लीगल न्यूज डिपार्मेंट - महिलाओं से संबंधित अपराधों के मामले में सोशल मीडिया और व्हाट्सएप इत्यादि पर पत्रकारता करने वाले कंटेंट क्रिएटर अक्सर अपनी निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन कर देते हैं। कई बार मेन स्ट्रीम मीडिया के पत्रकार भी ऐसी गलती करते हैं। इसके कारण न्यायालय में महिला का मुकदमा कमजोर हो जाता है या किसी अन्य प्रकार से प्रभावित हो जाता है। भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 73 में कोर्ट की कार्यवाही का प्रकाशन या प्रसारण करने वाले किसी भी प्रकार के पत्रकार या कंटेंट क्रिएटर को 2 साल जेल का प्रावधान किया गया है।
1. BNS की धारा 73 का मुख्य प्रावधान और उद्देश्य
धारा 73 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति धारा 72 में निर्दिष्ट किसी अपराध (जैसे बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, या धोखे से शादी का वादा कर यौन संबंध बनाना) के संबंध में न्यायालय की कार्यवाही की किसी भी बात को न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना छापता या प्रकाशित करता है, तो वह दंड का पात्र होगा। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संवेदनशील कानूनी कार्यवाही के दौरान पीड़ित की पहचान सार्वजनिक न हो और मामले की निष्पक्षता बनी रहे।
2. धारा 72 के साथ संदर्भ (Context)
धारा 73 को समझने के लिए धारा 72 का संदर्भ आवश्यक है, क्योंकि यह केवल उन कार्यवाही पर लागू होती है जो धारा 72 में वर्णित अपराधों से संबंधित हैं। इन अपराधों में निम्नलिखित शामिल हैं:
• बलात्कार (धारा 64 और 65)।
• सामूहिक बलात्कार (Gang Rape) (धारा 70)।
• शादी करने के झूठे वादे या पहचान छिपाकर यौन संबंध बनाना (धारा 69)।
• पीड़ित की मृत्यु या उसे कोमा (Persistent Vegetative State) में पहुँचाने वाले अपराध (धारा 66)।
3. दंड का प्रावधान
इस धारा के उल्लंघन के मामले में सजा निम्नलिखित है:
• कारावास: किसी एक अवधि के लिए जिसे दो वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।
• जुर्माना: दोषी व्यक्ति जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा।
4. अपवाद (Exception)
इस धारा में एक महत्वपूर्ण अपवाद दिया गया है:
• उच्च न्यायालय (High Court) या उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के निर्णयों (Judgments) को छापना या प्रकाशित करना इस धारा के तहत अपराध नहीं माना जाता है।
5. Historical Background
पुराने कानून के साथ तुलना करने पर यह स्पष्ट होता है कि:
• यह प्रावधान भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 228A की उपधारा (3) के समान है।
• नई संहिता (BNS) में, पुरानी धारा 228A को दो हिस्सों में विभाजित किया गया है: धारा 72 (पीड़ित की पहचान का खुलासा) और धारा 73 (अदालती कार्यवाही का प्रकाशन)।
6. उदाहरण (Illustration)
मान लीजिए कि धारा 64 (बलात्कार) के किसी मामले की सुनवाई एक निचली अदालत में बंद कमरे (in-camera) में चल रही है। यदि कोई पत्रकार, कंटेंट क्रिएटर, यूट्यूब चैनल चालक, इंस्टाग्राम, फेसबुक या ट्विटर इत्यादि सोशल मीडिया या डिजिटल मीडिया पर समाचार प्रसारित करने वाला, व्हाट्सएप और टेलीग्राम जैसे मैसेजिंग एप पर समाचार प्रकाशित करने वाला, या किसी भी प्रकार का प्रकाशक, उस अदालत की लिखित अनुमति लिए बिना, गवाहों के बयान या कार्यवाही का विवरण अपने समाचार पत्र, डिजिटल मीडिया, व्हाट्सएप ग्रुप या मैसेजिंग एप्लीकेशन के किसी भी चैनल पर, अपनी वेबसाइट पर या सोशल मीडिया पर प्रकाशित कर देता है, तो उस व्यक्ति को धारा 73 के तहत दो साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है।
संक्षेप में, धारा 73 एक "सुरक्षा कवच" की तरह कार्य करती है जो यह सुनिश्चित करती है कि संवेदनशील मामलों की अदालती कार्यवाही का दुरुपयोग सनसनी फैलाने या पीड़ित को और अधिक मानसिक पीड़ा पहुँचाने के लिए न किया जाए। यह केवल उच्च न्यायपालिका के निर्णयों को सार्वजनिक चर्चा के लिए छूट देती है ताकि कानून की व्याख्या बनी रहे।
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