ग्वालियर, 30 जनवरी 2026: हाई कोर्ट ऑफ़ मध्य प्रदेश की ग्वालियर बेंच के विद्वान न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत ने स्टेट बैंक ऑफ़ इंदौर के एक मामले में लैंडमार्क जजमेंट देते हुए कहा कि यदि किसी अधिकारी ने लंबे समय तक अच्छी सेवा दी है और एक बार उससे कोई प्रक्रियात्मक चूक हो गई है, तो इसके लिए अत्यधिक कठोर सजा नहीं दे सकते। केवल प्रक्रियात्मक चूक के मामले को 'कदाचार' (Misconduct) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसके अलावा हाई कोर्ट ने जानकारी छुपाने वाले विजिलेंस ऑफिसर के खिलाफ जांच के आदेश दिए हैं।
A. K. Jain vs. State Bank of India
याचिकाकर्ता ए. के. जैन (क्षेत्रीय अधिकारी/Field Officer) ने अपनी याचिका में बताया कि, उन्होंने भारतीय स्टेट बैंक की 39 सालों तक सेवा की और 31 अगस्त 2010 को रिटायर हुए। रिटायरमेंट के समय उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई चल रही थी। उन पर आरोप था कि नौगांव शाखा में 'प्राइवेट वेयरहाउस-प्रोड्यूस मार्केटिंग लोन स्कीम' के तहत ऋण स्वीकृत करने में प्रक्रियात्मक अनियमितताएं की गईं, जिससे बैंक को कथित तौर पर लगभग 87 लाख रुपये की हानि हुई। इस मामले में दोषी पाए जाने पर उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। उनका कहना है कि वह बैंक के इस कठोर निर्णय से संतुष्ट नहीं है और न्याय के लिए न्यायालय के दरवाजे पर आए हैं।
याचिकाकर्ता वकील श्री एम. के. शर्मा और श्री आलोक शर्मा की दलील
सजा भेदभावपूर्ण है क्योंकि उन्हीं आरोपों में सह-अभियुक्तों (मैनेजर और अन्य अधिकारी) को केवल मामूली दंड (वेतन वृद्धि रोकना) दिया गया, जबकि याचिकाकर्ता को बर्खास्त कर दिया गया। अनियमितताएं केवल प्रक्रियात्मक थीं, इसमें कोई धोखाधड़ी या व्यक्तिगत लाभ का इरादा (Mens Rea) नहीं था। इसके अलावा सेवानिवृत्ति के बाद बर्खास्तगी का आदेश अवैध है। जबकि इसी मामले में आपराधिक अदालत ने उन्हें दोषमुक्त (Acquit) कर दिया है।
SBI के वकील श्री पीयूष चतुर्वेदी के तर्क
ए. के. जैन (क्षेत्रीय अधिकारी/Field Officer) को दी गई सजा कदाचार की गंभीरता के अनुरूप है क्योंकि याचिकाकर्ता की लापरवाही से बैंक को भारी वित्तीय हानि हुई। याचिकाकर्ता की जिम्मेदारी अन्य सह-अभियुक्तों से भिन्न थी, इसलिए सजा में समानता (Parity) का दावा नहीं किया जा सकता।
न्यायालय की टिप्पणी
• अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने जांच अधिकारी की रिपोर्ट से असहमत होते समय स्पष्ट कारण दर्ज नहीं किए।
• अपीलीय आदेश में याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए बिंदुओं और सह-अभियुक्तों को दी गई कम सजा पर विचार नहीं किया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
• बैंक ने वसूली गई राशि (लगभग 26.96 लाख रुपये) को हानि के विवरण में छिपाया था।
• आरोप केवल प्रक्रियात्मक चूक के थे, जिन्हें 'कदाचार' (Misconduct) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता यदि कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा न हो।
हाई कोर्ट का फैसला
न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए निम्नलिखित आदेश दिए:
1. बर्खास्तगी (06.12.2010) और अपील खारिज करने (06.06.2011) के आदेशों को रद्द कर दिया गया।
2. बैंक को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता ने 39 साल तक बैंक की सेवा की है। इस दौरान उसने कोई भ्रष्टाचार या अनुशासनहीनता नहीं की। इसके अलावा समान अपराध में सह-अभियुक्तों को कम सजा दी गई। इस बात को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता को भी कम सजा पर विचार किया जाए।
3. याचिकाकर्ता को सभी सेवानिवृत्ति लाभ (पेंशन, ग्रेच्युटी आदि) 8 सप्ताह के भीतर दिए जाएं, अन्यथा 6% वार्षिक ब्याज देय होगा।
4. सतर्कता विभाग (Vigilance Dept) को उन अधिकारियों के खिलाफ जांच की जाए जिन्होंने वसूली गई राशि को रिकॉर्ड में नहीं दिखाया था।
माननीय न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि बैंक सेवानिवृत्ति के बाद कार्यवाही जारी रख सकता है, लेकिन इस मामले में दी गई सजा "अत्यधिक कठोर" और "विवेकहीन" थी। याचिकाकर्ता की 39 वर्षों की समर्पित सेवा को सजा तय करते समय अनदेखा करना गलत है।
WP No. 7096 of 2011 - ए. के. जैन बनाम भारतीय स्टेट बैंक मामले का विवरण
याचिकाकर्ता और मामले का विवरण
• याचिकाकर्ता: ए. के. जैन (क्षेत्रीय अधिकारी/Field Officer)।
• प्रतिवादी: मुख्य महाप्रबंधक एवं अपीलीय प्राधिकारी, भारतीय स्टेट बैंक और अन्य।
• मामला संख्या: रिट याचिका संख्या 7096/2011।
न्यायाधीश और निर्णय की तारीख
• न्यायाधीश: माननीय न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत।
• निर्णय की तारीख: 28 जनवरी, 2026 (सुनवाई 19.12.2025 को सुरक्षित रखी गई थी)।
वकीलों के नाम
• याचिकाकर्ता के लिए: श्री एम. के. शर्मा और श्री आलोक शर्मा।
• प्रतिवादियों (बैंक) के लिए: श्री पीयूष चतुर्वेदी।

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