संदेह कितना भी गहरा हो, वह ठोस सबूत की जगह नहीं ले सकता, HIGH COURT ने कहा

Updesh Awasthee
जबलपुर, 1 फरवरी 2026
: अक्सर छोटी-मोटी लापरवाही कोर्ट में कैसे को कमजोर कर देती है। छतरपुर के वसीम सुसाइड केस में ऐसा ही कुछ हुआ है। कुछ लापरवाही वसीम के परिवारों की थी और शायद कुछ पुलिस ने की, नतीजा सुसाइड नोट होने के बाद भी आरोपियों को सजा नहीं हुई। पहले निचली अदालत ने और फिर हाई कोर्ट ने भी उनको बरी कर दिया। 

वसीम ने अपनी बेगम के घर में सुसाइड किया था

यह कहानी सन 2008 से शुरू होती है। छतरपुर के रहने वाले वसीम की शादी शाहीन से हुई थी। शादी के बाद से ही विवाद की स्थिति बन गई। वसीम और उसके परिवार का कहना था कि शाहीन के मायके वाले उसको अपने साथ ले जाते हैं और फिर वापस नहीं आने देते। यहां तक की वसीम से मिलने भी नहीं देते। शाहीन बेगम ने वसीम के खिलाफ मेंटेनेंस की पिटीशन फाइल कर दी थी। दोनों के बीच कानूनी लड़ाई शुरू हो गई थी। दिनांक 14 अक्टूबर 2010 को वसीम ने अपनी ससुराल में जहरीले पदार्थ का सेवन करके आत्महत्या कर ली। स्थिति स्पष्ट थी, वैवाहिक तनाव के कारण वसीम ने आत्महत्या की है। 

सबसे बड़ी गलती

पुलिस इन्वेस्टिगेशन के बाद जब मामला न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत हुआ तो पाया गया कि, वसीम ने एक सुसाइड नोट लिखा था जिसमें उसने अपनी सास, ससुर और साले को प्रताड़ना के लिए दोषी बताया था लेकिन इस सुसाइड नोट का महत्व कम हो गया क्योंकि वसीम की मृत्यु 14 अक्टूबर 2010 को हुई थी और पुलिस ने लगभग ढाई महीने बाद यह सुसाइड नोट 28 दिसंबर 2010 को जप्त किया। कोर्ट में एक वार्ड बॉय ने गवाही दी कि उसने वसीम के कपड़ों में से ही यह सुसाइड नोट प्राप्त किया था लेकिन उसने डॉक्टर या पुलिस को सुसाइड नोट नहीं दिया। बाद में वसीम के पिता को दे दिया था। 

न्यायालय ने इसको अप्राकृतिक आचरण माना। सुसाइड नोट के डाउटफुल हो जाने के कारण, डॉक्यूमेंट की वैल्यू खत्म हो गई। इसके अलावा सुसाइड नोट की भाषा से स्पष्ट नहीं होता था कि वह आरोपियों द्वारा प्रताड़ित किए जाने के कारण आत्महत्या के लिए मजबूर हो गया है। गवाहों के बयानों में भी भारी विरोधाभास और विसंगति पाई गई। 

IPC की धारा 306 और 107 की व्याख्या 

हाई कोर्ट ऑफ़ मध्य प्रदेश के विद्वान न्यायमूर्ति श्री राजेंद्र कुमार वाणी ने IPC की धारा 306 और 107 की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि के लिए केवल 'प्रताड़ना' पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं पर जोर दिया:
1. आपराधिक मंशा (Mens Rea): आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में आरोपी की प्रत्यक्ष मंशा होनी चाहिए कि मृतक आत्महत्या जैसा कदम उठाए।
2. सकारात्मक कार्य: अभियुक्त का कोई ऐसा सकारात्मक कार्य होना चाहिए जो मृतक को उस स्थिति में धकेल दे जहाँ आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प न बचे।
3. संदेह बनाम प्रमाण: सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि संदेह चाहे कितना भी गहरा हो, वह ठोस सबूत की जगह नहीं ले सकता। 

इसी के साथ हाई कोर्ट ने हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत द्वारा साक्ष्यों की सराहना में कोई अवैधता या विकृति नहीं है। अदालत ने माना कि यदि साक्ष्यों के आधार पर दो विचार संभव हों, तो आरोपी के पक्ष में जाने वाले विचार को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इन्ही आधारों पर, राज्य की अपील को योग्यता की कमी के कारण खारिज कर दिया गया और आरोपियों के बरी होने के फैसले को सही ठहराया गया। 

पुलिस और वकीलों के लिए निष्कर्ष

यह मामला पुलिस और वकीलों के लिए एक केस स्टडी है। पुलिस की इन्वेस्टीगेशन में यदि कमजोरी रह गई तो इसका सीधा लाभ आरोपियों को मिलता है और ट्रायल कोर्ट में यदि वकील कमजोर पड़ गया तो पूरा कैसे हाथ से निकल जाता है। फिर हाई कोर्ट में अपील करने से भी कोई लाभ नहीं होता। 
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