जबलपुर, 31 मार्च 2026: सरकार और प्राइवेट कंपनियां, नौकरी के लिए अप्लाई करने वाले अभ्यर्थियों के साथ इसलिए अन्य कर लेती हैं क्योंकि उन्हें मालूम है, छोटी सी नौकरी के लिए एड़ियां घिसने वाला, कोर्ट कचहरी की लड़ाई क्या लड़ पाएगा। जिसके पास परीक्षा एजेंसी को देने के लिए फीस नहीं होती, वह हाई कोर्ट के महंगे वकीलों की फीस क्या दे पाएगा। लेकिन सिपाही भर्ती के एक अभ्यर्थी ने हाई कोर्ट में अपना कैसे खुद लड़ा और सरकार के धुरंधर वकीलों को धूल चटकार नौकरी जीत ली।
नीलेश पाठक बनाम भारत संघ मामले की पृष्ठभूमि और पूरी कहानी
नीलेश पाठक (याचिकाकर्ता) ने सेना में सिपाही (GD) के पद के लिए आवेदन किया था। उनके पिता सेना के 'गार्ड्स रेजिमेंट' से हवलदार के पद से सेवानिवृत्त हुए थे और उन्हें मानद नायब सूबेदार का रैंक मिला था। भर्ती प्रक्रिया के दौरान नीलेश को आंखों की जांच में 'अनफिट' घोषित कर दिया गया, लेकिन सेना के अधिकारियों ने उन्हें सिपाही (ट्रेड्समैन) पद के लिए अपना आवेदन बदलने की अनुमति दे दी।
नीलेश के पास NCC 'C' सर्टिफिकेट भी था। उन्होंने 29 नवंबर 2015 को परीक्षा दी और 14 दिसंबर 2015 को घोषित परिणाम में उन्होंने योग्यता सूची में तीसरा सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया, लेकिन 'इंस्टेंट भर्ती' के एक मामले को शीर्ष पर रखे जाने के कारण उनका स्थान चौथे नंबर पर खिसक गया और उन्हें नामांकन (enrollment) नहीं दिया गया।
सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) जबलपुर ने पहले याचिकाकर्ता के पक्ष में आदेश दिया था, लेकिन बाद में निष्पादन आवेदन (enforcement application) की सुनवाई के दौरान 8 नवंबर 2023 को एक शर्त रख दी। शर्त यह थी कि नीलेश को अपने पिता का एक हलफनामा (affidavit) देना होगा कि उनके किसी अन्य पुत्र या भाई ने 'रिलेशनशिप सर्टिफिकेट' के आधार पर UHQ (यूनिट हेडक्वार्टर) कोटा के तहत सेना में लाभ नहीं लिया है। चूंकि नीलेश का भाई पहले ही इस कोटे से भर्ती हो चुका था, इसलिए यह शर्त पूरी करना उनके लिए असंभव था। पूर्व में उच्च न्यायालय ने भी इस आधार पर उनकी याचिका खारिज कर दी थी कि बोनस अंक केवल एक बेटे को मिलते हैं। इसी आदेश के विरुद्ध यह समीक्षा याचिका (Review Petition (RP No. 954/2025)) दायर की गई थी।
याचिकाकर्ता (नीलेश पाठक - स्वयं उपस्थित):
उन्होंने तर्क दिया कि वह सेना से कोई बोनस अंक नहीं मांग रहे थे, बल्कि वह अपने NCC 'C' सर्टिफिकेट के आधार पर लाभ मांग रहे थे। UHQ कोटे के तहत बच्चों की संख्या पर कोई पाबंदी नहीं है, पाबंदी केवल 'बोनस अंकों' के लाभ पर है। उन्होंने चंडीगढ़ AFT के एक फैसले का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि दूसरा बेटा भी UHQ कोटे का लाभ ले सकता है, बशर्ते वह बोनस अंक न मांगे।
प्रतिवादी (भारत संघ और अन्य - श्री सुयश मोहन गुरु और श्री ईशान सोनी):
प्रारंभ में सेना ने हलफनामे की अनिवार्यता पर जोर दिया। बाद में, प्रतिवादी के वकील ने स्वीकार किया कि चंडीगढ़ AFT का फैसला उन पर बाध्यकारी है। सेना ने यह तर्क भी दिया कि अब 'अग्निपथ योजना' लागू हो चुकी है और याचिकाकर्ता की उम्र 28 वर्ष हो चुकी है, जो अग्निवीर के लिए निर्धारित सीमा से अधिक है। साथ ही, अब नियमित भर्तियों के लिए कोई प्रशिक्षण बैच नहीं चल रहे हैं, इसलिए उन्हें प्रशिक्षण देना कठिन होगा।
न्यायाधीश की विशेष टिप्पणी
न्यायालय ने पाया कि पिछली बार याचिका खारिज करते समय तथ्यों को समझने में चूक (mistake of fact) हुई थी। न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि: यह सिद्धांत स्थापित है कि समान शक्ति वाली पीठ को अपने से पहले वाली पीठ के निर्णय (Ratio decidendi) का पालन करना चाहिए। याचिकाकर्ता का अधिकार नियमित भर्ती के तहत तब बना था जब 'अग्निपथ योजना' अस्तित्व में नहीं थी, इसलिए सेना उसे इस नई योजना के आधार पर लाभ देने से मना नहीं कर सकती।
Constable Recruitment Candidate Fights Own Case in High Court, Wins Job
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने समीक्षा याचिका स्वीकार करते हुए निम्नलिखित आदेश दिए:
जबलपुर AFT के 8 नवंबर 2023 के आदेश और उच्च न्यायालय के 5 मई 2025 के आदेश को रद्द (set aside) कर दिया गया।
याचिकाकर्ता को बिना पिता के हलफनामे के रिपोर्ट करने की अनुमति दी गई।
उन्हें नियमित सिपाही (ट्रेड्समैन) के रूप में नियुक्त करने का आदेश दिया गया, न कि अग्निवीर के रूप में।
उन्हें अग्निवीर बैचों के साथ प्रशिक्षण दिया जाएगा, लेकिन उनकी वरिष्ठता (seniority) उनके मूल बैच के साथियों के साथ ही मानी जाएगी।
नियुक्ति से पहले उन्हें नियमों के अनुसार मेडिकल टेस्ट पास करना होगा।
न्यायालय: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर। न्यायाधीश: माननीय न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल एवं माननीय न्यायमूर्ति विवेक जैन।

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