नई दिल्ली, 30 जनवरी 2026: यदि किसी सरकारी कर्मचारी अथवा अधिकारी के खिलाफ यह शिकायत मिलती है कि, उसने ड्यूटी के दौरान कोई अपराध किया है तो भारतीय न्याय संहिता ऐसे मामले में सरकारी कर्मचारी अथवा अधिकारी का संरक्षण करती है और मजिस्ट्रेट को कोई भी कार्रवाई करने से पहले आरोपीय अधिकारी के सीनियर ऑफिसर से रिपोर्ट लेनी पड़ती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने केरल की एक महिला की याचिका की सुनवाई के बाद BNSS की धारा 175-4 के मामले में नई गाइडलाइन जारी कर दी है।
घटना का विवरण और संघर्ष की शुरुआत
भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक महिला ने तीन पुलिस अधिकारियों पर यौन उत्पीड़न और बलात्कार का आरोप लगाते हुए न्याय की मांग की। महिला ने अपनी याचिका में बताएं कि जनवरी 2022 में एक पुलिस अधिकारी, संपत्ति विवाद में जांच के बहाने उसके घर आया और उसका रेप किया। जब उसने पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत की और मामला दर्ज करने की मांग की तो जांच के नाम पर एक DSP और उसके बाद एक SP रैंक के अधिकारी ने अलग-अलग समय पर उसका यौन उत्पीड़न किया। अगस्त 2022 में उसने शिकायत की थी, अक्टूबर 2022 में पुलिस ने अपनी एक इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट में बलात्कार के आप को झूठा बताते हुए फाइल क्लोज कर दी।
न्यायालय की शरण दी तो मामला फिर से पुलिस के पास पहुंच गया
जब पुलिस विभाग और राज्य सरकार के स्तर पर कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई तो सितंबर 2024 में महिला ने पोन्नानी (Ponnani) स्थित प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) के सामने BNSS की धारा 175(3) और 173(4) के तहत FIR दर्ज करने के लिए आवेदन दिया। आवेदन प्राप्त होने पर मजिस्ट्रेट ने DIG, त्रिशूर रेंज से रिपोर्ट मांगी, क्योंकि यदि कोई व्यक्ति किसी सरकारी कर्मचारी अथवा अधिकारी पर किसी भी प्रकार के अपराध का आरोप लगता है, धारा 175(4) कर्मचारी अथवा अधिकारी का संरक्षण करती है। जिसके तहत वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट की जरूरत होती है। इस प्रकार मामला एक बार फिर पुलिस डिपार्टमेंट के पास चला गया, तो महिला ने केरल हाईकोर्ट में याचिका लगाई।
केरल हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने FIR दर्ज करने का आदेश दिया
केरल हाईकोर्ट की एकल पीठ (Single Judge) ने 18 अक्टूबर 2024 को आदेश दिया कि बलात्कार जैसे अपराध को "आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन" (discharge of official duties) में नहीं गिना जा सकता, इसलिए पुलिस अधिकारियों को धारा 175(4) के तहत सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है और FIR तुरंत दर्ज होनी चाहिए।
हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने FIR वाला आदेश रद्द कर दिया
हालांकि, बाद में उच्च न्यायालय की खंडपीठ (Division Bench) ने एकल पीठ के इस आदेश को रद्द कर दिया, यह कहते हुए कि जब मजिस्ट्रेट के पास मामला लंबित है, तो उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था।
सुप्रीम कोर्ट में हुई न्याय की लड़ाई
यह मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, जहाँ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने सुनवाई की।
अपीलकर्ता (महिला) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री आर. बसंत (Mr. R. Basant) प्रस्तुत हुए। उन्होंने कहा कि किसी भी महिला के साथ, किसी पुरुष पुलिस अधिकारी के द्वारा, बलात्कार किसी भी तरह से "आधिकारिक कर्तव्य" नहीं हो सकता, इसलिए अधिकारियों को BNSS की धारा 175(4) के तहत कोई सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जब यौन अपराधों में धारा 218 के तहत 'मंजूरी' (sanction) की जरूरत नहीं होती, तो जांच के स्तर पर ऐसी सुरक्षा देना गलत है।
महिला ने पुलिस अधिकारियों से प्रतिशोध के लिए शिकायत की थी
राज्य सरकार (R1-R4) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री रंजीत कुमार (Mr. Ranjit Kumar) ने आरोपों को "निजी प्रतिशोध" और "साजिश" का हिस्सा बताया। उन्होंने तर्क दिया कि पुलिस की प्रारंभिक जांच में महिला के बयानों में कई विसंगतियां पाई गई हैं और यह शिकायत अधिकारियों को परेशान करने के लिए की गई है।
लोक सेवकों को झूठे मामलों से बचाने के लिए दो-स्तरीय सुरक्षा
