Criminal मामलों में राहत पाने के लिए रिट अपील नहीं लगा सकते, हाईकोर्ट का फैसला

Updesh Awasthee
ग्वालियर ब्यूरो, 30 जनवरी 2026
: हाई कोर्ट ऑफ़ मध्य प्रदेश की ग्वालियर बेंच ने 'इंट्रा-कोर्ट अपील' (रिट अपील) मामले में लैंडमार्क जजमेंट दिया है। यह अपील संजय सिंह जादौन द्वारा की गई थी जिनके खिलाफ पुलिस द्वारा धोखाधड़ी के एक मामले में जांच की जा रही है। 

जादौन का आरोप, पुलिस परेशान करने के लिए जांच को लंबा खींच रही है

यह विवाद तब शुरू हुआ जब संजय सिंह जादौन ने एक रिट याचिका (W.P. No. 49073/2025) दायर की थी। उनकी मुख्य मांग यह थी कि पुलिस उनके खिलाफ 'एक्सपंज रिपोर्ट' (ER) पेश करे और उनके विरुद्ध चल रही जांच को रोका जाए। जादौन का तर्क था कि जांच में कोई धोखाधड़ी सामने नहीं आई है, फिर भी इसे अनिश्चित काल तक जारी रखकर उनके अधिकारों का हनन किया जा रहा है।

हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने निर्देश दे दिए थे

7 जनवरी 2026 को एकल पीठ (Single Judge) ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए पुलिस को निर्देश दिया कि वे इस मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच करें और जल्द से जल्द किसी निष्कर्ष पर पहुँचें। संजय सिंह जादौन इस आदेश से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। वे चाहते थे कि न्यायालय जांच पूरी करने के लिए एक निश्चित समय सीमा (Time Limit) तय करे। इसी मांग को लेकर उन्होंने न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत की युगल पीठ के समक्ष यह रिट अपील दायर की। 

वकीलों के तर्क:

• अपीलकर्ता संजय सिंह जादौन के अधिवक्ता श्री एम.पी.एस. रघुवंशी और श्री मोहम्मद आमिर खान ने पक्ष रखा। उन्होंने तर्क दिया कि जांच की प्रक्रिया को समयबद्ध किया जाना चाहिए ताकि उनके मुवक्किल को राहत मिल सके।
• मध्य प्रदेश सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) श्री अंकुर मोदी ने इस अपील की वैधानिकता (Maintainability) पर कड़ा विरोध जताया। उनका तर्क था कि भले ही याचिका अनुच्छेद 226 के तहत दायर की गई थी, लेकिन इसकी प्रकृति आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 482 के समान थी। अतः, ऐसी स्थिति में उच्च न्यायालय के नियमों के अनुसार रिट अपील सुनवाई योग्य नहीं है। 

न्यायालय की विशिष्ट टिप्पणियाँ: 

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों, विशेषकर राम किशन फौजी बनाम हरियाणा राज्य (2017) का उल्लेख किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:
• किसी मामले की प्रकृति इस बात से तय नहीं होती कि उसे किस अनुच्छेद के तहत दायर किया गया है, बल्कि इस बात से तय होती है कि उसमें किस अधिकार का उल्लंघन हुआ है और क्या राहत मांगी गई है।
• यदि कोई याचिका आपराधिक क्षेत्राधिकार (Criminal Jurisdiction) का प्रयोग करते हुए तय की जाती है, तो उसके विरुद्ध उसी उच्च न्यायालय में रिट अपील दायर नहीं की जा सकती।
• न्यायालय ने यह भी दोहराया कि अनुच्छेद 226 के तहत दी गई राहत यदि आपराधिक मामले से जुड़ी है, तो वह सिविल कार्यवाही नहीं मानी जाएगी। 

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर खंडपीठ के विद्वान न्यायाधीश माननीय न्यायमूर्ति आनंद पाठक एवं माननीय न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत की युगल पीठ ने राज्य की आपत्तियों को स्वीकार करते हुए संजय सिंह जादौन की रिट अपील को सुनवाई योग्य न मानते हुए (Non-maintainable) खारिज कर दिया। हालांकि, न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि प्रतिवादी (पुलिस विभाग) एकल पीठ द्वारा पूर्व में दिए गए निष्पक्ष जांच के आदेश का पालन करें। 

न्यायालय ने अपने आदेश में 'मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (खंड न्यायपीठ को अपील) अधिनियम, 2005' की धारा 2 का हवाला दिया, जो यह स्पष्ट करता है कि केवल सिविल या मूल क्षेत्राधिकार के आदेशों के विरुद्ध ही खंडपीठ में अपील की जा सकती है, आपराधिक मामलों में नहीं। यह निर्णय भविष्य में उन याचिकाओं के लिए एक नजीर बनेगा जहाँ याचिकाकर्ता आपराधिक मामलों में राहत पाने के लिए रिट अपील का मार्ग चुनते हैं।
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