नई दिल्ली, 3 अप्रैल 2026: पश्चिम एशिया में जो कुछ भी हो रहा है, भारत देश में कहीं भी शामिल नहीं है लेकिन इसका असर भारत पर दिखाई देने लगा है। बाजार में ₹200 वाली शाकाहारी खाने की थाली 350 रुपए की हो गई है। सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए रणनीति बनाना शुरू कर दिया है। इस आधार पर उम्मीद की जा रही है कि आने वाले दिनों में, फिक्स डिपॉजिट पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी हो जाएगी। ताकि लोगों को महंगाई की जाल में फंसने से बचाया जा सके।
Bank FD Rates May Rise Soon as RBI Begins Tightening Measures
वैश्विक अर्थव्यवस्था में मची उथल-पुथल के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भारतीय रुपये की गिरती साख को बचाने के लिए कड़े कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। दुनियाभर में महंगाई आसमान छू रही है और शेयर बाजारों में भारी गिरावट देखी जा रही है। इस संकट के बीच भारतीय रुपया, एशियाई मुद्राओं में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन गया है, जिसके जवाब में RBI ने अपना 'क्राइसिस प्लेबुक' 2026 लागू कर दिया है।
बैंकों को लगभग 30 अरब डॉलर के ट्रेड खत्म करने पड़े
रुपये की गिरावट को रोकने के लिए RBI ने बैंकों की नेट ओपन रुपया पोजीशन को घटाकर महज 100 मिलियन डॉलर तक सीमित कर दिया है, जबकि पहले बैंकों को अपनी पूंजी का 25% तक पोजीशन रखने की अनुमति थी। इसके अलावा, RBI ने बैंकों को 'नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड्स' (NDF) ऑफर करने से भी रोक दिया है। इन फैसलों का मुख्य उद्देश्य रुपये की वैल्यू के साथ होने वाली सट्टेबाजी (Arbitrage trades) को खत्म करना है। इस कदम की वजह से बैंकों को लगभग 30 अरब डॉलर के ट्रेड खत्म करने पड़े हैं।
इतिहास की पुनरावृत्ति: 2013 और 1997 के सबक
मौजूदा हालात ने 2013 के 'टेपर टेंट्रम' और 1997 के एशियाई वित्तीय संकट की यादें ताजा कर दी हैं। 2013 के काल में भारत को दुनिया की पांच सबसे कमजोर अर्थव्यवस्थाओं (Fragile Five) में गिना जाता था। तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन ने FCNR(B) स्वैप विंडो के जरिए महज 3 महीने में 26 अरब डॉलर जुटाए थे और सोने के आयात पर '80:20' का सख्त नियम लागू किया था। उस दौरान महंगाई से लड़ने के लिए रेपो रेट को बढ़ाकर 8% तक ले जाया गया था। यहां उल्लेख करना जरूरी है कि रेपो रेट के बढ़ने का मतलब होता है बैंक में फिक्स डिपाजिट की ब्याज दरों में वृद्धि हो जाना। इसके कारण लोग बैंकों में पैसा जमा कर देते हैं और खर्च कम कर देते हैं। इसके कारण जमाखोरी और मुनाफाखोरी करने वालों की कमर टूट जाती है और महंगाई कंट्रोल में आ जाती है।
1997 में एशियाई संकट के उस दौर में तत्कालीन गवर्नर बिमल जालान ने सूझबूझ का परिचय देते हुए रुपये को धीरे-धीरे 18% तक एडजस्ट होने दिया और 'रेशर्जेंट इंडिया बॉन्ड्स' (RIB) के जरिए अनिवासी भारतीयों (NRI) से 4 अरब डॉलर जुटाए थे।
2026 में भारत क्या करेगा
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान संकट अधिक गहरा है क्योंकि भविष्य को लेकर भारी अनिश्चितता बनी हुई है। RBI फिलहाल अपनी पुरानी रणनीतियों (मौद्रिक सख्ती, कैपिटल कंट्रोल और लिक्विडिटी मैनेजमेंट) का सहारा ले रहा है। इतिहास गवाह है कि भारत ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार और सख्त नियमों के दम पर हर संकट का सामना किया है। अब पूरी दुनिया के विशेषज्ञों की की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि RBI के ये ताजा पैंतरे रुपये को कितनी जल्दी स्थिरता प्रदान कर पाते हैं।

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