आरोपी पुलिस अधिकारी (R-5) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सिद्धार्थ दवे (Mr. Siddharth Dave) ने तर्क दिया कि BNSS में लोक सेवकों को झूठे मामलों से बचाने के लिए दो-स्तरीय सुरक्षा दी गई है। उन्होंने कहा कि धारा 175(4) एक स्वतंत्र प्रावधान है और इसके तहत शिकायत के लिए हलफनामा (affidavit) अनिवार्य नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय जस्टिस दीपांकर दत्ता द्वारा लिखे गए फैसले में न्यायालय ने BNSS की धाराओं की विस्तृत व्याख्या की है:
1. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 175(4) स्वतंत्र नहीं है, धारा 175(4) को धारा 175(3) के साथ जोड़कर ही पढ़ा जाना चाहिए।
2. कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी लोक सेवक के खिलाफ उसके आधिकारिक कर्तव्य के दौरान किए गए किसी कार्य के लिए मजिस्ट्रेट से जांच का आदेश चाहता है, तो उस आवेदन के साथ शपथ पत्र (Affidavit) देना अनिवार्य होगा। यह झूठी शिकायतों को रोकने के लिए आवश्यक है।
3. सुप्रीम कोर्ट ने माना कि केरल उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर फैसला सुनाया था, क्योंकि उन्होंने मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती न दिए जाने के बावजूद हस्तक्षेप किया था।
सुप्रीम कोर्ट का फाइनल डिसीजन
न्यायालय ने केरल उच्च न्यायालय की खंडपीठ के आदेश को बरकरार रखा और JMFC पोन्नानी को निर्देश दिया कि वह कानून के अनुसार आगे बढ़ें। साथ ही, मजिस्ट्रेट को यह सुनिश्चित करने को कहा कि महिला का आवेदन धारा 333 के अनुसार उचित हलफनामे के साथ समर्थित हो।
निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के माध्यम से लोक सेवकों के लिए एक "सुरक्षा कवच" को मजबूत किया है ताकि उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान न किया जा सके, लेकिन साथ ही मजिस्ट्रेट को यह अधिकार भी दिया है कि यदि प्रथम दृष्टया अपराध "आधिकारिक कर्तव्य" से बाहर का लगता है, तो वे सामान्य प्रक्रिया अपना सकते हैं।
कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान में 'मे' शब्द का इस्तेमाल किया गया और इसे 'may' ही पढ़ा जाना चाहिए, न कि "Shall"
महत्वपूर्ण बात यह है कि धारा 175 की उप-धारा (4) में मॉडल वर्ब 'may' का इस्तेमाल किया गया, न कि 'Shall' का।
जिस संदर्भ में यह आता है और जिस उद्देश्य को प्राप्त करने की कोशिश की जा रही है, उसे देखते हुए 'may' को 'may' ही पढ़ा जाना चाहिए, जिसमें विवेक का तत्व हो, न कि 'Shall'
सुप्रीम कोर्ट के मजिस्ट्रेटों के लिए दिशानिर्देश
पब्लिक सर्वेंट यानी लोक सेवकों के खिलाफ आपराधिक मामलों की शिकायतों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भारत के सभी मजिस्ट्रेटों के लिए गाइडलाइन भी जारी की है:-
BNSS की धारा 175 की उप-धारा (4) के तहत शिकायत मिलने पर, जिसमें सरकारी कर्मचारी पर अपनी ड्यूटी के दौरान अपराध करने का आरोप लगाया गया, तो मजिस्ट्रेट इनमें से कोई भी काम कर सकता है:-
शिकायत पढ़ने के बाद अगर ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट पहली नज़र में संतुष्ट है कि कथित अपराध सरकारी कर्मचारी द्वारा ड्यूटी के दौरान किया गया तो ऐसे मजिस्ट्रेट के पास धारा 175 की उप-धारा (4) के तहत बताई गई प्रक्रिया का पालन करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं हो सकता है, जिसमें सीनियर अधिकारी और आरोपी सरकारी कर्मचारी से रिपोर्ट मंगाई जाती है। या,
शिकायत पर विचार करने के बाद अगर ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट को परिस्थितियों के आधार पर पहली नज़र में शक होता है कि क्या सरकारी कर्मचारी द्वारा किया गया कथित अपराध उसकी सरकारी ड्यूटी के दौरान हुआ तो ऐसा मजिस्ट्रेट सावधानी बरतते हुए धारा 175 की उप-धारा (4) में बताई गई प्रक्रिया का पालन कर सकता है।
या, अगर ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट संतुष्ट है कि अपराध का कथित काम सरकारी ड्यूटी के दौरान नहीं किया गया और/या इसका उससे कोई उचित संबंध नहीं है। यह भी कि धारा 175 की उप-धारा (4) के नियम लागू नहीं होती हैं तो शिकायत पर धारा 175 की उप-धारा (3) के तहत बताई गई सामान्य प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।"

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