Supreme Court का छात्राओं के हक में 127 पेज का ऐतिहासिक फैसला, Continuing Mandamus जारी

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 30 जनवरी, 2026
: सुप्रीम कोर्ट में आज एक ऐतिहासिक फैसला दिया है। इसके कारण भारत की संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव होगा। सभी सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में छात्राओं के लिए विशेष इंतजाम करने होंगे। नहीं करने पर सरकारी स्कूल में प्राचार्य के खिलाफ कार्रवाई होगी और प्राइवेट स्कूल की मान्यता रद्द कर दी जाएगी। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि एक छात्रा की शिक्षा उसके मासिक धर्म के कारण बाधित नहीं होनी चाहिए। 

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. जया ठाकुर की जनहित याचिका

यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. जया ठाकुर द्वारा दायर एक जनहित याचिका (Writ Petition (C) No. 1000 of 2022) से शुरू हुआ। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में मांग की गई थी कि सरकार कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को मुफ्त सेनेटरी पैड प्रदान करे, सभी सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय सुनिश्चित करे और मासिक धर्म से जुड़ी वर्जनाओं को खत्म करने के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाए। न्यायालय ने पाया कि मासिक धर्म स्वच्छता की कमी के कारण छात्राएं स्कूल से अनुपस्थित रहती हैं या पूरी तरह से पढ़ाई छोड़ देती हैं। 

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया, योजना चालू है

केंद्र सरकार ने स्वीकार किया कि मासिक धर्म को लेकर समाज में वर्जनाएं और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिबंध मौजूद हैं। उन्होंने 'स्कूली छात्राओं के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति' (Menstrual Hygiene Policy) पेश की और जन औषधि केंद्रों के माध्यम से 1 रुपये में बायोडेग्रेडेबल पैड देने जैसी योजनाओं का उल्लेख किया।

आंध्र प्रदेश, बिहार, और केरल जैसे राज्यों ने अपनी योजनाओं (जैसे मुफ्त पैड वितरण और शौचालय निर्माण) का विवरण दिया। हालांकि, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, कर्नाटक और हरियाणा जैसे कई राज्यों ने अपना हलफनामा दाखिल नहीं किया था, जिस पर न्यायालय ने नाराजगी जताई। 

न्यायालय की विशिष्ट टिप्पणियाँ 

न्यायालय ने अपने 127 पन्नों के फैसले की शुरुआत इस शक्तिशाली संदेश के साथ की: “मासिक धर्म (Period) एक वाक्य को समाप्त करना चाहिए, किसी लड़की की शिक्षा को नहीं”। अदालत की अन्य प्रमुख टिप्पणियाँ निम्नलिखित हैं:
1. शिक्षा एक 'मल्टीप्लायर राइट' है: यह अन्य मानवाधिकारों के उपयोग का द्वार खोलती है।
2. मासिक धर्म स्वास्थ्य अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीने के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।
3. स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी छात्राओं को उनकी शिक्षा और अवसरों से वंचित करती है, जो अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन है।
4. न्यायालय ने जोर देकर कहा कि मासिक धर्म केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं है; पुरुष शिक्षकों और छात्रों को भी संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है ताकि स्कूल का वातावरण डरावना न हो।

Continuing Mandamus

न्यायालय ने 'कंटीन्यूइंग मैंडमस' (Continuing Mandamus) जारी करते हुए केंद्र और राज्यों को निम्नलिखित निर्देश दिए हैं, जिन्हें 3 महीने के भीतर लागू करना अनिवार्य है:
सभी शहरी और ग्रामीण स्कूलों में पानी की सुविधा के साथ छात्राओं के लिए अलग और कार्यात्मक शौचालय सुनिश्चित किए जाएं। ये शौचालय दिव्यांग बच्चों के लिए भी सुलभ होने चाहिए।
कक्षा 6 से 12 की छात्राओं को स्कूलों में मुफ्त ऑक्सो-बायोडेग्रेडेबल सेनेटरी नैपकिन प्रदान किए जाएं। स्कूलों में 'MHM कॉर्नर' बनाए जाएं जहाँ आपात स्थिति के लिए अतिरिक्त वर्दी और अंडरवियर उपलब्ध हों।
सेनेटरी कचरे के सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल निपटान के लिए इंसिनरेटर या कचरा पात्रों की व्यवस्था की जाए।
NCERT और SCERT को मासिक धर्म और किशोरावस्था से जुड़े विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल करने का निर्देश दिया गया है। पुरुष और महिला दोनों शिक्षकों को इस विषय पर संवेदनशील बनाया जाए।
जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) साल में एक बार निरीक्षण करेंगे और छात्राओं से गोपनीय फीडबैक लेंगे।

प्राइवेट स्कूल की मान्यता रद्द कर देंगे

न्यायालय ने इस बात को स्पष्ट किया कि निजी स्कूल भी इन मानदंडों से बंधे हैं। यदि कोई स्कूल RTE अधिनियम की धारा 19 के तहत इन सुविधाओं को प्रदान नहीं करता है, तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है। NCPCR (राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग) को इन निर्देशों के कार्यान्वयन की निगरानी करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। न्यायालय इस मामले की अगली सुनवाई तीन महीने बाद अनुपालन रिपोर्ट के साथ करेगा।
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