नई दिल्ली, 22 जनवरी 2026: आज हम एक ऐसी बड़ी कानूनी जीत की रिपोर्ट पेश कर रहे हैं, जो देश के करोड़ों सरकारी कर्मचारियों और श्रमिकों के सीधे आर्थिक हितों से जुड़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने 'भारत संघ बनाम हैवी व्हीकल फैक्ट्री कर्मचारी संघ' मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है, जिसमें ओवरटाइम मजदूरी (Overtime Wages) की गणना को लेकर चल रहे लंबे विवाद पर विराम लगा दिया गया है।
विवाद क्या था?
Union of India vs. Heavy Vehicles Factory Employees’ Union मामले की जड़ फैक्ट्री अधिनियम, 1948 की धारा 59(2) की व्याख्या में छिपी थी। मुख्य सवाल यह था कि क्या ओवरटाइम की गणना करते समय केवल मूल वेतन और महंगाई भत्ते (DA) को आधार माना जाए, या इसमें अन्य भत्तों को भी शामिल किया जाए?,
सरकार की दलील और मंत्रालयों का रुख:
केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय का तर्क था कि मकान किराया भत्ता (HRA), परिवहन भत्ता (TA), कपड़े धोने का भत्ता (CWA) और लघु परिवार भत्ता (SFA) जैसे प्रतिपूरक भत्तों को "मजदूरी की सामान्य दर" से बाहर रखा जाना चाहिए।, सरकार ने विभिन्न कार्यालय ज्ञापनों (Office Memorandums) का हवाला देते हुए कहा कि ये भत्ते सभी कर्मचारियों पर समान रूप से लागू नहीं होते, इसलिए इन्हें ओवरटाइम गणना का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और फैसला:
जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने सरकार की इन दलीलों को खारिज करते हुए कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया।, अदालत के फैसले के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
• कानूनी परिभाषा की सर्वोच्चता: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 59(2) के अनुसार, "मजदूरी की सामान्य दर" का अर्थ है मूल वेतन और वे सभी भत्ते, जिनका कर्मचारी हकदार है।
• कार्यपालिका की सीमाएं: अदालत ने कहा कि जब विधायिका ने कानून में स्पष्ट रूप से केवल बोनस और ओवरटाइम कार्य के लिए मजदूरी को ही गणना से बाहर रखा है, तो सरकार केवल एक 'कार्यालय ज्ञापन' (Office Memorandum) के जरिए अपनी मर्जी से अन्य भत्तों को बाहर नहीं कर सकती।
• मंत्रालयों के बीच विरोधाभास: कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि रेल मंत्रालय पहले से ही इन भत्तों को ओवरटाइम गणना में शामिल कर रहा था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत सरकार के अलग-अलग मंत्रालय एक ही संसदीय अधिनियम की अलग-अलग व्याख्या नहीं कर सकते।
• कल्याणकारी कानून: कोर्ट ने दोहराया कि फैक्ट्री अधिनियम एक "बेनिफिशियल लेजिस्लेशन" (हितकारी कानून) है, जिसका उद्देश्य श्रमिकों को शोषण से बचाना और उनके शारीरिक व मानसिक कल्याण को सुनिश्चित करना है।,
प्रशासनिक आदेश, वैधानिक कानून का उल्लंघन नहीं कर सकते
निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए केंद्र सरकार की अपीलों को खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद, अब कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों को मिलने वाले HRA, TA और अन्य भत्तों को जोड़कर ही उनके ओवरटाइम का भुगतान किया जाएगा। यह फैसला न केवल श्रमिकों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि प्रशासनिक आदेश कभी भी वैधानिक कानूनों (Statutory Laws) का उल्लंघन नहीं कर सकते।
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