यह दुस्साहस तो अंग्रेजों ने और स्वातंत्र्योत्तर भारत ने भी कभी नहीं किया था - Editorial

Updesh Awasthee
पहले उन्होंने मौर्य साम्राज्य के बाद के उस समय को इतिहास में डार्क एज कहा जब भारत में कोई केंद्रीकृत सत्ता नहीं थी। फिर पता चला कि उस तथाकथित डार्क एज में भारत का विदेशी व्यापार जबर्दस्त बढ़ा था और वह भारत की आर्थिक समृद्धि का युग था। फिर उन्होंने अठारहवीं सदी को डार्क एज कहा- अंग्रेजों के आने से पहले के भारत को। तब धर्मपाल जी ने अपनी पुस्तकों साइंस एंड टेक्नोलॉजी इन 18th सेंचुरी इंडिया और द ब्यूटीफुल ट्री और अंग्रेजों के पहले का भारत जैसे अनेक शोध ग्रंथ लिखकर यह प्रमेय भी ध्वस्त कर दिया। तो अब भाई लोग वैदिक-औपनिषदिक युग को ही डार्क एज कहने पर उतर आये। यह दुस्साहस तो अंग्रेजों ने और स्वातंत्र्योत्तर भारत ने भी कभी नहीं किया था। 

और यह डार्क एज कहने वाली ऐतिहासिक दृष्टि इतिहासविज्ञान में कब की खारिज हो चुकी। आधुनिक इतिहासकारों (खासकर मध्यकालीन इतिहास के विशेषज्ञों) द्वारा किसी काल को “डार्क एज” या “अंधकार युग” कहना अमान्य, पुराना, गुमराह करने वाला या समस्या-पूर्ण माना जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि यह शब्द मूल रूप से एक मूल्य-निर्णय (value judgment) है, जो उस युग को बौद्धिक, सांस्कृतिक या नैतिक रूप से “तममय ” (अज्ञान, बर्बरता, ठहराव) बताता है। स्रोतों की कमी का मतलब सांस्कृतिक अंधकार नहीं होता। 

इतिहासकार जॉन एलेज लिखते हैं: 
“If you ever… really wanted a historian to scream in your face, you could do worse than this: use the phrase ‘dark ages’. Honestly, it works every time. It’s not just that the term implies a value judgement: it literally is one.”

Going Medieval ब्लॉग के इतिहासकार कहते हैं 
“There’s no such thing as the ‘Dark Ages’, but OK… We can thank the Enlightenment historiography for the expansion of the idea that the medieval period was a bad dark time. Kant and Voltaire in particular were very fond of the idea…”

इतिहासकार मैथ्यू गैब्रिएल और डेविड एम. पेरी (पुस्तक The Bright Ages: A New History of Medieval Europe, 2021) TIME मैगज़ीन में Dark Ages को एक मिथक बताते हैं जो आधुनिक पक्षपात को अतीत पर थोपता है। (TIME, दिसंबर 2021)

क्या कारण है कि चीनी historiography में कोई डार्क एज नहीं। न जापानी में।न कोरियाई में। 
यह रिनैसंस के दंभ ने बल दिया कि यूरोप में उसके पहले के नौ सौ वर्ष डार्क एज थे। 

एक ‘स्व’ के प्रति सजग भारत औपनिवेशिक अवधि को डार्क एज कहता तो वह फिर भी समझ आता। वह अवधि जब भारत में बार बार अकाल पड़े। वह अवधि जब भारत का विश्व व्यापार में हिस्सा एक चौथाई से घटकर एक प्रतिशत रह गया। वह अवधि जब हमारे विकेंद्रित ग्राम स्कूलों का नाश हो गया और वह ब्यूटीफुल ट्री सूख गया। 

ऐसा पाठ्यक्रम बनाएँगे जो इन्हीं की शिक्षा नीति के विपरीत हो और फिर भारतीय ज्ञान परंपरा पर महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भाषण भी करवाएँगे। 
क्या अँधेरा है कि एक हाथ को नहीं सूझता कि दूसरा हाथ क्या कर रहा है। 
लेखक श्री मनोज श्रीवास्तव, भारतीय प्रशासनिक सेवा के रिटायर्ड अधिकारी हैं। 
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