10 साल से लड़ रहे पति-पत्नी को सुप्रीम कोर्ट ने तलाक दे दिया, Irretrievable Breakdown of Marriage

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 22 जनवरी 2026
: एक दंपति की लड़ाई से सुप्रीम कोर्ट भी तंग आ गया। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन को जब पूरा भरोसा हो गया कि इन दोनों की लड़ाई का कोई अंत नहीं हो सकता, तो सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त शक्तियों का उपयोग करते हुए Irretrievable Breakdown of Marriage का आर्डर जारी कर दिया। यानी अब यह दोनों अपने जीवन में कभी भी किसी भी प्रकार का समझौता नहीं कर सकते। इन दोनों का विवाह संबंध हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। 

सिर्फ 65 दिन का दांपत्य जीवन

महज 65 दिनों का वैवाहिक जीवन यह कानूनी विवाद साल 2012 में शुरू हुआ था। नेहा और अभिषेक का विवाह 28 जनवरी 2012 को हुआ था, लेकिन आपसी विवादों के कारण नेहा ने महज 65 दिनों के भीतर ही अपना ससुराल छोड़ दिया।,, तब से, यानी पिछले 13 वर्षों से, यह जोड़ा अलग रह रहा है। 

दोनों ने एक दूसरे पर 40 से ज्यादा कोर्ट केस ठोक दिए

इस मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस जोड़े ने एक-दूसरे के खिलाफ दिल्ली, लखनऊ और गाजियाबाद की अदालतों में 40 से अधिक कानूनी मामले दर्ज कर रखे थे। इनमें भरण-पोषण, तलाक, मानहानि और आपराधिक शिकायतें शामिल थीं। कोर्ट ने इस पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि विवाहित जोड़ों को अदालतों को अपना "युद्धक्षेत्र" (Battlefield) बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

नेहा लाल और अभिषेक कुमार का विवाह भंग

नेहा लाल ने विवाह को भंग करने की गुहार लगाई थी। हालाँकि पति ने इसका कड़ा विरोध किया और पत्नी पर झूठे मामले दर्ज करने का आरोप लगाया, लेकिन जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने पाया कि:
• विवाह पूरी तरह से टूट चुका है और सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है।
• इतने सालों की मुकदमेबाजी ने रिश्तों में भारी कड़वाहट पैदा कर दी है।
• अनुच्छेद 142 के तहत अदालत को यह शक्ति प्राप्त है कि यदि कोई विवाह बचाने के लायक न रहे, तो वह दूसरे पक्ष की असहमति के बावजूद उसे भंग कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने पति-पत्नी दोनों पर जुर्माना लगाया

1. विवाह का विच्छेद: न्यायालय ने इस विवाह को "अपरिवर्तनीय रूप से टूटा हुआ" मानते हुए तलाक की डिक्री जारी कर दी।
2. मुकदमेबाजी का अंत: दोनों पक्षों के बीच लंबित लगभग सभी वैवाहिक मामलों को समाप्त कर दिया गया।
3. टोकन जुर्माना: अदालतों का समय बर्बाद करने और स्कोर सेट करने के लिए सिस्टम का दुरुपयोग करने के लिए दोनों पक्षों पर 10,000-10,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। 

निष्कर्ष: न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि वैवाहिक विवादों में मध्यस्थता (Mediation) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और पुलिस कार्रवाई को अंतिम विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून का उद्देश्य न्याय करना है, न कि किसी को अंतहीन मुकदमेबाजी में उलझाए रखना।
भोपाल समाचार से जुड़िए
कृपया गूगल न्यूज़ पर फॉलो करें यहां क्लिक करें
टेलीग्राम चैनल सब्सक्राइब करने के लिए यहां क्लिक करें
व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करने के लिए  यहां क्लिक करें
X-ट्विटर पर फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें
फेसबुक पर फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें
समाचार भेजें editorbhopalsamachar@gmail.com
जिलों में ब्यूरो/संवाददाता के लिए व्हाट्सएप करें 91652 24289

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!