भोपाल, 19 मार्च 2026 : हर रोज कई यात्रियों की जूलरी चोरी हो जाती है। कुछ यात्रियों के चोरी गए आभूषणों का मूल्य 20 लाख से अधिक भी होता है। GRP थाने में मामला दर्ज करवाने में पूरा दिन लग जाता है। लेकिन दूसरा सीन देखिए। मात्र 15 लाख में खरीदा गया डंपर, जो पुराना भी हो गया था, चोरी हो गया तो GRP BHOPAL द्वारा 24 घंटे से पहले ढूंढ लिया गया। मतलब मामला दर्ज करने से लेकर, CCTV वीडियो देखने, मुखबिर तंत्र एक्टिव करने और चोर का पता लगाकर डंपर जप्त करने एवं चोर को गिरफ्तार करके कोर्ट में पेश करने तक, सारा काम 24 घंटे से पहले हो गया। क्योंकि चोरी गया डंपर समदड़िया ग्रुप के लिए काम कर रहा था।
पश्चिम मध्य रेलवे के जनसंपर्क अधिकारी ने खुद यह कहानी बताई है। दिनांक 15 मार्च की मध्यरात्रि को फरियादी मिराज खान (निवासी करोंद, भोपाल) द्वारा रेलवे परिक्षेत्र स्थित पश्चिम रेलवे कॉलोनी के निर्माणाधीन समदड़िया ग्रुप की साइट से डम्पर ट्रक चोरी होने की सूचना थाना जीआरपी भोपाल में दी गई। सूचना मिलते ही GRP के अधिकारी टॉप टू बॉटम एक्टिव हो गए। पुलिस अधीक्षक रेलवे भोपाल श्री राहुल कुमार लोढ़ा के मार्गदर्शन तथा अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक श्रीमती नीतू डावर एवं उप पुलिस अधीक्षक श्री रामस्नेही चौहान के निर्देशन में थाना प्रभारी निरीक्षक जहीर खान के नेतृत्व में टीम गठित की गई। फील्ड में इंस्पेक्टर जहीर खान, उपनिरीक्षक मिथलेश भारद्वाज, प्रधान आरक्षक राजेश शर्मा, आरक्षक अनिल सिंह, सचिन जाट एवं बृजेश कारपेंटर को तैनात किया गया।
टीम ने सीसीटीवी फुटेज खंगाले एवं मुखबिर तंत्र सक्रिय किया। जांच के दौरान यहां तक पता कर लिया कि नाबालिग बालक एक दिन पूर्व साइट पर काम मांगने गया था। उम्र कम होने के कारण उसे काम नहीं मिला। पूर्व में ट्रक चालकों के साथ रहकर वाहन चलाना सीख चुका बालक, मौके पर खड़े डम्पर में चाबी लगी देखकर उसे लेकर फरार हो गया।
प्राप्त सूचना के आधार पर जे.पी. नगर, कार्बाइड फैक्ट्री क्षेत्र से ट्रक को बरामद किया गया, जहां नाबालिग बालक ट्रक में ही सोता मिला। चोरी गया डम्पर ट्रक जप्त की कुल अनुमानित कीमत: ₹15 लाख थी नाबालिग को अभिरक्षा में लेकर काउंसलिंग की गई। प्रकरण किशोर न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।
Open Story: How GRP Bhopal Works Behind the Scenes for High-Profile VIPs
देख रहे हो विनोद, जो जीआरपी आम यात्री का मामला दर्ज करने में 24 घंटे से ज्यादा का समय लगा देती है। उसी जीआरपी ने 24 घंटे से कम समय में केस सॉल्व कर दिया। यदि यह डंपर केवल मिराज खान का होता। समदड़िया ग्रुप से उसका कोई कनेक्शन ना होता तो, शुरुआत के 3-4 घंटे तो उसे इस बात पर जलील किया जाता कि वह डंपर में चाबी छोड़कर क्यों गया। फिर उससे डंपर के डॉक्यूमेंट मांगे जाते। उसको साबित करना होता कि वही डंपर का मालिक है। फिर रजिस्ट्रेशन और बीमा के डॉक्यूमेंट मांगे जाते। हो सकता है यह भी पूछ लेते की नंबर खरीदने के लिए 15 लाख कहां से आए। आय के स्रोतों के बारे में बताइए।
बात यह नहीं है कि आम आदमी और वीआईपी में अंतर किया जा रहा है, बात इसके एक कदम आगे बढ़ गई है। अब वीआईपी की सेवा करने के बाद ढिंढोरा पीटा जाता है। और गर्व पूर्वक इसको अपनी सफलता बताया जाता है। पश्चिम मध्य रेलवे की जनसंपर्क अधिकारी ने सभी मीडिया वालों को यह स्टोरी भेजी है और इस तरह से लिखा है जैसे हाई प्रोफाइल लोगों की सेवा करके GRP ने बड़ा महान काम किया है।

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