Property की गिरवी, गारंटी और बिक्री के मामले में सुप्रीम कोर्ट का लैंडमार्क जजमेंट

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 23 जनवरी 2026
: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने संपत्ति की गिरवी और बिक्री से संबंधित एक ऐसे मामले में ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है जो पिछले 59 साल से सॉल्व नहीं हो पाया था। इस मामले को सॉल्व होने में तो 59 साल लगे लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के कारण भविष्य में इस प्रकार के मामले 59 दिन में सॉल्व हो जाएंगे। इस बात की पूरी संभावना है कि ऐसे मामले अब बहुत कम संख्या में होंगे। 

मामले की पृष्ठभूमि और पूरी कहानी

इस कहानी की शुरुआत सन 1966 से होती है, यानी आज से करीब 59 साल पहले, प्रतिवादी तुकाराम ने अपना घर बीदर में सदानंद गर्जे के पास ₹8,000 में गिरवी रखा था। उसी समय तुकाराम के भाई ने भी एक अन्य संपत्ति ₹2,000 में उसी व्यक्ति के पास गिरवी रखी थी। 5 साल बाद जब तुकाराम कर्ज चुकाने में असमर्थ रहा, तो सन 1971 में उसने अपीलकर्ता हेमलता (भारतराज की पत्नी) से संपर्क किया। 12 नवंबर 1971 को एक पंजीकृत बिक्री विलेख (Registered Sale Deed) निष्पादित किया गया, जिसमें घर को ₹10,000 में हेमलता को बेच दिया गया। इस राशि में से ₹8,000 सीधे पुराने कर्ज को चुकाने में गए और ₹2,000 नकद दिए गए। उसी दिन एक पंजीकृत किरायानामा भी तैयार किया गया, जिसके तहत तुकाराम और उसका परिवार उसी घर में किराएदार बन गए और ₹200 प्रति माह किराया देना तय हुआ। 

विवाद की शुरुआत 

14 महीने तक किराया देने के बाद तुकाराम ने भुगतान बंद कर दिया। हेमलता ने 1974 में कानूनी नोटिस भेजा, जिसका जवाब देते हुए तुकाराम ने किराया न दे पाने के लिए माफी मांगी और दिवाली तक भुगतान करने का वादा किया। जब किराया नहीं मिला, तो हेमलता ने बेदखली (Eviction) की कार्यवाही शुरू की। इसके जवाब में तुकाराम ने 1977 में एक दीवानी मुकदमा (O.S. 39/1977) दायर किया, जिसमें दावा किया गया कि बिक्री विलेख "दिखावटी" (Sham) था और वास्तव में यह केवल कर्ज के बदले सुरक्षा (Security) के रूप में किया गया था।

अदालती कार्यवाही का सफर

1986: ट्रायल कोर्ट ने तुकाराम के पक्ष में फैसला सुनाया और बिक्री विलेख को दिखावटी माना। अदालत ने कहा कि घर की कीमत अधिक थी और तुकाराम एक सीधा-सादा व्यक्ति था।
1999: प्रथम अपीलीय न्यायालय, जिला न्यायाधीश ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया और कहा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 92 के तहत लिखित दस्तावेज़ के खिलाफ मौखिक गवाही मान्य नहीं है।
2010: कर्नाटक उच्च न्यायालय ने फिर से ट्रायल कोर्ट के फैसले को बहाल कर दिया और बिक्री विलेख को अमान्य माना। इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा।

अपीलकर्ता हेमलता के वकील के तर्क:

• बिक्री विलेख की भाषा स्पष्ट और असंदिग्ध है।
• साक्ष्य अधिनियम की धारा 91 और 92 के तहत, जब कोई दस्तावेज़ लिखित और पंजीकृत हो, तो उसके खिलाफ कोई भी मौखिक साक्ष्य स्वीकार नहीं किया जा सकता।
• तुकाराम ने खुद 1974 के अपने पत्र में किराएदार होने और किराया बकाया होने की बात स्वीकार की थी।

प्रतिवादी तुकाराम के वकील के तर्क:

• बिक्री विलेख के समय घर का वास्तविक मूल्य ₹50,000 से अधिक था, जबकि इसे केवल ₹10,000 में दिखाया गया।
• घर का कब्जा कभी हेमलता को नहीं दिया गया था; तुकाराम हमेशा से वहीं रह रहा था।
• पक्षकारों की मंशा बिक्री की नहीं बल्कि केवल ऋण सुरक्षित करने की थी।
• गंगूबाई बनाम छब्बूबाई मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि यह साबित करने के लिए मौखिक गवाही दी जा सकती है कि दस्तावेज़ 'दिखावटी' था।

न्यायाधीश की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ और निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल) ने निम्नलिखित टिप्पणियां कीं:
1. न्यायालय ने कहा कि एक पंजीकृत बिक्री विलेख की वैधता और वास्तविकता की प्रबल धारणा (Presumption) होती है। पंजीकरण कोई मामूली औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक पवित्र कार्य है।
2. अदालतों को किसी पंजीकृत दस्तावेज़ को हल्के में 'दिखावटी' घोषित नहीं करना चाहिए। इसके लिए बहुत ठोस और पुख्ता सबूतों की आवश्यकता होती है।
3. : न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि केवल 'धोखाधड़ी' या 'दिखावटी' जैसे शब्दों का उपयोग करके मुकदमेबाजी शुरू करना कानून का दुरुपयोग है। वादी को स्पष्ट रूप से अपना अधिकार साबित करना चाहिए।
4. न्यायालय ने पाया कि तुकाराम कोई अनपढ़ या सीधा व्यक्ति नहीं था, वह कपड़े का व्यवसाय चलाता था और जानता था कि गिरवी रखने और बेचने में क्या अंतर है। 1974 में किराए की देनदारी स्वीकार करना उसके खिलाफ सबसे बड़ा सबूत था।

5. सशर्त बिक्री Section 58(c): न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कोई भी बिक्री तब तक 'गिरवी' नहीं मानी जा सकती जब तक कि पुनर्खरीद (Re-purchase) की शर्त उसी दस्तावेज़ में न लिखी हो। 

हेमलता बनाम तुकाराम (सिविल अपील संख्या 6640/2010) मामले का अंतिम निर्णय: 

सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द कर दिया और तुकाराम के मुकदमे को खारिज कर दिया। न्यायालय ने बिक्री विलेख को पूरी तरह वैध और वास्तविक माना। इसके साथ ही कोर्ट ने भविष्य में ऐसे विवादों को रोकने के लिए भूमि रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण और 'ब्लॉकचेन' (Blockchain) तकनीक के उपयोग की सिफारिश भी की। रिपोर्ट: उपदेश अवस्थी विधि पत्रकार एवं सलाहकार।
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