Legal advice - मालिक और किराएदार के विवाद पर ग्वालियर हाई कोर्ट का लैंडमार्क डिसीजन

भोपाल समाचार, विधि संवाददाता, 14 जनवरी 2026
: हाई कोर्ट ऑफ़ मध्य प्रदेश की ग्वालियर खंडपीठ ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि किराएदार किसी के मकान पर किसी भी स्थिति में कब्जा नहीं कर सकता है। चाहे वह कानून की जानकारी रखने वाला अधिवक्ता ही क्यों ना हो। इस विवाद में फाइनल डिसीजन आने तक 26 साल का समय लग गया लेकिन इस डिसीजन के कारण भविष्य में होने वाले इस प्रकार के सभी विवादों में इतना समय नहीं लगेगा। यह लैंडमार्क जजमेंट संपत्ति के स्वामियों की, स्वामित्व की रक्षा करेगा।

मामले की पृष्ठभूमि और किरदार

यह मामला अनिल कुमार कुशवाहा (वादी/संपत्ति के स्वामी) और अनिल कुमार गुप्ता (प्रतिवादी/किराएदार) के बीच एक संपत्ति विवाद से जुड़ा है। यह संपत्ति ग्वालियर (मध्य प्रदेश) के हजीरा स्थित तानसेन रोड पर इंटक (INTAK) कार्यालय के सामने स्थित एक मकान है, जिसका नगर निगम क्रमांक 114 (वार्ड नंबर 15) है। वादी अनिल कुमार कुशवाहा ने प्रतिवादी अनिल कुमार गुप्ता को, जो पेशे से एक अधिवक्ता (Advocate) हैं, 17 अक्टूबर 2001 को इस मकान का एक कमरा कार्यालय के रूप में उपयोग करने के लिए किराए पर दिया था। वादी के अनुसार, किराया ₹500 प्रति माह तय हुआ था और ₹125 बिजली खर्च के रूप में अलग से देने थे (कुल ₹625), जबकि प्रतिवादी का दावा था कि कुल किराया केवल ₹125 था।

विवाद का मुख्य कारण

Bona fide Need: मकान मालिक अनिल कुमार का कहना था कि उसे अपने छोटे बेटे सौजन्य, जो इंजीनियरिंग का छात्र था, की पढ़ाई के लिए उस कमरे की सख्त जरूरत थी क्योंकि वह वर्तमान में अपने माता-पिता और भाई-बहनों के साथ एक ही कमरे में पढ़ने को मजबूर था। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रतिवादी अधिवक्ता अनिल कुमार ने शुरू में 6 महीने में कमरा खाली करने का आश्वासन दिया था, लेकिन बाद में मुकर गया। नवंबर 2002 में जब वादी ने कमरा खाली करने को कहा, तो प्रतिवादी ने कथित तौर पर उसके साथ गाली-गलौज की और उसे कमरे से बाहर धकेल दिया। 

कानूनी लड़ाई की शुरुआत
किराएदार ने 16 नवंबर 2002 के बाद से किराया देना बंद कर दिया। इसके अलावा, किराएदार ने मकान मालिक को परेशान करने के लिए 7 मई 2003 को एक झूठी पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराई कि मकान मालिक ने उसकी बिजली काट दी है।

ट्रायल कोर्ट का फैसला
ट्रायल कोर्ट 8वीं सिविल जज, क्लास-II, ग्वालियर ने दिनांक 31 जुलाई 2009 को फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने माना कि वादी को कमरे की वास्तविक आवश्यकता है और ₹5,625 का किराया बकाया है। हालांकि, कोर्ट ने बेदखली की डिक्री देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि अधिवक्ता का कार्यालय एक व्यावसायिक गतिविधि (Commercial Activity) है, इसलिए आवासीय उद्देश्य (बेटे की पढ़ाई) के लिए बेदखली का मुकदमा मान्य नहीं है। ट्रायल कोर्ट के फैसले से संतुष्ट होकर अपील की गई।

निचली अपीलीय अदालत 10वें अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, ग्वालियर ने दिनांक 30 मार्च 2010 को अपने डिसिशन में मकान मालिक की अपील खारिज कर दी और किराएदार की अपील स्वीकार करते हुए किराए की दर और अन्य निष्कर्षों को बदल दिया। इस फैसले से असंतुष्ट होने पर मकान मालिक द्वारा हाईकोर्ट में न्याय की मांग की गई।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर खंडपीठ के न्यायाधीश: माननीय न्यायमूर्ति जी. एस. अहलुवालिया ने इस मामले में फाइनल डिसीजन देते हुए 13 जनवरी 2026 को स्पष्ट किया कि आवासीय भवन में चलने वाला अधिवक्ता का कार्यालय कोई व्यावसायिक गतिविधि नहीं है। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की उस गलती को सुधारा जिसमें उसने अधिवक्ता के काम को व्यापार मान लिया था।

हाई कोर्ट ने यह भी पाया कि प्रतिवादी (अधिवक्ता) ने निचली अदालत द्वारा तय किए गए मामूली किराए को जमा करने में भी 25 महीने की देरी की थी, जिसके लिए कोई ठोस कारण नहीं दिया गया।

उच्च न्यायालय ने निचली अदालतों के पुराने फैसलों को रद्द कर दिया और वादी मकान मालिक अनिल कुमार कुशवाहा के पक्ष में बेदखली की डिक्री जारी की। प्रतिवादी अनिल कुमार गुप्ता अधिवक्ता को आदेश दिया गया कि वह एक महीने के भीतर कमरे को खाली कर दे, अन्यथा मकान मालिक अदालती कार्यवाही के माध्यम से उसे जबरन खाली करवा सकता है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि निष्पादन कार्यवाही (Execution) की नौबत आती है, तो उसे 6 महीने के भीतर पूरा किया जाए।

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