नई दिल्ली, 31 जनवरी 2026: UGC नियमों की डिबेट के दौरान, आरक्षित वर्ग के कई विशेषज्ञों ने कहा कि, यदि अनारक्षित जाति के विद्यार्थियों के साथ कैंपस में जातिगत भेदभाव होता है तो, उदाहरण सहित मामले बताओ। इसके जवाब में उदाहरण सहित मामले सामने आने लगे हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, जातिगत भेदभाव से पीड़ित ब्राह्मण इत्यादि विद्यार्थी यह सवाल भी पूछ रहे हैं कि कृपया बताइए, इस भेदभाव की शिकायत किस कानून में किस धारा के तहत कर सकते हैं। क्योंकि हमारे संरक्षण के लिए तो कोई कानून ही नहीं है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी से लॉ की पढ़ाई कर रहे हर्षवर्धन मिश्रा से जब पत्रकार साकेत आनंद ने पूछा, कि आंकड़े बताते हैं कि SC/ST स्टूडेंट्स भेदभाव का शिकार होते रहे हैं। इस पर हर्षवर्धन कहते हैं, ‘ये इसीलिए है क्योंकि हमने ऐसा मान लिया है कि शोषित सिर्फ SC/ST या OBC ही है जबकि ऐसा नहीं है। ये कह देना गलत है कि सिर्फ कुछ खास वर्ग के लोग ही पीड़ित है। हर जाति वर्ग का व्यक्ति इसका शिकार हो सकता है और प्रताड़ित करने वाला भी किसी जाति का हो सकता है।‘
'मैं ब्राह्मण हूं लेकिन मुझे भी भेदभाव झेलना पड़ता है। साथी कहते हैं- पंडित जी जाओ मंदिर में घंटी बजाओ, भीख मांगो यहां पढ़ने क्यों आए हो। JNU और BHU कैंपस की दीवारों पर लिखा है- ‘ब्राह्मण, बनिया गो बैक’,आपको क्या लगता है कि हमारे साथ जाति सूचक शब्द इस्तेमाल नहीं होते। पिछले 7 महीने से यूनिवर्सिटी में मुझे कई बार ये सब झेलना पड़ा।‘
स्पेशल नोट:- JNU और BHU कैंपस की दीवारों पर लिखा है- ‘ब्राह्मण, बनिया गो बैक’, इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त कि, इन दोनों कैंपस में आरक्षित जाति वर्ग के लोगों के साथ कोई भेदभाव नहीं हो रहा है बल्कि इनकी संख्या ज्यादा है। बहुमत में है और शक्तिशाली है, इसलिए आरक्षित वर्ग के विद्यार्थी, अनारक्षित वर्ग के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव कर रहे हैं। इनकी संख्या इसलिए ज्यादा हो गई है क्योंकि आरक्षण के कारण आरक्षित सीटों पर और, मेरिट के कारण अनारक्षित सीटों पर आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों को एडमिशन मिलता है। यहां एक बात और देखने वाली है कि जो विद्यार्थी मेरिट के आधार पर अनारक्षित सीटों पर एडमिशन पाते हैं, सामान्य तौर पर वह किसी के साथ भेदभाव नहीं करते, क्योंकि उनको अपनी योग्यता पर विश्वास होता है।
इस भेदभाव की रिपोर्ट कहां लिखवाएं
ऐसे हजारों उदाहरण है और आज से नहीं पिछले 50 साल से चले आ रहे हैं। "तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार" का नारा देश भर में गूंज रहा था। यह वही मोड़ था जहां से आरक्षित जाति वर्ग के युवाओं को जब मौका मिला उन्होंने ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय के साथ भेदभाव किया। ऐसा करने से उसके अंदर की बदले की भावना शांत होती है। इससे पहले तक वह समानता के लिए संघर्ष कर रहे थे, और अनारक्षित वर्ग के लोगों का साथ दे रहे थे, समाज सही दिशा में आगे बढ़ रहा था परंतु पॉलिटिक्स ने उनके अंदर बदले की भावना भर दी। और समाज को एक बार फिर जातियों में विभाजित कर दिया।
सवाल यह है कि ब्राह्मणों के साथ होने वाले इस प्रकार के भेदभाव की रिपोर्ट कहां पर लिखवाएं। क्या संविधान की रक्षा करने का ऐलान करने वाले, ब्राह्मणों को बताएंगे कि, इस प्रकार की स्थिति में उनकी रक्षा के लिए क्या विशेष प्रावधान है।
हर शक्तिशाली कमजोरी के साथ भेदभाव करता है
यदि समस्या के समाधान की तरफ बढ़ता है तो फिर बात जातिगत भेदभाव की नहीं बल्कि भारत की संस्कृति में शामिल हो गई भेदभाव की भावना को खत्म करना होगा। उत्तर प्रदेश में ओबीसी यादव, दूसरों को प्रताड़ित करते हैं। गुजरात में ओबीसी पटेल दूसरों को प्रताड़ित करते हैं। महाराष्ट्र के ऐसे कई गांव में जहां पर अनुसूचित जाति के लोग ब्राह्मण को प्रताड़ित करते हैं। जहां पर जो संख्या में ज्यादा है, वह दूसरे को प्रताड़ित करता है। समाज में जो शक्तिशाली है, वह कमजोर के साथ भेदभाव करता है। भेदभाव का जाति से कोई संबंध नहीं है बल्कि शक्तिशाली व्यक्ति की भावना से संबंध है।

