भोपाल समाचार/ बिज़नस न्यूज़ डिपार्मेंट, 5 जनवरी 2026: बैंक ऑफ बड़ौदा के आर्थिक अनुसंधान विभाग द्वारा तैयार की गई 'आरबीआई वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (जनवरी 2026)' की समीक्षा के दौरान भारत की एक नई तस्वीर सामने आई है। पहले लोग सरकारी बैंक में FD करते थे। प्राइवेट बैंक से लोन लेते थे और शेयर बाजार से दूर रहते थे। लेटेस्ट रिपोर्ट में लोग सरकारी बैंक से लोन ले रहे हैं, प्राइवेट बैंक में FD कर रहे हैं और शेयर मार्केट में इन्वेस्ट कर रहे हैं। कृपया पूरी समीक्षा पढ़िए और फिर अपने निष्कर्ष निकालिए:-
1. भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर नो टेंशन
रिपोर्ट के अनुसार, भारत के आर्थिक आधार काफी लचीले और मजबूत बने हुए हैं। वर्तमान में मुद्रास्फीति (Inflation) 1.8% और चालू खाता घाटा (CAD) 0.8% के निचले स्तर पर है, जो अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। हालांकि, देश का ऋण-जीडीपी अनुपात (Debt-to-GDP ratio) अभी भी 82% के आसपास बना हुआ है, जिसका मुख्य कारण राज्यों पर बढ़ा हुआ कर्ज है।
2. पब्लिक सरकारी बैंक से लोन और प्राइवेट बैंक में FD कर रही है
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) की ऋण वृद्धि (12.1%) निजी बैंकों (PVBs) की तुलना में अधिक रही है, जबकि जमा के मामले में निजी बैंक (10.1%) आगे हैं। इसका मतलब हुआ कि पब्लिक सरकारी बैंकों से लोन ले रही है और प्राइवेट बैंकों में FD कर रही है, क्योंकि प्राइवेट बैंक वाले, सरकारी बैंक की तुलना में ज्यादा ब्याज देते हैं। RBI की 5 लाख वाली गारंटी के बाद लोगों का प्राइवेट बैंकों पर विश्वास बढ़ने लगा है।
Asset Quality (NPA): फूड प्रोसेसिंग को लोन देना खतरनाक
बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार हुआ है। PSBs का सकल एनपीए (GNPA) गिरकर 2.5% पर आ गया है, जबकि निजी बैंकों का यह 1.7% है। व्यक्तिगत ऋण (Personal Loans) में सबसे कम एनपीए (1.1%) देखा गया है, जबकि उद्योगों में खाद्य प्रसंस्करण (4.4%) और कपड़ा क्षेत्र (3.5%) में एनपीए अधिक है।
3. कॉर्पोरेट और घरेलू क्षेत्र की स्थिति:
• कॉर्पोरेट क्षेत्र: भारतीय कंपनियों ने अपने कर्ज को कम किया है (Deleveraging), जिससे उनका ऋण-इक्विटी अनुपात घटकर 0.40 रह गया है।
• घरेलू ऋण: भारत में घरेलू ऋण जीडीपी का 41.3% है, जो अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं (जैसे थाईलैंड 88%) की तुलना में काफी कम और सुरक्षित स्तर पर है।
• बचत का बदलता स्वरूप: लोगों की वित्तीय संपत्तियों में बैंक जमा (Deposits) की हिस्सेदारी कम हो रही है (40.2% से 39.6%), जबकि इक्विटी और निवेश फंडों में लोगों की रुचि बढ़ी है।
4. भविष्य की चुनौतियां और जोखिम:
• सरकारी प्रतिभूतियां: सरकारी कागजों (G-Sec) की बढ़ती आपूर्ति और निवेशकों की घटती मांग के कारण प्रतिफल (yields) प्रभावित हो रहे हैं।
• वैश्विक प्रभाव: अमेरिकी टैरिफ (US Tariffs) जैसे वैश्विक घटनाक्रमों का असर शेयर बाजार और विशेषकर व्यापार-संवेदनशील कॉर्पोरेट ऋण वाले बैंकों पर पड़ने की संभावना जताई गई है।
• राज्यों का खर्च: राज्यों का प्रतिबद्ध खर्च (पेंशन, ब्याज, प्रशासन) उनके कुल राजस्व व्यय का लगभग 1/3 हिस्सा है, जो एक चिंता का विषय है क्योंकि यह उनके बाजार उधार को ऊंचा बनाए रखता है।
5. तनाव परीक्षण (Stress Testing):
आरबीआई के अनुमानों के अनुसार, मार्च 2027 तक 'प्रतिकूल परिदृश्यों' में भी भारतीय बैंकिंग प्रणाली का पूंजी पर्याप्तता अनुपात (CRAR) सुरक्षित स्तर (11% से ऊपर) पर बना रहेगा, जो वित्तीय तंत्र की मजबूती को दर्शाता है।
निष्कर्ष: यह रिपोर्ट दर्शाती है कि भारतीय वित्तीय प्रणाली वर्तमान में एक सुरक्षित और सुदृढ़ स्थिति में है, जहाँ बैंक और कॉर्पोरेट दोनों अपनी बैलेंस शीट को मजबूत कर रहे हैं। हालांकि, राज्यों का बढ़ता कर्ज और वैश्विक व्यापार नीतियां भविष्य के लिए सतर्क रहने का संकेत देती हैं।
इसे एक मजबूत किले के रूप में देखा जा सकता है, जिसकी दीवारें (बैंकिंग और कॉर्पोरेट सेक्टर) तो बहुत ऊँची और मजबूत हैं, लेकिन किले के बाहर के मौसम (वैश्विक बाजार और टैरिफ) और किले के भीतर के रखरखाव के बढ़ते खर्च (राज्यों का कर्ज) पर नजर रखना आवश्यक है।
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