भोपाल समाचार, 31 जनवरी 2026: मध्य प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से निवेदन किया है कि 27% ओबीसी आरक्षण के मामले में ओबीसी पक्ष के वकीलों द्वारा जिस प्रकार की बयान बाजी की जा रही है। कार्रवाई का अपडेट देने के बहाने, पार्टी प्रवक्ता की तरह पॉलिटिकल स्टेटमेंट जारी किए जा रहे हैं। उसको बंद करवाया जाना चाहिए। इस मामले पर डिस्कशन के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 4 फरवरी की तारीख डिसाइड की है।
मध्य प्रदेश सरकार ने ओबीसी आरक्षण के वकीलों के लिए गाइडलाइन मांगी
मध्य प्रदेश शासन की ओर से गौरव/जूही श्रीवास्तव/अवंतिका जायसवाल द्वारा प्रेस को भेजी गई सूचना क्रमांक 0709H में लिखा है कि, शुक्रवार 30 जनवरी को एडिशनल सॉलिसिटर जनरल श्री के.एम. नटराज द्वारा दिनांक 29 जनवरी को न्यायालय में हुई सुनवाई के संबंध में प्रिंट एवं सोशल मीडिया में की गई तथ्यहीन एवं भ्रामक रिपोर्टिंग के संवेदनशील मुद्दे को माननीय न्यायालय के संज्ञान में लाया गया। उन्होंने कहा कि माननीय न्यायालयों में विचाराधीन प्रकरणों के संबंध में मीडिया के समक्ष पार्टी प्रवक्ताओं की तरह जानकारी प्रस्तुत करना न्यायालय की गरिमा के विरूद्ध है।
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल श्री नटराज ने मीडिया के समक्ष संबंधित एडवोकेट द्वारा शासकीय अधिवक्ताओं की अनुपस्थिति बताने और माननीय न्यायाधिपतियों के नाम के उल्लेख को भी न्यायालयीन गरिमा के विरूद्ध बताने पर समग्र निर्देश प्रसारित करने का आग्रह किया। इसे न्यायालय ने गंभीरता से लेते हुए आगामी 4 फरवरी 2026 को होने वाली सुनवाई के दौरान इस विषय को संज्ञान लेने की बात कही है।
अब सुप्रीम कोर्ट क्या करेगा
अधिवक्ता श्री अजय गौतम का कहना है कि, इस मामले में जरूर कुछ भी नया करने की जरूरत नहीं है। अधिवक्ताओं की पेशेवर आचार-संहिता और न्यायिक मर्यादा याद दिलाना काफी है। वकील का दायित्व है कि वह अपने मुवक्किल का पक्ष केवल अदालत के अंदर रखें। कोई भी सार्वजनिक आचरण ना करें जो न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की संभावना रखता हो। किसी भी पक्ष का अधिवक्ता कोई भी ऐसा बयान नहीं दे सकता है जो किसी भी पक्ष के प्रति "पूर्वाग्रह" रखता हो।
अधिवक्ता की अपनी निर्धारित सीमाएं हैं। वह, बिना टिप्पणी, आरोप, या निष्कर्ष निकाले, केवल तथ्यात्मक जानकारी (procedural facts) मीडिया को दे सकता है।

