपत्तियां रघुनाथ के नाम पर खरीदी गईं, लेकिन कथित तौर पर पैसा श्रीनिवास ने दिया था।
वसीयत का विवाद और रघुनाथ की हत्या
के. रघुनाथ ने पहले 2016 में एक पंजीकृत वसीयत के माध्यम से अपनी संपत्ति अपनी पत्नी मंजुला (अपीलकर्ता) के नाम की थी। हालांकि, श्रीनिवास ने दावा किया कि 20 अप्रैल 2018 को रघुनाथ ने एक नई पंजीकृत वसीयत बनाई, जिसमें उन सभी संपत्तियों को श्रीनिवास के नाम कर दिया गया। कहानी में एक बड़ा मोड़ तब आया जब 4 मई 2019 को रघुनाथ की मृत्यु हो गई। रघुनाथ के परिवार ने आरोप लगाया कि श्रीनिवास ने एक साजिश के तहत रघुनाथ की हत्या कर दी, जिसके लिए उसके विरुद्ध आपराधिक मामला (CBI जांच) दर्ज किया गया और उसे गिरफ्तार भी किया गया।
रघुनाथ की मृत्यु के बाद, श्रीनिवास ने 2018 की वसीयत के आधार पर संपत्तियों के स्वामित्व का दावा करते हुए मुकदमा दायर किया।
ट्रायल कोर्ट: रघुनाथ की पत्नी मंजुला और परिवार ने इस मुकदमे को चुनौती दी। ट्रायल कोर्ट ने माना कि यह एक "बेनामी लेनदेन" था और वसीयत संदिग्ध थी, इसलिए उसने श्रीनिवास के दावे को खारिज कर दिया।
हाई कोर्ट: श्रीनिवास ने अपील की और कर्नाटक उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मामले को मेरिट के आधार पर सुनने का निर्देश दिया।
उच्चतम न्यायालय का अंतिम निर्णय (2026):
मंजुला और अन्य वारिसों ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उच्चतम न्यायालय ने मामले की गहराई से जांच की और निम्नलिखित महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले:
न्यायालय ने कहा कि श्रीनिवास ने कानून (Land Reforms Act) को धोखा देने के लिए रघुनाथ का नाम इस्तेमाल किया था, जो स्पष्ट रूप से एक बेनामी लेनदेन है।
श्रीनिवास ने तर्क दिया कि रघुनाथ एक कर्मचारी था और यह लेनदेन "विश्वास के संबंध" (Fiduciary Capacity) के तहत था। न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए कहा कि नियोक्ता-कर्मचारी का सामान्य संबंध बेनामी अधिनियम के अपवाद में नहीं आता।
न्यायालय ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 25 का हवाला देते हुए कहा कि जो व्यक्ति हत्या का आरोपी है, वह मृतक की संपत्ति का वारिस नहीं हो सकता, चाहे वह वसीयत के माध्यम से ही क्यों न हो।
न्यायालय ने टिप्पणी की कि श्रीनिवास ने बेनामी लेनदेन को छिपाने के लिए "वसीयत" का सहारा लेकर मुकदमे की चतुराईपूर्ण ड्राफ्टिंग (Clever Drafting) की थी।
कहानी का अंत (Twist Ending)
सुप्रीम कोर्ट ने न केवल श्रीनिवास के दावे को खारिज किया, बल्कि यह भी कहा कि चूंकि संपत्ति बेनामी तरीके से खरीदी गई थी, इसलिए इस पर न तो श्रीनिवास का हक है और न ही रघुनाथ के वारिसों का। न्यायालय ने विवादित संपत्तियों को भारत सरकार द्वारा जब्त (Confiscate) करने का आदेश दिया और केंद्र सरकार को आठ सप्ताह के भीतर एक प्रशासक नियुक्त करने का निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने मंजुला और अन्य बनाम डी.ए. श्रीनिवास (2026) मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि कानून को धोखा देने के उद्देश्य से किए गए लेनदेन को किसी भी स्थिति में मान्यता नहीं दी जा सकती।

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